• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • secularism

    सच्ची सांप्रदायिकता बनाम झूठा सेक्यूलरवाद

    आज सेक्यूलरवाद अग्निपरीक्षा से गुजर रहा है। अपने आपको सेक्यूलरवादी कहने वाली राजनीति आज सेक्यूलरवाद की रक्षा करने में असमर्थ है। सच कहें तो सेक्यूलरवाद की राजनीति आज सेक्यूलर भारत के निर्माण में एक रोड़ा है। नंगी, आक्रामक और बलशाली सांप्रदायिकता की आग से गुजरते इस दौर में सेक्यूलरवाद को अपने अंधविश्वास, कायरता और पाखंड को भस्म करना होगा। इस अग्निपरीक्षा से जिंदा बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता है।

    सेक्यूलरवाद हमारे संविधान का एक पवित्र सिद्धांत है। पंथनिरपेक्षता भारत के सपने का अभिन्न अंग है। अगर भारत में किसी एक धर्म, पंथ और मतावलंबियों को बाकियों पर लादने की कोशिश की गई तो यह देश बचेगा नहीं। इस लिहाज से सेक्यूलरवाद भारत के बने रहने की शर्त है।

    सेक्यूलर राजनीति हमारे देश का एक बड़ा ढकोसला है। एक पवित्र सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देने की जिम्मेवारी जिस सेक्यूलर राजनीति पर आई थी, वह इस जिम्मेवारी का निर्वाह करने में असफल साबित हुई है। व्यवहार में यह सिद्धांत अल्पंसख्यकों के वोट बटोरने का नापाक हथियार बन गया है।

    आज सेक्यूलरवाद की यह बुनियादी कमजोरी खुलकर सामने आ गई है। 2014 के चुनाव के बाद से सेक्यूलर भारत के सपने पर अब तक का सबसे बड़ा हमला हो रहा है। देश विभाजन के समय हुए नरसंहार के बाद शायद सेक्यूलर भारत के आदर्श पर इतना बड़ा प्रश्नचिन्ह कभी नहीं लगा था। इससे पहले भाजपा की सरकार आई थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की उस सरकार ने इस आक्रामकता के साथ सांप्रदायिकता का पोषण नहीं किया था। उस सरकार के रहते गुजरात में नरसंहार भी हुआ था। लेकिन वाजपेयी सरकार ने सेक्यूलर मुखौटा पूरी तरह उतारा नहीं था। नरसंहार कांग्रेस के राज में भी हुए थे-1984 के सिख कत्लेआम और नेल्ली, मलियाना और मुंबई नरसंहार को कौन भूल सकता है। इन सब कांड में सरकारी मशीनरी का हाथ जगजाहिर है। फिर भी उन संकटों से गुजरते हुए यह संदेह नहीं हुआ कि सेक्यूलर भारत बचेगा या नहीं। आज आजादी के बाद पहली बार यह सवाल मुंह बाए खड़ा है। जिस तरह इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट था, उसी तरह मोदी राज भारतीय सेक्यूलरवाद का सबसे बड़ा संकट है। इमरजेंसी के अंत और इंदिरा गांधी की पराजय ने अंतत: लोकतंत्र की जड़ मजबूत की। क्या अगले तीन साल सेक्यूलरवाद इस अग्निपरीक्षा से और मजबूत होकर निकलता है या नहीं, यह आज के भारत का सबसे बड़ा प्रश्न है।

    आज पहली बार भारतीय राज्य व्यवस्था सेक्यूलर भारत की जड़ खोदने पर आमादा है। यह काम आहिस्ता और बहुत चतुराई से हो रहा है। मोदी सरकार ने संविधान और कानून के सेक्यूलर प्रावधानों से कोई छेड़छाड़ नहीं की है, करेगी भी नहीं। मोदी जानते हैं कि इस देश में अल्पसंख्यकों की हैसियत घटाने के लिए संविधान बदलने की जरूरत नहीं है। देश के 95 फीसदी नागरिकों के पास संविधान में लिखे अधिकारों को व्यवहार में हासिल करने का कोई औजार नहीं है। अपने अधिकारों की मांग करने लायक साधन, रसूख और आत्मविश्वास उनके पास नहीं है। उनके लिए संविधान की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट नहीं, बल्कि उनके थाने का एसएचओ करता है। ऐसे में अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने के लिए कानून या संविधान बदलने की जरूरत नहीं है। बस ऊपर से एसएचओ को इशारा ही काफी है।

