• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    सत्येंद्र दुबे, मंजुनाथ, डी के रवि, ज़िया उल हक़, नरेंद्र कुमार और अब सौरभ कुमार, न जाने और कितने ?

    सत्येंद्र दूबे, मंजुनाथ शणमुगम, डी के रवि, ज़िया उल हक़, नरेंद्र कुमार तो याद हैं ना आपको? या भूल गए? अगर भूल गए हैं तो इनके जैसे ही एक नयी कहानी सुनाता हूँ आज आपको।

    31 साल के सौरभ कुमार ने 2008 में BIT सिंदरी से इंजीनियरिंग की। पढ़ाई के बाद भारतीय रेलवे में उनका चयन हुआ। बिहार के रहने वाले सौरभ को पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में पोस्टिंग मिली।

    कहा जा रहा है कि कुछ दिन पहले उनपर एक टेंडर पास करने का दबाव आया। उसके दोस्त बताते हैं कि पिछले कुछ दिनों से सौरभ भारी मानसिक दबाव में था। रेलवे का धंधा किस कदर माफिया राज से चलता है ये हममें से कई लोग जानते होंगे। रिश्वत देने की कोशिश हुई तो सौरभ ने टेंडर रिजेक्ट कर दिया, लेकिन उस युवा ने ईमानदारी से समझौता नहीं किया। मैंने जो शुरू में कुछ नाम लिए, वो इस बात का सबूत है कि हमारे देश में ईमानदारी की कीमत कभी कभी जान देकर चुकानी पड़ती है। सौरभ का भी यही हुआ। कीमत सौरभ को भी चुकानी पड़ी, अपनी जान देकर। सौरभ की लाश उसके कमरे में मिली। शरीर जला दिया गया था और किसी भारी हथियार से चेहरे पर मारा गया था।

    हमारी तेज तर्रार पुलिस को FIR दर्ज़ करने में 10 दिन लग गए। वो भी तब जब सौरभ के परिवार और कॉलेज के दोस्तों ने सोशल मीडिया के जरिये दबाव बनाया। 22 सितम्बर को सौरभ की मृत्य हुई और पुलिस ने मामला दर्ज़ किया 2 अक्टूबर को। और तो और, मौत का जो कारण बताया गया वो शायद आप यकीन भी ना कर पाएं। जी हाँ, पुलिस का कहना है कि सौरभ को सांप ने काट लिया!

    मुझे भी लगता है कि ईमानदार सौरभ को सांप ने ही काटा है, उस “सांप” ने जिसने हमारे सिस्टम को भी काट रखा है। उसी सांप ने जिसने सत्येंद्र दुबे, मंजुनाथ और ज़िया उल हक़ जैसों को काटा था। उसी सांप ने जिसको मारने का वादा करके हर नेता अपना चुनाव जीतता है। वही सांप जो आज सरकार से भी ज़्यादा ताकतवर दिखता है। ये सांप खुले आम हमारे समाज में घूमता है। अगर आपको समझौता करना नहीं आता तो आपको भी काट सकता है।

    हमेशा की तरह इस बार भी ये सांप जीतता दिख रहा है। हमें आज सौरभ के साथ खड़ा होना पड़ेगा, न्याय के लिए लड़ना होगा। हम सब को अपने अपने तरीके से इस सांप को कमज़ोर करना होगा। हममें से कोई भी अकेले इतनी ताकत नहीं रखता कि “सांप” को मार सके लेकिन हम साथ मिलजुलकर अपना हिस्सा ज़रूर निभा सकते हैं।

    सौरभ को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी।