• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • विरासत की राख़ के ढेर पर

    आदरणीय मनमोहन जी,

    इस चुनाव में एक अदना सा रिपोर्टर भी चुनावी शोरशराबे से परेशान है । कभी मोदी से तो कभी केजरी और कभी उससे जिसके नेतृत्व में आप काम करने को तैयार थे जिसे आपने किसी काम लायक न छोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी । एक ही शख़्स है जो न तो ख़ुद परेशान है और न जिसे लेकर कोई और परेशान है । उसका नाम ग़ज़ब तरीके से आपसे मिलता है । आप ही हो । ऐसा चुनावी एकांत तो आडवाणी को भी नसीब नहीं । गाहे बगाहे उनका भी नाम आ जाता है । वे कहीं शिलान्यास लोकार्पण करते दिख जाते हैं । पर आप तो ।

    एक आइटम होता है जिसे सत्ता खा जाती है पर आप वो हो जो सत्ता को खा जाए । एक एक दिन गिनकर खाते रहे और अब लगता है चुपचाप अंत अंत तक खाने में मगन हैं । एक नेता वो होता है जो सत्ता के लिए संघर्ष करता है । एक नेता वो होता है जो सत्ता के लिए सहता है । आपने सहने और भोगने की जो मिसाल पेश की है उसका मनवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाना चाहिए । आप क्या हो । जानना ज़रूरी है ।

    दस साल का ऐसा रिकार्ड पेश किया है जिसे ठीक तरीके से समझने के लिए आपसे उम्र में आधे आपके नेता को आपकी उम्र तक चलते रहना होगा । एक ऐसा नेता जो एक साथ अपनी सरकार और पार्टी को ख़त्म कर दे और उसकी कुर्सी हिले भी नहीं , ऐसे नेता का विशेष मूल्याँकन करना चाहिए । मैं उस अदृश्य शक्ति का शुक्रगुज़ार हूँ जिसने आपको बनाये रखा । बल्कि मेरी नरेंद्र मोदी से एक राजनीतिक शिकायत यह भी है कि वे कांग्रेस को ख़त्म करने का श्रेय आपको नहीं देते । आपका वाजिब हक़ तो बनता है । आख़िर कोई सत्ता में क्यों रहना चाहेगा और रहेगा तो कुछ करने के लिए या सिर्फ रहने के लिए । नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा कि जब मक़सद पूरा न हो तो सत्ता में रहना क्यों ज़रूरी है । छोड़ दो भाई ।

    तब से मैं सोच रहा हूँ िक पराजय मुख पर खड़ी कांग्रेस ने भी कभी मनमोहन सिंह से ये नहीं कहा । सोनिया और मनमोहन के बीच तनाव की ख़बरें भी आईं । राहुल गांधी ने अध्यादेश तक फाड़ दिया मगर आप नहीं हिले । एक बार भी नहीं कहा कि इस्तीफ़ा दे रहा हूँ । प्रणब दादा आपकी कुर्सी तक पहुँचने की सारी उम्मीदें छोड़ दूसरी कुर्सी के लिए चले गए । आप कांग्रेस और सरकार के बीच सत्ता के पहले केंद्र बने रहे । एक ऐसी सरकार चलाई जिससे जनता बाग़ी हो गई । फिर भी कांग्रेस आपको ढोती रही । जानते हुए कि आपको ढोने का मतलब बनवास है । सब इतनी खुशी से आपको सहते रहे और आप सत्ता को ।

    आप ठीक कहते हैं आपका मूल्याँकन इतिहास ही कर सकता । वर्तमान में लोग आपको हटाने के जुनून में इस कदर ‘अगिया बैताल’ हैं कि मेरे अलावा किसी के पास आपके मूल्याँकन का वक्त तक नहीं । आपने अपने हटने का वक्त ख़ुद तय किया है । कोई हटा नहीं रहा है । आपकी ईमानदारी इंकम टैक्स रिटर्न पेपर में नहीं है । वो कहीं और है ।

    काश कि कोई बता पाता कि कहीं आप उसी अदृश्य शक्ति के कृपा पात्र तो नहीं जो अ से शुरू होती है । राजनीति बिना साज़िश प्रमेय के होती नहीं है । आप या तो किसी की साज़िश का हिस्सा हो या कोई आपकी साज़िश का नतीजा है । क्या सरकार चलाई है आपने । कल को कोई जैसी भी चलाये आपसे बेहतर चलायेगा । कांग्रेस को ख़त्म करने का श्रेय आपको इतिहास ही देगा । एक ऐसा नेता जिससे सुनने के लिए किसी रैली में दो हज़ार लोग भी नहीं आए वो दस साल प्रधानमंत्री बनकर जा रहा है । आप ज़रूर नरेंद्र मोदी को देखकर हैरान होते होंगे । कभी उनसे कहियेगा भाई नरेन्द्र मुझे तो पता ही नहीं था कि प्र म बनने के लिए इतनी रैलियाँ करनी होती हैं, रैलियों में इतना बोलना या फेंकना पड़ता है , इतने तरह के कुर्ते और पगड़ी पहननी पड़ती है, रोज़ विज्ञापन देना होता है, किताब लिखना और लिखवाना होता है, रोज़ ट्वीट करना होता है । अगर मुझे ये पता होता कि प्र म बनने के लिए इतना कुछ करना होता है तो कभी न बनता ! सही में आपको हटाने के लिए आडवाणी बर्बाद हो गए । नरेद्र मोदी हर सीट पर जाकर लड़ रहे हैं । आप हो कि अपनी सीट पर बैठे रह गए ।

    कोई तो वजह है जो कांग्रेस ने आपको मंज़ूर किया या आपने करवा दिया । इतिहास में आपकी बारी देर से आएगी । अभी तो राजीव गांधी, अटल जी, गुजराल और नरसिम्हा राव तक का मूल्याँकन शुरू नहीं हुआ । शायद इसीलिए वर्तमान इतना उतावला है । आप न होते तो नरेंद्र मोदी इतनी आसानी ( मेहनत पढ़ें) से न जीतते । आप अपने वर्तमान को भी इतिहास की तरह जीते हैं ।

    कमाल हो सर । बस इतिहास के लिए बता देते कि क्यों टिके रहे कुर्सी पर । अ से शुरू होने वाली अदृश्य शक्ति है या वो शक्ति म से ही शुरू होती है । और हाँ आप जिनके नेतृत्व में काम करने जा रहे हैं काश वो आपके नेतृत्व में कुछ दिन काम कर पाते । जाने दीजिये । इस देश में अकेला मैं हूँ जो आपकी तारीफ़ करता हूँ । ऐसा नेता नहीं देखा जो अपनी विरासत की राख़ पर बैठा हो । मेरी दिक्क्त है कि मेरी व्यंग्यात्मक ख़त को कोई पढ़ता नहीं । पर लिख तो सकता हूँ न ।

    आपका

    रवीश कुमार