• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • pk

    शुक्रिया आमिर…ताकि सिर्फ जूता न रह जाए !

    हम लोगों ने दुनिया को उलझा लिया है इसे सुलझाने के लिए हमें फिर से एलियन बनकर ही धरती को देखना होगा। जैसे देखने के लिए पीके किसी अनजान ग्रह से धरती पर आता है। वो धरती को गोला कहता है। अंतरिक्ष में तैरते अनगिनत गोलों में से एक छोटा सा गोला। एक छोटा सा गोला ताकि मज़हब और मुल्क की सीमाओं के बीच घिरे हम और आप अपने नज़रिये का विस्तार कर सकें। हम एक बार बाहर से धरती को देख सकें कि हमने इसके बाशिंदों को किस कदर बांट दिया है। विधू विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी की फिल्म पी के अपने रीलिज होने के समय के संदर्भ के कारण भी एक रोचक और साहसिक फिल्म बन जाती है।

    यह फिल्म बताती है कि कई बार आपको  कही जा चुकी और जानी-पहचानी कहानियों के सहारे ही ज़िंदगी में लौटना पड़ता है। हर बार किसी आसमानी कहानी की तलाश में हम कहानी का सारा तारतम्य बिगाड़ देते हैं। आमिर ख़ान अपने स्टारडम को दांव पर लगाकर एक ऐसे समय में उन विषयों पर बात करने का रास्ता दिखा देते हैं जिनके बारे में इन दिनों बात करते हुए कई लोग कहते हैं कि लोग कहां सुनने वाले हैं इन बातों को। वो सेकुलर शब्द का इस्तमाल नहीं करते हैं। वो मज़हब का भी इस्तमाल नहीं करते हैं। वो उन जुमलों से दर्शकों को निकालकर उस ज़मीन पर ले जाते हैं जहां हम सब नंगे खड़े हैं। जहां हम सबको एक बार फिर से नंगा होकर ही सोचना होगा। नंगा होने का मतलब उस अर्थ में नहीं जैसा कि फिल्म के पोस्टर को देखकर कई लोग सोचने लगे थे। नंगा होने का मतलब उन बेकार की दलीलों के आवरण को उतार फेंकना और अपनी मनुष्यता को पहचानना। दांव ही था कि इस फिल्म की कहानी को जानबूझ कर तमाम प्रोमो से दूर रखा गया। किसी भी प्रोमो में कहानी की कोई झलक नहीं है। ऐसे संवाद भी नहीं है जिससे पता चले कि फिल्म किस पर चोट करने वाली है। यह सब उन तत्वों से बचने के लिए किया गया जो ऐसे मौके पर आस्था के नाम पर प्रदर्शन करने लगते हैं और अदालत चले जाते हैं।

    इस फिल्म की सार्थकता उस संयोग के कारण भी बड़ी हो जाती है जब आज ही दिल्ली के अखबारों के पहले पन्ने पर हरियाणा के सिरसा के विवादित तथाकथित संत राम-रहीम की फिल्म का फुल पेज विज्ञापन छपा । चार-चार पन्ने का विज्ञापन।  जिसमें राम रहीम ने दावा किया है कि वो भगवान का मैसेंजर है। संदेशवाहक है। यह फिल्म राम-रहीम ने ही बनाई है। फिल्म के पोस्टर पर आप पहली बार किसी संत को नायक की तरह बाइक पर सवार देखेंगे। कुछ ही दिन पहले हरियाणा में रामपाल का गढ़ हम सबने ढहते देखा है। ऐसे संत ख़ुद को अदालत और नागरिकता से ऊपर समझने का मुगालता पाल लेते हैं। अवतार घोषित कर खुद अदालत बन जाते हैं। हम सब ऐसी धार्मिकताओं से घिरे हुए हैं और इन्हीं सब को असली आध्यात्म मानने लगे हैं।

    ऐसे वक्त में मुंबइया फिल्म का एक बड़ा स्टार अपनी टोपी उस रिंग में उछाल देता है जहां आस्था के नाम पर कहने की हिम्मत कमज़ोर पड़ चुकी है। जहां धर्म के नाम पर ताकत बटोरने वाले ही विजयी हो रहे हैं। उस न्यूज़ एंकर के पीछे त्रिशुल घोंप देते हैं जिसका दर्द महसूस करते हुए वो बार बार कहता है कि धार्मिक मसलों से पंगा लेना मेरे बस की बात नहीं है। आमिर सिर्फ फिल्म के भीतर पंगा नहीं लेते बल्कि फिल्म के बाहर बन रहे समाज से भी पंगा लेते हैं जिसमे न्यूज़ चैनल भी शामिल हैं। निर्मल बाबा के चमत्कारी उपायों का प्रसारण करते हैं और दुख निवारण यंत्र बेच रहे हैं। इतनी ही नहीं ऐसे संतों की राजनीतिक सत्ता और बाज़ारी दुकानदारी से भी आमिर ने इस फिल्म में लोहा लिया है।

