• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    ओ मेरे वतन …

    ओ मेरे वतन

    मेरे खुश-चमन
    तू मेरा अदब
    तू मेरी नज़म
    तू मेरा लहू
    तुझको है नमन

    ओ मेरे वतन

    हम चिराग हैं
    अपने देश के
    हम तो फूल हैं
    तेरे खेत के
    तेरी सीचन से
    हम है जी रहे
    तेरी छावों में
    हम हैं खिल रहे

    ओ मेरे वतन

    तेरा आँचल क्यूँ भीगा ओस से
    तेरी गोद क्यूँ लाल हो गयी
    शोले गिर रहे अब यहाँ
    अमन की आस कहाँ खो गयी

    ओ मेरे वतन

    हर क्यूँ डरता है अब निकलने को
    हर क्यूँ डरता कदम बाहर चलने को
    दहशत भरा है दिन
    क्यूँ अजनबी रातें हुई
    तू है रो रहा कब से ओ चमन

    ओ मेरे वतन

    है अलग-अलग सबके चेहरे
    जितनी पार्टी(राजनीतिक), उतने चेहरे
    सब तू खो रहा
    नीलाम हो रहा

    ओ मेरे वतन
    ओ मेरे वतन

    तेरी मिटटी को मुहं पे पोत के
    हम है चल पड़े
    ले तिरंगा अपने हांथों में
    हम है बढ़ चले
    ज़ख्मों को तेरे
    लहू से धो देंगे
    शोले तुझपे जो गिरें
    बदन पे ले लेंगे

    हम पतंग हैं
    तू ही डोर है
    सबके जीवन की
    तू ही भोर है
    तू मेरी है माँ
    ओ मेरी ज़मीन
    जागे(जन्म) आँचल में तेरे
    मिटटी में तेरी सोयेंगे(मृत्यु)

    ओ मेरे वतन
    ओ मेरे वतन

    Bilal Hasan
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    Bilal Hasan

    Excels in playwrighting, direction & poetry. He hails from Lucknow & is working in entertainment industry in Mumbai.
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