• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    आर्डर आर्डर !

    न्यायपालिका नियुक्ति आयोग अब हकीकत है। इस बिल को पेश करते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पूरे भाषण में इस सतर्कता को बरत रहे थे कि वे कहीं से भी न्यायपालिका के ख़िलाफ़ न दिखें। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे उनके द्वारा पेश किया गया बिल जल्दबाज़ी में नहीं लाया गया है। उनके पेश करने से चार बार संवैधानिक संशोधन के प्रयास हुए हैं। सात बार उच्चस्तरीय कमेटियों ने सुझाव दिये हैं। इसके बाद वे बताते हैं कि नए बिल को तैयार करने से पहले उन्होंने सभी बड़े न्यायविदों से मशवरा भी किया है। लोकसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कई नाम गिनाते हैं मगर उन नामों में एक नाम सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायधीश या किसी भी मौजूदा न्यायधीश का ज़िक्र नहीं था।

    पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस ए अहमदी, पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस वी एन खरे,सोली सोराबजी, फलि एस नरीमन, शांति भूषण, के परासरन, के के वेणुगोपाल, के टी एस तुलसी, जस्टिस ए पी शाह, प्रो माधव मेनन, उपेंद्र सिंह, अनिल बी सिंह,अटार्नी जनरल, वकील की हैसियत से अरुण जेटली से मशवरा किया। सभी आए सिर्फ पूर्व चीफ जस्टिस जी बी पटनायक नहीं आ सके तो फोन कर सहमति दी। पी पी राव, अशोक देसाई, टी आर अंध्यार्जुन,हरीश साल्वे, जी एन वाहनवति सबने समर्थन किया। फिर मैंने कानून मंत्री की हैसियत से राजनीतिक दलों के 26 अध्यक्षों को खत लिखकर उनकी राय मांगी।

    कानून मंत्री 20 बड़े न्यायविदों से मिलकर राय लेते हैं। 26 पार्टी प्रमुखों से पूछते हैं मगर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा प्रधान न्यायधीश का ज़िक्र तक नहीं करते हैं। क्या इतने लोगों से पूछताछ में मौजूदा प्रधान न्यायधीश की राय को शामिल नहीं किया जा सकता है। क्या यह मुमकिन है कि इतने नाम कानून मंत्री की ज़ुबान पर आते हैं लेकिन चीफ जस्टिस का नाम नहीं आता है। वे भूल गए हों। तब जब इस विवाद में सार्वजनिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस एक पार्टी बन गए हैं।

    क्या टकराव की स्थिति है। सरकार के पास अपने रास्ते चलने के हज़ार तरीके होते हैं। उनमें वैधता की कोई कमी नहीं होती है बात है उदारता और सदाशयता की। क्या इस पैमाने से चीफ जस्टिस आफ इंडिया की राय नहीं ली जानी चाहिए थी। तब जब बिल पेश करने के एक दिन पहले चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा कह चुके थे कि कोलेजियम फेल है तो वे सब फेल हैं। कोई सिस्टम परफेक्ट नहीं हो सकता है मगर न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए जानबूझ कर गलत जानकारी फैलाई जा रही है। एक अभियान चलाया जा रहा है। इस पर पूरी सरकार चुप रह जाती है। कोई चीफ जस्टिस की बात को नोटिस तक नहीं लेता है। बाकी न्याय और कानूनविद भी चुप रह जाते हैं। कोई चीफ जस्टिस की वकालत नहीं करता है। अगर ये सब इतने ही संतुष्ठ थे कि कोलेजियम एक भ्रष्ट सिस्टम है तो आज से पहले अभियान क्यों नहीं चलाया। वे क्यों चुप रहते रहे।

    क्या ये चुप्पी नैतिक रूप से प्रधान न्यायधीश को परेशान नहीं कर रही होगी। आखिर उनका सार्वजनिक बयान पीछा तो कर रही रहा होगा कि मैं न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं होने दूंगा। एक अरब बीस करोड़ जनता को यकीन दिलाता हूं कि नहीं होने दूंगा। मैं हमेशा इसकी लड़ाई लड़ता रहा हूं। अगर ऐसा लगा तो कुर्सी छोड़ दूंगा। अब चीफ जस्टिस के सामने उनके ये बयान कौन सी स्थिति पैदा करते हैं आप समझ सकते हैं। लेकिन जब एक चीफ जस्टिस यह कह रहे हैं कि कोलेजियम ठीक है या कुछ कमियां हैं तो उनकी राय क्यों नहीं सुनी गई। क्या सरकार ने जानबूझ कर नज़रअंदाज़ किया या बहुमत के दम पर हैसियत बताने की कोशिश की।