    आज देश के अधिकांश भागों में यही हो रहा है। संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में कटौती किए बिना मुसलमान अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। दादरी में अखलाक की हत्या संयोगवश सुर्खियों में आ गया। ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं चारों ओर हो रही हैं। आए दिन गाय को पकड़कर ले जाने के संदेह में मुसलमानों को पकड़ने और मारने की खबर आती है। आतंकवाद के आरोप में बेगुनाह मुसलमान युवाओं की धर-पकड़ पहले से कहीं ज्यादा होने लगी हैं। राज्य सरकार भाजपा की हो या न हो, थानों में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का सलूक पहले से बढ़ गया है।

    सांप्रदायिकता का जहर जनमानस में भी पहले से ज्यादा फैल गया है। संघ परिवार के दुष्प्रचार का असर पहले से बढ़ा है। नई सरकार आने के बाद से मीडिया का एक बड़ा हिस्सा खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक जहर फैला रहा है। जिन अफवाहों पर पहले कोई कान नहीं देता था, आज उनका बाजार गर्म है। मुस्लिम जनसंख्या, इस्लामी आतंकवाद जैसे सवालों पर तमाम उल-जलूल तथ्य पेश किए जा रहे हैं। पढ़े-लिखे लोग भी कोरे झूठ को विश्वास करने को तैयार हैं, या कम से कम उस पर बहस करते हुए पाए जाते हैं।

    अल्पसंख्कों में, खासतौर पर मुसलमानों में भय और संशय का माहौल है। डरा हुआ आदमी समझदारी के काम नहीं करता। इस माहौल ने कई मुस्लिम युवाओं को उग्रवाद के रास्ते पर डाला है। आजादी के पहले 50 वर्ष तक मुस्लिम पार्टियों से परहेज करने वाला भारतीय मुसलमान इस माहौल में अपनी मुस्लिम पार्टी की तलाश करने लगा है। ओवैसी की मज़लिस-ए-इत्तिहाद-ए-मुसलमीन (एमआईएम) जैसी सांप्रदायिक पार्टी का उभार इसी खतरे की ओर संकेत करता है। हिन्दू और मुसलमान सांप्रदायिकता एक-दूसरे को मजबूत करती है।

    संकट की इस घड़ी में जमकर हर तरह की सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़े होने की बजाय सेक्यूलर राजनीति दिशाहीन है, घबराई हुई है। जनमानस और सड़क पर सांप्रदायिकता का प्रतिरोध करने की बजाय सत्ता के गलियारों में शॉर्टकट ढूंढ़ रही है। सांप्रदायिक सेक्यूलर राजनीति अपने नापाक इरादों के लिए संकल्पबद्ध है, इस मायने में सच्ची है। आत्मबल और संकल्प विहीन सेक्यूलर राजनीति अर्धसत्य का सहारा लेने को मजबूर है। सांप्रदायिकता नित नई रणनीति खोज रही है, अपनी जमीन पर अपनी लड़ाई लड़ रही है। सेक्यूलरवाद लकीर का फकीर है, दूसरे की जमीन पर लड़ाई हारने को अभिशप्त है। एक ओर बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच तो दूसरी ओर थके-हारे सेक्यूलरवाद की कवायद।

    यह संकट एक अवसर है। यह अवसर है सेक्यूलरवाद के सिद्धांत की पुनव्र्याख्या का, अवसर है सेक्यूलर राजनीति के पुनर्जन्म का। लेकिन इस पुनर्जन्म से पहले सेक्यूलरवाद को प्रसव पीड़ा से गुजरना होगा। इस अग्निपरीक्षा में सेक्यूलर राजनीति को बहुत-कुछ भस्म करना होगा।

    सेक्यूलरवाद एक नया शब्द भले ही हो, भारत में यह कोई नया सिद्धांत नहीं है। सम्राट अशोक के जमाने से इस देश के शासकों ने समझ लिया था कि नाना किस्म के पंथ और मतों वाले इस देश पर कोई एक धर्म लादा नहीं जा सकता। अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, लेकिन अशोक के प्रसिद्ध शिलालेख आज भी ‘पाषंडों’ (भिन्न मत या पंथ को मानने वाले) के प्रति सहिष्णुता बरतने की नसीहत देते हैं। अकबर की धार्मिक सहिष्णुता इसी खांटी भारतीय पंथ निपरेक्षता की परंपरा का हिस्सा थी। 1857 के संग्राम से शुरू हुए भारतीय स्वाधीनता आंदोलन ने इसी सहिष्णुता की परंपरा को अपनाया और उसे मजबूत किया। महात्मा गांधी की शहादत एक पंथ निरपेक्ष भारत के यज्ञ में एक आहुति थी।

