• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    तीन तलाक – मुस्लिम महिलाओं की बड़ी जीत

    देश के पढ़े लिखे मुसलमानों को सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया अदा करना चाहिए। शुक्रिया क्यूंकि देश के सुप्रीम कोर्ट ने आपके इस्लाम धर्म की लाज रख ली। तीन तलाक यानी एक बार में ही (एक ही समय में ) तीन बार तलाक कह देने भर से आपका उस औरत से हर रिश्ता नाता टूट जाता है जो अपना घर परिवार माँ बाप भाई बहेन सब कुछ छोड़ कर आपसे शादी कर आपके घर आती है। औरतों पर ज़ुल्मों की लिस्ट बड़ी लम्बी है, चाहे धरम कोई भी हो लेकिन आज सिर्फ मुसलमानों की ही बात कर लेते हैं। किसी की बीवी से अगर चाय गिर जाती है तो वो एक बार में ही तीन तलाक बोल के उसे अपने जिंदगी से निकाल देता है। अगर कोई औरत मर्द को बच्चा नहीं दे सकती तो वो भी उसे तीन शब्दों के सहारे अपनी ज़िन्दगी से बाहर कर देता है। कोई आदमी अपनी बीवी को किसी लडके से हस के बात करते देख लेता है तो भी वो एक झटके में उसे अपनी ज़िन्दगी से निकाल फेकता है। कभी कभी सास ससुर की बहू पसंद नहीं आती तो वो अपने लल्ला से कहके उस औरत को तलाक दिलवा देते हैं।

    लेकिन याद रहे और ध्यान रहे कि मैं तीन तलाक़ के बारे में बात कर रहा हूँ और सबके लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि ये तरीका इस्लामिक तरीका नहीं है। कुरान में कहीं भी किसी भी आयत में ये नहीं है की आप अपनी बीवी को एक बार में तीन बार तलाक़ बोल के उससे छुटकारा पा सकते है। पैग़म्बर मोहम्मद ( peace be upon him) ने कहा है की अल्लाह को जो लफ्ज़ सबसे जादा नागावार है वो तलाक है। इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे देश में लोग तीन तलाक़ दे रहे थे। मौलाना और उलेमा इसपर चुप थे। क्यूँ चुप थे मुझे नहीं पता। शायद इसका एक ही कारण हो सकता है। Men dominating Society में पैदा होना, औरत को बस उपभोग की एक वस्तु समझना और उन्हें नकाब के अंदर छुपा के ही रखना। शायद ये डर भी है की अगर ये नकाब उठ गया तो ये औरतें उनसे कहीं आगे निकल जाएगी, फिर पित्रसत्ता का क्या होगा। औरतें जितनी तेज़ी से आगे बढेंगी पित्रसत्ता उतनी तेज़ी से ख़तम होने लगेगी।

    फ़िलहाल देश के सर्वोच न्यायालय में कुरान में मौजूद तलाक के तरीके पर कोई सवाल नहीं उठाया। इस्लामिक तरीके से तलाक देना कोई बुरी बात नहीं है। उसने तीन महीने का वक़्त देना होगा, हर महीने एक तलाक देनी होगी और तीन महीने होने तक उसमे ऐसी शर्तें और मसले हैं की ज्यादातर सुलह की सूरत ही सामने आती है, जिसमे औरत के हक का पूरा ख्याल रखा गया है, और अगर किसी औरत के साथ न्याय नहीं हो रहा है तो वो कोर्ट जा सकती है। हमारे देश का कानून इतना सक्षम है की वो उसे न्याय दे सके। लेकिन एक सच ये भी है की कानून बैसाखियों पर चलता है। धीरे धीरे… बहुत धीरे… सालों बीत जाते हैं कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते लेकिन अंत में न्याय मिल ही जाता है। तलाक़ का होना भी समाज में बेहद ज़रूरी है चाहे वो धार्मिक तरीके से हो या कानूनी तरीके से। सात जन्मों का वचन ले कर शादी कर ली। मिया बीवी से बन नहीं रही है लेकिन दोनों को एक साथ ही रहना पड़ेगा… पति तलाक नहीं देगा… हाँ ज्यादा गुस्सा आ गया तो उसे जला के मार देगा लेकिन तलाक नहीं देगा… तलाक मर्द का ही नहीं बल्कि उन सारी औरतों का भी हक है जो किसी गलत रिश्ते में फस गयी है, किसी गलत इंसान के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने से अच्छा है की उससे अलग हो जाया जाये… छोटी जगहों पर लोग तलाक को गाली समझते है… अगर लड़की की तलाक हो गयी तो अरे बाप रे… वहीँ मर्द तलाक शुदा है तो इतना हो हल्ला नहीं होता… यहाँ भी मर्द और औरत के साथ फर्क किया जाता है, अब वक़्त आ गया है की हर धरम में तलाक की गाली की तरह नहीं एक अधिकार की तरह समझा जाये, तलाक आपकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए है, मुश्किलों को ख़तम करने के लिए है, मुश्किलें पैदा करने के लिए नहीं।

    देश के सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया की उन्होंने तीन तलाक को ख़तम किया। एक बार में तीन बार तलाक कह देना तलाक का सही तरीका हो ही नहीं सकता। हमारा जब किसी से झगड़ा होता है तो हम गुस्से में बहोत कुछ गलत बोल जाते है। कई बार ऐसा कुछ भी बोल जाते हैं जिससे हम खुद भी इत्तेफाक नहीं रखते और गुस्से में लिया गया कोई भी फैसला सही नहीं हो सकता। Instant तीन तलाक बहोत सारे मुस्लिम देशों में पहले से बैन है- पाकिस्तान, सऊदी अरब, मलेशिया और भी जाने कितने देश। जो मौलाना सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस्लाम या शरियत के खिलाफ बता रहे हैं उनकी बातों में ना आये। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहीं भी कोरानिक तरीके से तलाक को गलत नहीं ठहराया है और न ही उसपर कोई रोक लगायी है। रोक उस तरीके पर लगायी है जिसे मुल्ला मौलवियों ने खुद इजाद कर रखा था।अपने हिसाब से औरत का इस्तेमाल कर रहे थे।पैर में जूती की तरह उसे पहेन कर घूम रहे थे। अब ज़माना बदल गया है मुल्ला जी। अब हर पढ़ा लिखा आदमी और औरत कुरान और हदीस की PDF लेके घूम रहा है। आपके कहने से कुछ नहीं होगा। क्रॉस चेक करने के बाद ही अमल होगा। पूरी दुनिया में किसी भी मर्द को ये अधिकार नहीं होना चाहिए की वो तीन बार तलाक कह देने भर से किसी लड़की को अपनी ज़िन्दगी और घर से निकल दे।

    देश की उन औरतों के साथ मेरी संवेदनाये है जो किसी मर्द के गुस्से या शौक की वजह से तीन तलाक का शिकार बनी और उन औरतों पर गर्व है जो इस लडाई को सुप्रीम कोर्ट तक लेकर गयीं। देश की महिलाओं को अब ये जान लेना चाहिए की उन्हें किसी भी लड़ाई में किसी मर्द की ज़रुरत नहीं है। वो अकेले ही हर जंग लड़ सकती हैं और जीत सकतीं है।

    आपका
    बिलाल हसन