• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Photo Courtesy - Indian Express
    Photo Courtesy - Indian Express

    सफ़ाई की दवाई

    रात ग्यारह बजे दिल्ली की कई कालोनियों से होती हुई मेरी कार घर की तरफ़ बढ़ी चली जा रही थी। एफ एम रेडियो पर थोड़े अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दमदार आवाज़ गूंजने लगी। क्या हम सवा सौ करोड़ भारतवासी अपने देश को साफ नहीं कर सकते। इसके तुरंत बाद दिल्ली के बीजेपी अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की खनकदार आवाज़ आती है। बताया तो यही जा रहा है कि सफाई अभियान राष्ट्रीय अभियान है लेकिन विज्ञापन में इसके विराट आह्वान को सतीश उपाध्याय बीजेपी से जुड़ने और उसके सदस्य बनने के कार्यक्रम में बदल देते हैं। एक फोन नंबर का ज़िक्र होता है जिस पर मिस्ड काल देने से आप बीजेपी के सदस्य बन सकते हैं। आम आदमी पार्टी सहित कई दलों ने इस मिस्ड काल का इस्तमाल कर लिया है। ख़ैर मिस्ड काल हमारी राजनीति की नई हकीकत है। कार्यकर्ता ऐसे ही किसी दल के पास नहीं हैं और हैं तो वो सड़कों पर सफाई तो नहीं ही कर रहे हैं। लिहाज़ा वो राजनीति में होते हुए भी मिस्ड ही हैं यानी ग़ैर हाज़िर हैं। ऐसे ग़ैर हाज़िर लोगों के दम पर राजनीतिक दल अपनी सदस्यता का दावा कर रहे हैं। सक्रिय सदस्य नहीं मिस्ड-सदस्य ही अब किसी पार्टी की पूंजी है।

    कार्यकर्ताओं के इस ग़ैर-हाज़िर सदस्यता की तरफ ध्यान गया ही था कि कैसे हमारी राजनीति टीवी पर दिखाये जाने वाले डांस इंडिया डांस जैसे कार्यक्रमों में मोबाइल के मिस्ड काल के ज़रिये सुपर डांसर घोषित करने के फार्मूले में बदल चुकी है, मेरी नज़र दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने लगी। हर तरफ गंदगी बिखरी हुई है। वहां भी गंदगी है जहां स्वस्छता अभियान के पोस्टर लगे हैं। वहां भी हैं जहां पोस्टर नहीं लगे हैं। यह शहर कई हिस्सों में ठीक-ठाक साफ-सुथरा है। नई दिल्ली के इलाके में इसलिए साफ-सुथरा दिखता है क्योंकि इलाका वीआईपी होने के कारण साफ-सफाई की एक व्यवस्था है। कदम-कदम पर डस्टबिन दिखेंगे और यूनिफार्म पहने सफाईकर्मी। नई दिल्ली का यह इलाका, दिल्ली के अलग अलग इलाकों से आने वाले लोगों की वजह से गंदा नहीं होता। होता है तो साफ हो जाता है। मगर ये लोग जिन इलाकों से नई दिल्ली आते हैं वहां गंदगी ही गंदगी है। ऐसा तो नहीं हो सकता है कि पूर्वी दिल्ली से नई दिल्ली पहुंचकर लोग सभ्य हो जाते हैं और फिर पूर्वी दिल्ली लौट कर असभ्य। ज़ाहिर है पूर्वी दिल्ली की व्यवस्था ख़राब होगी। वहां नियमित साफ-सफाई नहीं होती होगी। होती भी होगी तो इलाके के अनुपात में इसकी व्यवस्था अपर्याप्त होगी।

    बहरहाल मैं रेडियो एफएम पर स्वच्छा अभियानों की गूंज सुनते हुए तमाम छोटे-बड़े नेताओं के पोस्टर देखने लगा। स्वच्छता अभियान ने बीजेपी के हाज़िर कार्यकर्ताओं को एक नया मौका दिया है जिसके बहाने वे अपने पोस्टर लगा सकें। अभी तक दिल्ली में होली से लेकर गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं वाले होर्डिंग पोस्टर के ज़रिये कार्यकर्ता अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। बीजेपी ने भी यह भी एक नायाब प्रयोग किया है। उसके कार्यकर्ता अब जनधन योजना और स्वच्छता अभियानों के बहाने पोस्टर लगा रहे हैं। किसी राजनीतिक दल को इस पर गौर से देखना चाहिए । अक्सर उसके कार्यकर्ता अपनी सरकार के कार्यक्रमों को नहीं अपनाते लेकिन बीजेपी का सामान्य से सामान्य कार्यकर्ता भी स्वच्छता अभियान से जुड़ा पोस्टर लगा रहा है। स्वच्छता अभियान के ज़रिये बीजेपी ने सरकारी योजनाओं की ब्रांडिंग बदल दी है। वो लांच होती हैं राष्ट्रीय भावना के नाम पर लेकिन बीजेपी पहले दिन से ही उसे राजनीतिक क्रायक्रम से अलग नहीं होने देती। यह राजनीतिक संवाद की दिशा में एक बड़ा बदलाव है।