    भारत का संविधान इस देश की मिट्टी में रचे-बसे सेक्यूलरवाद के इस सिद्धांत को मान्यता देता है। लिहाजा हमारा सेक्यूलरवाद विदेश से इंपोर्टेड माल नहीं है। इसकी भाषा आधुनिक है, लेकिन इसकी बुनियाद में जो सूझ-बूझ है वह देशज है। संविधान द्वारा धर्म के किसी भी एक संस्थागत रूप को राज धर्म का दर्जा देने से इनकार करना और सभी धर्मावलंबियों को अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आजादी देना इस देश की परंपरागत सूझ-बूझ को लिपिबद्ध करने का प्रयास भर है।

    लेकिन आजादी के बाद से सेक्यूलरवाद इस देश की मिट्टी से कट गया। सेक्यूलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी इबारत से सेक्यूलर भारत स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गांधी की भाषा छोड़कर विदेशी मुहावरा बोलना शुरू किया। सेक्यूलरवाद का सरकारी अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ इसी उधारी सोच का नमूना है। धर्म के संस्थागत स्वरूपों और अलग-अलग पंथ के बीच तटस्थ रहने की नीति धीरे-धीरे धर्म के प्रति निरपेक्षता में बदल गई। सेक्यूलरवाद का अर्थ नास्तिक होना और एक औसत भारतीय की आस्था से विमुख होना बन गया, सेक्यूलरवाद का विचार भारत के जनमानस से कटता गया।

    धीरे-धीरे सेक्यूलरवाद एक सरकारी औपचारिकता बन गया। सेक्यूलरवादियों ने औसत नागरिकों के दिलोदिमाग से संवाद बनाना बंद कर दिया। उन्होंने कानून कचहरी और राजसत्ता के सहारे सेक्यूलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। यह कोशिश लंबे समय तक चल नहीं सकती थी। उधर सेक्यूलरवाद की जड़ें खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और धर्म की भाषा पर कब्जा कर लिया। सेक्यूलरवादियों की लापरवाही और सांप्रदायिक ताकतों के दुष्प्रचार के चलते बहुसंख्यक हिंदू समाज के एक तबके को सेक्यूलरवाद में हिंदू-विरोध की बू आने लगी। देश के इस पवित्र सिद्धांत में देश की आम जनता की आस्था घटने लगी।

    इसके चलते सेक्यूलरवाद की राजनीति का भी पतन हुआ। आजादी के आंदोलन में सेक्यूलरवाद एक जोखिम से भरा सिद्धांत था। आजादी के बाद सेक्यूलरवाद एक सुविधाजनक राजनीति में बदल गया। चुनावी राजनीति में बैठे-बिठाए अल्पंसख्कों के वोट हासिल करने का नारा बन गया। जैसे-जैसे कांग्रेस की कुर्सी को खतरा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे अल्पसंख्यकों के वोट पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ने लगी। अब अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों को वोट बैंक की तरह बांधे रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी हो गई।

    व्यवहार में सेक्यूलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े हुए दिखना। पहले जायज हितों की रक्षा से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे जायज-नाजायज हर तरह की तरफदारी को सेक्यूलरवाद कहा जाने लगा। आजादी के बाद मुस्लिम समाज उपेक्षा, पिछड़ेपन और भेदभाव का शिकार था। देश के विभाजन के चलते अचानक नेतृत्वविहीन को वह इस समाज को शिक्षा और रोजगार के अवसरों की जरूरत थी। लेकिन उनकी इस बुनियादी जरूरत को पूरा किए बिना उनके वोट हासिल करने की राजनीति ने सेक्यूलरवाद की चादर ओढ़ना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेक्यूलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाए रखने की राजनीति हो गई। मुसलमानों को खौफज़दा रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट अपनी झोली में बंटोरते जाओ। नतीजतन मुस्लिम राजनीति मुसलमानों के बुनियादी सवालों से हटकर सिर्फ सुरक्षा के सवाल और कुछ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों (उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, शादी-ब्याह के कानून) के इर्द-गिर्द सिमट गई। जिस खेल को पहले कांग्रेस ने शुरू किया, उसे बाद में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लेफ्ट ने भी अपना लिया। डर के मारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों का बंधक बन गया। मुसलमान पिछड़ते गए और सेक्यूलर राजनीति फलती-फूलती रही। वोट बैंक की इस घिनौनी राजनीति को सेक्यूलर राजनीति कहा जाने लगा।