    विवाद तो नए बनने वाले सिस्टम को लेकर भी है। इसके भी पूर्णकालिक न होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसके सदस्यों के बीच सरकार के वर्चस्व की बात हो रही है। यह सब तो नए सिस्टम में भी उठ रहा है। कोलेजियम को भी लेकर उठा है। इंडियन एक्सप्रेस में सात कानूनविदों ने लगातार सात लेख लिखें। ज्यादातर कोलेजियम पर इसी बात को लेकर सवाल उठा रहे हैं कि एक सिस्टम नहीं बना। जज दिन भर काम करते हैं और काम के बाद के समय में साल में सौ से ज्यादा जजों की नियुक्तियां करते हैं। इस पैमाने से यह सिस्टम तदर्थ है। कौन जज बनेगा, कैसे बनेगा इन सब बातों की पारदर्शिता नहीं है। पर पारदर्शिता का यह पैमाना तो नए सिस्टम में भी नहीं दिखा। कई कानूनविद सवाल उठा रहे हैं कि चयन की कमेटी बनी है मगर चयन कैसे होगा और किसका होगा और यह सार्वजनिक तरीके से होगा या गुप्त तरीके से इसे लेकर तो स्पष्टता अब भी नहीं है। बस एक नया सिस्टम बन गया। उन सवालों का क्या हुआ किसी को पता नहीं है। अलग अलग राय आ रही है। सोली सोराबजी कहते हैं कि अच्छा सिस्टम बना है। प्रशांत भूषण कहते हैं कि एक बार जब राष्ट्रपति न्यायिक आयोग के प्रस्तावित नाम को लौटा देंगे तो आयोग के सभी छह सदस्यों की सहमति अनिवार्य होगी। इस स्थिति में सदस्य के रूप में कानून मंत्री नकारात्मक वोट देकर सर्वसम्मति को तोड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षा वाले आयोग का सुझाया नाम अटक सकता है। दो सदस्य की नियुक्ति भी राजनीतिक लगती है। ये और बात है कि इनकी नियुक्ति एक कमेटी करेगी। जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी के नेता और चीफ जस्टिस आफ इंडिया होंगे। अब यह साफ नहीं है कि इन दो सदस्यों की नियुक्ति के लिए भी सर्वसम्मति का फार्मूला अपनाया गया है या इसमें किसकी प्रधानता चलेगी। हो सकता है कि आने वाले दिनों में कानूनविद इस बारे में अपना मत स्पष्ट करेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि राज्य सभा से पास होने के बाद देखना होगा कि न्यायपालिका इसे संविधान सम्मत मानती है या नहीं। मगर जिस तरह से सरकार प्रधान न्यायधीश को अलग थलग किया है अब नहीं लगता है कि न्यायपालिका टकराव के रास्ते जाएगी। कायदे से चीफ जस्टिस को इस प्रक्रिया से अलग कर लेना चाहिए क्योंकि वे कोलेजियम के पक्ष में थे और सरकार खिलाफ थी। नया सिस्टम कोलेजियम के पक्ष में नहीं है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिकूल टिप्पणी कर दी तब क्या होगा।

    रविशंकर प्रसाद ने ज़ोर देकर कई नामों को गिनाये। कहा कि आज कहां हैं एच आर खन्ना जैसे जज, कहां हैं कृष्णा अय्यर जैसे जज। क्या वाकई नब्बे के दशक के बाद से नाम लेने के लिए एक भी जज नहीं मिला जिनकी नियुक्ति कोलेजियम सिस्टम से हुई है। क्या ऐसा कहते हुए कानून मंत्री मौजूदा जजों पर भी टिप्पणी कर रहे थे। jरविशंकर प्रसाद ने कहा कि 1950 से 1993 तक का सिस्टम बेहतरीन चला। एक तरफ वे आपातकाल के समय साहसिक फैसले के लिए एच आर खन्ना का ज़िक्र करते हैं दूसरी तरफ 93 से पहले न्यायपालिका में हुए हस्तक्षेप के तमाम किस्सों को किनारे करते हुए तारीफ करने लगते हैं। क्या इसलिए कि वे सुप्रीम कोर्ट को सुना रहे थे।  एकाध नामों की मिसाल लेकर पूरे सिस्टम पर सवाल उठाया जा सकता है। किसी भी सिस्टम में कई बार काबिल लोग आने से रह जाते हैं मगर क्या इससे यह प्रमाणित हो जाता है कि सिस्टम ने किसी काबिल को चुना ही नहीं। जस्टिस काट्जू ने देर से ही सही एक ज़रूरी मुद्दे को उठाया। इससे कम से कम लोगों में साहस तो आय़ा कि वे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और गिरते स्तर को लेकर सार्वजनिक बहस कर सकें। बहस हुई भी। लेकिन क्या हमने न्यायपालिका में बदलाव के लिए ज़रूरी तमाम सोपानों को पा लिया है। राज्य से लेकर केंद्र तक में सरकार बदलती है तो सरकार वकील बदल जाते हैं। इस सिस्टम ने पूरी वकील बिरादरी को पार्टी लाइन पर बांट रखा है। कानून की राजनीतिक व्याख्या होती है या नहीं यह बताने योग्य मैं नहीं हूं। पर जज पेशेवर तरीके से बने तो सरकारी वकीलों के बनने का सिस्टम क्यों नहीं होना चाहिए। सरकार से बड़ा मुकदमेबाज़ कोई नहीं। सरकारी वकील बनाकर सरकार जनता के पैसे से एक बड़े तबके को उपकृत करती है। क्या इसका कोई पैमाना नहीं होना चाहिए। निचली अदालतों में नियुक्ति की मामला क्या है। इस पर कोई पहल क्यों नहीं करता है। पंजाब से एक सज्जन ने बताया कि जज लोग अदालतों में कर्मचारी नियुक्त करते समय पेशेवर मानदंडों का ख्याल नहीं करते हैं। तमाम तरह की पुष्ट अपुष्ट बातें हैं क्या इन सब पर एक स्टैंड नहीं लिया जाना चाहिए। कोलेजियम सिस्टम को तो जाना ही था। कांग्रेस सरकार भी पहले विधेयक लाई थी। मगर जिन सार्वजनिक संदर्भों के बीच गया है और जैसे गया है क्या वो उस पैमाने पर खरा उतरता है जिसकी दुहाई कानून मंत्री डाक्टर आंबेडकर की बातों के हवाले से दे रहे थे कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक संतुलन और आदरपूर्ण संबंध तो होना ही चाहिए।