    इस प्रक्रिया में यह भी देखना चाहिए कि ये होर्डिंग पोस्टर किस मात्रा में कूड़ा कचरा उत्पादन कर रहे हैं। जिस तादाद में होर्डिंग लगे हैं वो निश्चित ही एक दिन पर्यावरण में प्रदूषित ही करेंगे। ऐसा नहीं है कि बाकी दलों के होर्डिंग से प्रदूषण नहीं होगा लेकिन जो होर्डिंग स्वच्छता के अभियान से जुड़ा है उसमें पर्यावर्ण के प्रदूषण की चिन्ता तो होनी ही चाहिए। प्लास्टिक या फ्लैक्स के होर्डिंग कैसे स्वच्छता के प्रसार का माध्यम बन सकते हैं, इन्हीं सब उत्पादों के कारण तो शहर से लेकर गांव तक में कचरा फैला है। आप किसी भी कचरे के ढेर को जाकर देखिये। वहां प्लास्टिक, पोलिथिन, फ्लैक्स और खाद्य पदार्थों के डिब्बों की भरमार होगी। क्या प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि सिर्फ सफाई नहीं करनी है बल्कि इन सब प्रदूषित पदार्थों से भी बचना है। क्या उन्होंने कहा कि प्लास्टिक पर सौ प्रतिशत प्रतिबंध लगायेंगे, कंपनियों की ज़िम्मेदारी होगी कि वे खाद्य पदार्थों की बिक्री के बाद इस्तमाल किये हुए डिब्बों को वापस खरीदें और उनका निस्तारण करें। क्या स्वच्छता अभियान प्रदूषण के इन कारणों को लेकर सार्वजनिक बहस का माध्यम नहीं बन सकता था, क्या ऐसा हुए बिना हम वाकई सफाई के मकसद को हासिल कर लेंगे।

    सबसे पहले इसकी समझ बने कि कचरा है क्या, यह कैसे बनता है। कचरा कहां फेंकना है और ख़ुद साफ करना है इसकी पढ़ाई तो स्कूलों में होती ही है लेकिन क्या यह सोचा गया कि लोग क्यों कहीं पर भी कचरा फेंकते हैं। निश्चित ही नागरिक संस्कार की कमी के कारण ऐसा करते हैं लेकिन नागरिकता संस्कार से नहीं बनती है, वो बनती है कानून, प्रावधान और जवाबदेही से। संस्कार इसके बाद आता है। दस बारह किलोमीटर चलने के बाद मैंने नोटिस किया कि दिल्ली में आबादी के हिसाब से कचरा फेंकने के डब्बे या कितने कम हैं। डस्टबिन नहीं दिखी और मोहल्ले में कोई एक या दो जगहों पर ही कचरा घर है। ये सब नहीं होगा तो लोग जहां तहां कचरा फेंकेंगे ही। प्रधानमंत्री के प्रभाव में दिल्ली नगर निगम ने लाखों खर्च कर हर जगह पोस्टर लगा दिया कि सुसु कुमार मत बनिये। यहां वहां पेशाब न करें। क्या उन पोस्टरों में यह बताया गया कि निगम की तरफ से दिल्ली में इतने शौचालय बनाये गए हैं, इतने किलोमीटर पर शौचालय मिलेगा, वो काफी साफ सुथरा है आप वहां जाकर पेशाब कीजिए। नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली के इलाकों को छोड़ दीजिये तो पुरुषों के सार्वजनिक शौचालय बेहद कम हैं, भयानक रूप से गंदे हैं और महिलाओं के लिए तो नाम मात्र भी नहीं है।

    सुविधायें नहीं होंगी तो समस्याएं उभरेंगी। बिना सुविधाओं का इंतज़ाम किये महज़ जन भागीदारी के प्रचार से कुछ नहीं होगा। प्रचार से इतना ज़रूर हासिल हुआ है कि लोगों ने फिर से इस विषय पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। कई जगहों पर सफाई अभियान हुए भी हैं और कई जगहों पर इसे लेकर नौटंकी भी दिखी है। प्रचार प्रसार से जागरुक होने की घोषणा करने वाले वही लोग साफ-सफाई करने नहीं जा रहे हैं। वो नहीं कर सकते हैं। सफाई का काम रोज़ का है। दो अक्तूबर का नहीं है। लिहाज़ा यह अभियान स्वच्छता के लिए कम राजनीतिक दल का प्रोपेगैंडा ज्यादा हो गया है। अभियान की नैतिकता और मंशा पर कोई शक नहीं कर सकता,बल्कि यह बेहद ज़रूरी सवाल है जिसे इसी स्तर पर उठाया जाना चाहिए लेकिन अंत में ऐसे आयोजन ढोंग में क्यों बदलते दिखते हैं। क्या स्वच्छता अभियान प्रधानमंत्री या बीजेपी की ब्रांडिंग के लिए ही है। अगर यह कामयाब होता है तो लाभ इन्हीं को मिलना चाहिए लेकिन कामयाब होने से पहले ही लाभ ले लिया जाए क्या ये भी ठीक है। सरकार के तमाम विभाग इस अभियान के लिए विज्ञापन दे रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपने सारे होर्डिंग स्वच्छता अभियान को समर्पित कर डाले हैं। निजी कंपनियां भी राजनीतिक श्रद्धा का प्रदर्शन करने के लिए ऐसे विज्ञापन दे रही हैं।

