• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    स्वराज की संभावना ..

    स्वराज की ज़रूरत सिर्फ राज्य-सत्ता के लिए ही नहीं है, बल्कि वर्तमान भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में जो राजनीतिक पार्टियों की एक समानांतर सत्ता है, उसमें भी है। ‘सत्ता का विकेंद्रीकरण’ सिर्फ एक राजनीतिक मुहावरा नहीं! जब राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता के एक छोटे प्रारूप स्वराज स्थापित नहीं कर सकते, तो राज्य-सत्ता से इसकी उम्मीद बेमानी है। लोकतंत्र में राजनीतिक क्रांति का यही आदर्श है, यही चुनौती है। इस आदर्श को यथार्थ की धरातल पर उतारने के कई प्रयोग हुए। कुछ नाकाम रहे, कुछ सीमित अर्थों में सफल रहे, कुछ इस प्रक्रिया में यथार्थवादी हो गए, कुछ संघर्ष अभी भी चल रहे हैं।

    स्वराज के लिए संवाद और संघर्ष एक सतत प्रक्रिया है। यह आदर्श और यथार्थ को आत्मसात करने की प्रक्रिया है। इस सपने को साकार करने के लिए संघर्ष और संयम का संतुलन अपरिहार्य है। यदि संघर्ष कमज़ोर पड़ जाए लेकिन संयम बरक़रार रहे तो भी आंदोलन की धार कुंद पड़ जाती है और इतिहास के तारीख़ में बस एक आदर्शवादी प्रयास के रूप में दर्ज हो जाती है। इसके उलट यदि सघन संघर्ष हो लेकिन संयम न हो, त्वरित फल इच्छित हो, तो कालांतर में व्यावहारिकता जगह बनाने लगती है। ज़ाहिर है, स्वराज की स्थापना के लिए संघर्ष और संयम का संतुलन किस हद तक ज़रूरी है।

    स्वराज की संभावना सबसे ज़्यादा इस बात पर टिकी है कि इसके निमित्त अपने ‘स्व’ से कितना संघर्ष कर पाते हैं। अांतरिक संघर्ष इसकी बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी है। ‘स्व’ से संघर्ष का अर्थ है – साध्य और साधन की पवित्रता का आग्रह। सत्ता में स्वराज लाने के लिए सत्ता पर नियंत्रण चाहिए। सत्ता पर नियंत्रण के लिए संघर्ष की प्रक्रिया में भी यदि स्वराज की संभावना बरक़रार रहे, तभी सच्चे स्वराज की स्थापना हो सकती है। इस संभावना से अलग, सबसे बेहतर स्थिति में ‘सुराज’ तो हो सकता है लेकिन ‘स्वराज’ नहीं!

    अब प्रश्न यह है कि ‘स्वराज’ और ‘अनुशासन’ का क्या संबंध है? ‘अनुशासन इस बात का संकल्प है कि मनुष्य में काम करने की लगन है। त्याग, अनुशासन और संयम के बिना कोई मुक्ति नहीं है, कोई आशा नहीं है’ (गांधी)। यह अनुशासन स्वराज के मार्ग में बाधा नहीं है बल्कि उसे हासिल करने का अस्त्र है। अनुशासन के अभाव में संघर्ष की धार संयम का साथ छोड़ देती है। अनुशासन ही भटकाव की स्थिति में ‘स्व’ से संघर्ष पर अडिग रखता है, स्वराज की संभावना को बनाए रखता है। अनुशासन का एक दूसरा रूप भी है जो स्वराज की संभावना को कमज़ोर करता है, संवाद को अवरूद्ध करता है। यह ‘स्व’ से संघर्ष की जगह ‘स्व’ की रक्षा की ओर ले जाता है। इस अनुशासन का प्रतिक्रियावादी स्वरूप ‘स्व’ को मज़बूत करने लगता है, परिणामस्वरूप ‘स्वराज’ कमज़ोर पड़ता जाता है।

    स्वराज के लिए संघर्षरत कोई भी व्यक्ति या समूह यदि संवाद के लिए खुले नहीं हैं, उनके लिए स्वराज की कोई संभावना नहीं है। अपने विचार और कर्म में स्वराज का अनुशासन ही समाज में स्वराज की संभावना को जन्म देता है। स्वराज के अनुशासन से अलग कोई भी प्रयास, सफल होने की स्थिति में भी, सिर्फ उसकी छाया मात्र ही होगा। अतएव, स्वराज के सत्याग्रही का यह मूल कर्तव्य है कि सर्वप्रथम अपने विचार में स्वराज को आत्मसात करे, फिर अनुशासन के साथ उसे कर्मों में उतारे। इस पूरी प्रक्रिया में साधन और साध्य की पवित्रता के प्रति सजग रहे। स्वराज की परिकल्पना कोरा आदर्शवाद नहीं, बल्कि व्यवहारिक आदर्श की स्थापना है।

     

    (Writer of the article Kunal Gauraw is an engineer by profession, currently working as a Image Processing Algorithm Developer in an Automotive Research Center in Gurgaon)