    यह फिल्म हम सबको अच्छा बनाती है। बता रही है कि हमने अपने ऊपर इतने कपड़े डाल लिये हैं कि खुद को देखना तक बंद कर दिया है। एक कौव्वा को दिखाकर आमिर कहते हैं कि देखो वो नंगा है क्या। दरअसल नंगापन कपड़े के होने या न होने से नहीं होता। नंगापन होता है हमारे ढकोसलेपन में। धार्मिक अंधविश्वास और नफ़रत से लड़ने का साहस आमिर ने किया है। पहले भी ऐसी फिल्में बनी हैं। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि संदर्भ से फिल्म बड़ी होती है।

    आज चारों तरफ धर्मांतरण,धार्मिक संकीर्णता और धार्मिक कट्टरता के बयान सुनाई दे रहे हैं। राजनीतिक सत्ता के दम पर धार्मिक संगठन ग़ैर संवैधानिक बातें बोल रहे हैं। उनकी बातों में इंसानियत के तत्व नहीं हैं। जो सही सोच के लोग हैं वो भी कहते हैं कि सेकुलर शब्द का नाम लेने वाला कोई नहीं रहा। हमारा मतदाता भी संकीर्णता की तरफ चला गया है ठीक ऐसे वक्त में आमिर लोगों में भरोसा खोज लेते हैं कि ये वहीं लोग हैं जिनसे इन सब सवालों पर बात की जा सकती है।

    अगर नहीं की जा सकेगी तो आमिर ये भी कहने की हिम्मत कर जाते हैं कि इस गोले पर सिर्फ जूता बचेगा। उनके हाथ में उस दोस्त का जूता है जो कुछ देर पहले रेलवे स्टेशन पर हुए बम धमाके में मारा जाता है। पेशावर हमले में भी स्कूल के बच्चे का ख़ून से सना एक जूता बच जाता है। जिसे ट्वीटर पर लोग साझा कर रहे थे। इस वहशीपन और जूनून के ख़िलाफ आमिर तर्क की बात करते हैं। उनकी बातों पर विश्वास करने के लिए इसी ख़राब और फितूरी हो चुके मीडिया से एक पत्रकार निकल आती है। जग्गू बनी अनुष्का और उसे एक संपादक का साथ मिलता है बाजवा बने बोमन ईरानी का। विधू विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी को बधाई देनी चाहिए कि वे ऐसी फिल्म बनाने की हिम्मत कर पाए। फिल्म पूरी तरह पारिवारिक है और कम से कम बच्चों को तो दिखानी ही चाहिए ताकि वे अपने आस-पास जड़ हो चुकी तस्वीरों को नए सिरे से देख सकें।

    फिल्मी समीक्षक इसे एक तारा या ढाई तारा देते रहेंगे लेकिन एक दर्शक की निगाह से फिल्म देखते हुए महसूस किया कि सिनेमा हाल में मौजूद सारे लोग इस कदर खामोश हो गए जैसे किसी ने उनकी नब्ज़ पकड़ ली हो। जब दर्शक सहमत हो जाएं और वो थोड़ी देर के लिए सही, अच्छे के लिए बदल जाएं तभी कोई फिल्म बड़ी होती है। हमेशा अपने क्राफ्ट या शैली के कारण ही कोई फिल्म बड़ी नहीं होती। इसलिए धरती पर सिर्फ जूता ही न बचा रह जाए इस फिल्म को देखिये और न भी देखें तो इन सवालों पर तमाम कपड़ों के आवरण उतार कर सोचिए। ऐसा करके भी आप पीके देख लेंगे। पीके देखने के लिए पीके देखना ज़रूरी नहीं है। अब क्या करें। फर्स्ड डे फर्स्ट शो फिल्म देखने की पुरानी आदत जो है।

    • Ashwani

      seems to be very interesting movie, will try to watch it asap

    • ranginee09 .

      Well written review.