    जिस अनुपात में स्वच्छता अभियान के प्रचार प्रसार पर पैसे खर्च हो रहे हैं उसकी गणना कोई क्यों नहीं कर रहा है। इतने पैसे से दो महीने के भीतर दिल्ली के चप्पे चप्पे पर डस्टबिन से लेकर शौचालय तक बन सकते थे। पूरे देश के लिए दिल्ली ही उदाहरण बन जाती। लगता कि ये एक जगह है जहां सरकार ने सौ प्रतिशत न सही साठ या सत्तर प्रतिशत साफ करके दिखा दिया है। अकेले दिल्ली की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए चालीस से पचास हज़ार सफाई कर्मियों की स्थायी नियुक्ति की ज़रूरत बताई जा रही है। क्या सरकार ये करेगी। क्या वो सफाई के काम को सम्मान प्रदान करेगी, अच्छी नौकरी में बदलेगी। जब करेगी तभी स्वच्छता अभियान की ठोस शुरूआत होगी। वर्ना लोग साफ नहीं कर रहे हैं। शहर वैसे ही गंदा है जैसे पहले था। अपवादों को छोड़ दें तो इस अभियान को लेकर नागरिक उदासीनता वैसे ही बरकरार है। स्कूलों में स्वच्छता के प्रोजेक्ट ज़रूर बढ़ गए हैं। इससे जागरुकता आती है लेकिन जब तक व्यवस्था नहीं होगी वो जागरूकता नहीं टिक पाएगी।

    अभी इस अभियान को लांच हुए एक ही महीना हुआ है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में दिल्ली ही नहीं हर ज़िले और शहर में सफाई कर्मी रखें जाएं और एक नागरिक व्यवस्था बने जिसकी देखरेख की जिम्मेदारी लोगों पर हो। कम से कम शहर को गंदा करने में सहयोग न करें लेकिन यह कैसे होगा इसकी कोई ठोस रुपरेखा सफाई को राष्ट्रीय कर्तव्य में बदलने का आहवान करने वाले करोड़ों रुपये के पोस्टरों में नहीं दिखती है। हमारी राजनीति अब ब्रांड पैदा करने के फार्मूलों पर चलने लगी है। एक नैतिक अभियान बहुत बड़ा अवसर देता है ब्रांड बनाने या उसके विस्तार करने का। इसे हर कोई करना चाहेगा लेकिन जनता को नज़र रखनी चाहिए कि करोड़ों रुपये के स्वच्छता अभियान के प्रचार प्रसार के बाद उसका शहर साफ क्यों नहीं है। सिर्फ यह कह देना कि सवा सौ करोड़ भारतीय मिलकर साफ करेंगे, काफी नहीं हैं। हम सब साल में एक दिन तो शहर गांव की सफाई करें लेकिन बाकी के दिन सफाई तभी होगी जब व्यवस्था कायम होगी, महज़ प्रचार से नहीं होगा। क्या आपने अपने शहर या गांव में ऐसा होते देखा है, सुना है, अगर ऐसा हो रहा है तो स्वच्छता अभियान का शुक्रिया अदा करना न भूलें।

    नोट- दिल्ली की एक अदालत ने फटकार लगाई है कि अगर ये साठ हज़ार सफाईकर्मी शहर को साफ नहीं रख सकते तो इन्हें बर्खास्त कर देना चाहिए। अदालत की झुंझलाहट भी यही कह रही है कि सिस्टम बनाना ही पड़ेगा)

    • ranginee09 .

      “jhaadu’ reminds me of a Russian story which I had read in my childhood. A staff/walking stick was used as an oar, climbing support, aid for pole vault as per the demand of the situation. The symbol of jhaadu has been associated with anti-corruption activism, clean India campaign and the latest being political propaganda as highlighted in the article. So much so that the fourth pillar of democracy have been urged to transform their pen into jhaadu. It must be a interesting to observe the mass ‘Nautanki’ going on over the symbol of Jhaadu but one dreads the day when along with dry leaves basic human rights, harmony, right to education, environment everything will be swept clean and only ‘Nautanki’ will remain.