    सेक्यूलरवाद के पवित्र सिद्धांत को सेक्यूलरवाद की नापाक राजनीति का रूप देने के गहरे दुष्परिणाम हुए। धीरे-धीरे एक औसत हिंदू को लगने लगा कि सेक्यूलरवादी लोग या तो अधर्मी है या विधर्मी। उसकी नजर में सेक्यूलरवाद मुस्लिमपरस्ती या अल्पंसख्कों के तुष्टिकरण का सिद्धांत दिखने लगा। उधर मुसलमानों को लगने लगा कि सेक्यूलर राजनीति उन्हें बंधक बनाए रखने का षड्यंत्र है। इससे तो बेहतर है कि वे खुलकर अपने समुदाय की पार्टी बनाए। इस तरह सेक्यूलर राजनीति के पतन ने हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह के सांप्रदायिकता को बल दिया।

    सेक्यूलरवादी राजनीति की पराजय पहली बार राम जन्मभूमि आंदोलन में जाहिर हुई। बाबरी मस्जिद के विध्वंस और 2002 में गुजरात के नरसंहार से गुजरते हुए इस प्रक्रिया की परिणति 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत में हुई। उस हार के सदमे के बाद से सेक्यूलर राजनीति थकी, हारी और घबराई हुई देश के सामान्य जन को सेक्यूलर विचार से दोबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती के सामने वह थकी हुई है। पिछले 25 साल में तमाम छोटी-बड़ी लड़ाइयों में पराजित होकर आज वह मन से हारी हुई है। मोदी सरकार और संघ परिवार के नित नए हमले से वह घबराई हुई है। उसे किसी शॉर्टकट, किसी चमत्कार की उम्मीद है। देशभर में बीजेपी विरोधी मोर्चा बनाना और ऐसे गठबंधनों के सहारे किसी तरह बीजेपी को चुनाव में हराने की रणनीति इसी थकी-हारी मानसिकता का प्रतीक है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद क्षम्य है। राजकाज की असफलता भी क्षम्य है-जो आज भाजपा के खिलाफ खड़ा है वो सही है, सेक्यूलर है। यह रणनीति अल्पकाल में भले ही सफल हो, दीर्घकाल में यह आत्मघाती साबित होगी।

    आज चुनौती यह है कि सेक्यूलरवाद के पवित्र सिद्धांत के अनुरूप सिद्धांतपरक और प्रभावी सेक्यूलर राजनीति कैसे खड़ी की जाए? यह काम आसान नहीं है और अल्पकालिक भी नहीं है। इसके लिए कई साल ही नहीं, कई दशकों तक प्रयास करना होगा, सेक्यूलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा। यहां कुछ शुरुआती कदम चिन्हित किए जा सकते हैं।

    पहला-सेक्यूलर राजनीति को अपनी गलती को स्वीकार करना होगा। यह मानना होगा कि नरेंद्र मोदी की जीत के लिए सेक्यूलर राजनीति की कमजोरी ही नहीं उसका पाप भी जिम्मेवार है। सेक्यूलर राजनीति की कमजोरियों को छुपाने की बजाय उनकी सार्वजनिक आलोचना से ही एक नई सेक्यूलर राजनीति का जन्म हो सकता है।

    दूसरा-मुस्लिम राजनीति को केवल धार्मिक और प्रतीकात्मक मुद्दों से हटाकर समाज के पिछड़ेपन और उनके साथ हो रहे भेदभाव पर केंद्रित करना होगा। समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे मुद्दों पर एक सैद्धांतिक नीति अपनानी होगी।

    तीसरा- सांप्रदायिकता की राजनीति चाहे जिस शक्ल में हो-चाहे बहुसंख्यक की सांप्रदायिकता हो या अल्पंसख्यक की-सबका एक जैसा निषेध और विरोध करना होगा। मुस्लिम सांप्रदायिकता और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का खुलकर विरोध करना होगा।

    चौथा- जनमानस में फैलती सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए आम जनता से उसकी भाषा और मुहावरे में संवाद करना होगा। हमारी परंपराओं में धार्मिक सहिष्णुता के कुछ नमूने उठाने की बजाय इन परंपराओं से गहरा संवाद करना होगा।

    पांचवां- सांप्रदायिकता विरोध को भाजपा विरोध तक सीमित रखने की बजाय सांप्रदायिक राजनीति के हर स्वरूप को चिन्हित करना होगा। भाजपा के हर विरोधी को अपना हमसफर बनाने की बजाय समाज में नए सहयोगियों को चिन्हित करना होगा।

    छठा-सांप्रदायिकता की नित नई रणनीति का मुकाबला करने के लिए हमें भी अपनी रणनीति में परिवर्तन करना होगा।