• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • Narendra_Modi_

    मोदी के 100 दिन का बहीखाता 

    This article has been submitted by Shrikant Pratyush. He is a journalist who hails from Patna, Bihar.


    एक नई सरकार और नए नेता की सफलता और असफलता के बारे में उसके 100 दिन के काम काज पर निर्धारण करना बेहद मुश्किल है। इतने कम दिनों में राष्ट्र के बदलते मूड या राज्य व्यवस्था की स्थिति का सही आकलन का दावा भी मूर्खतापूर्ण है। हम इतना जरुर कर सकते हैं कि अबतक सामने आ चुकी सरकार की प्राथमिकताओं को, उसके काम करने के नए तौर तरीकों को आधार बनाकर आनेवाले दिनों का अनुमान लगा लें। नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले 100 दिन आशा से अधिक चिंता पैदा करते हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार की निक्कमी छवि साफ़ थी लेकिन मोदी के आन्दोलनकारी सरकार की रुपरेखा अभीतक अस्पष्ट हैं। मोदी की तत्परता और प्रशासनिक चुस्ती पर जोर देने से साकारात्मक सन्देश जनता के बीच गया है, लेकिन जिस तरह से सारी कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री कार्यालय में केन्द्रित होती जा रही हैं, वह लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं हैं अधिनायकवाद पैदा करती हैं।

    सबसे पहले सरकार के सकारात्मक पहलू पर एक नजर डालते हैं। प्रधानमंत्री के अबतक के जो बयान सामने आये हैं, लोकप्रिय कम ,जरुरी ज्यादा लगते हैं। वो बेपनाह झूठी उम्मीदें नहीं जगाते। सेंट्रल हॉल और स्वतंत्रता दिवस के दिन के प्रधानमंत्री के भाषण दूरदर्शी नहीं थे। कोई लोकप्रिय एलान उसमे शामिल नहीं था। फिर भी लोगों के दिलों को मोदी अपनी दिल की बात करके छू गए। उन्होंने उस भाषण में केवल उन्ही मुद्दों और समस्याओं को उठाया जिनसे आम लोग हर रोज दो-चार होते हैं। प्रधानमंत्री ने आरोप प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर उठकर काम करने का संकेत देने में भी सफल रहे। 100दिन के कामकाज पर अबतक के जो सर्वे सामने आ रहे हैं, जनता की नजर में मोदी एक लोकप्रिय और बेदाग़ छवि वाले प्रधानमंत्री हैं। इसमे कोई नयी बात नहीं है अक्सर जनता का ऐसा विश्वास हर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के शुरू के 100 दिन प्राप्त करता है। असली परीक्षा तो बाद में होती है।

    प्रधानमंत्री ने विदेश नीति के मोर्चे पर बहुत सक्रियता दिखाई है। अपने शपथ समारोह में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके इसकी शुरुवात उन्होंने अनोखे अंदाज़ में की थी। मोदी की भूटान और नेपाल यात्रा भी ऐतिहासिक थी। जापान से भले परमाणु करार न हो पाया हो लेकिन जापान के साथ उन्होंने एक नए रिश्ते की शुरुवात की है। लेकिन अति-उत्साह में कुछ गलतियाँ और महत्वपूर्ण चूक भी हुई है। पाकिस्तान के साथ होनेवाली बातचीत करने के फैसले से दोनों देशों के बीच समबन्ध सुधार की कोशिशों को धक्का ही लगा है, ये दीगर बात है कि पाकिस्तान कभी न सुधरने की कसम खाए हुए है। शरू में प्रधानमंत्री ने चीन को अपनी विदेश नीति में सबसे ऊपर रखने का संकेत दिया था लेकिन अब उन्हें चीन के विस्तारवाद की चिंता सताने लगी है। फिलिस्तीन मुद्दे पर सरकारी सैद्धांतिक स्टैंड स्पष्ट नहीं हो सका है और अभी ब्रिक्स के साथ क्या करना करना है, तय होना बाकी है।

    नरेन्द्र मोदी से आर्थिक मोर्चे पर कुछ ख़ास करने की उम्मीद देश को थी। मोदी ने चुनाव के दौरान अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने, महंगाई कम करने, सबको रोजगार देने और सबके लिए अच्छे दिन लाने का वायदा किया भी था। मोदी के शपथ लेने के साथ ही मार्किट ने अपना एनीमल स्प्रिट दिखाया भी था और शेयर बाज़ार ने कुलांचे भरने भी शुरू कर दिए थे। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक बृद्धि दर ५.७ फीसद दर्ज की गयी है, जो पहले जताई गयी उम्मीदों से कहीं ज्यादा है। लेकिन जहांतक महंगाई और भ्रष्टाचार पर काबू पाने की बात है, सरकार बिफल रही है .खुदरा महंगाई ९ फीसद के ऊपर है। एसआईटी गठन के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आनन् फानन में मोदी ने अमल में तो ला दिया लेकिन काला धन विदेशों से वापस लाने के वायदे को लगता है वह भूल गयी है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत देश की समूची आबादी को बैंक खाते की सुविधा देने का बड़ा काम हुआ है लेकिन इससे कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी पैदा होंगीं। 

    मोदी सरकार का पहला बजट यूपीए सरकार के तीसरे बजट से ज्यादा कुछ नजर नहीं आया। बीजेपी जो विपक्ष में रहते रक्षा, रेलवे और बिमा के क्षेत्र में एफडीआई का विरोध करती थी वहीँ सरकार में आने के बाद जिस तरह से यूं-टर्न ले चुकी है, इससे उसकी प्राथमिकताओं का पता चलता है। सरकार की इन प्राथमिकताओं से बड़े अद्दौगिक घराने खुश हैं क्योंकि उन्हें एकन्नी की जगह अठन्नी का मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा. मोदी सरकार ने महंगाई कम करने और रोजगार के अवसर पैदा करने का जो वायदा आम जनता से किया था उसे पूरा करने की बजाय वह केवल कुछ ख़ास वायदों को पूरा करने पर ही ज्यादा जोर दे रही है। एक खास वर्ग के प्रति प्रतिबद्धता और आम आदमी की समस्याओं के प्रति सरकारी उदाशीनता सरकार का चरित्र है, इस आम जन-धारणा को मोदी नहीं मिटा पाए हैं। चुनाव के दौरान बीजेपी ने स्वामीनाथन आयोग के सुझाव पर किसानों की फसल का जो न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने का वायदा अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया था, उसे मोदी सरकार भूल गई है। इस घोषणा के मुताबिक़ किसानों को उत्पादन के लागत मूल्य से 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देना था। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम के प्रस्तावित कानून को उद्योगपतियों के पक्ष में कमजोर करने से तो किसानों के बीच यहीं सन्देश गया है कि देश भले कृषि प्रधान है, लेकिन कृषि सरकार की प्राथमिकता न पहले कभी थी और ना ही आज है।

    पर्यावरण और शिक्षा जैसे फ्यूचरिस्टिक क्षेत्रों से अभीतक केवल बुरी खबरें हैं। सरकार उद्योग, कल कारखाने लगाने के बहाने पर्यावरण की सुरक्षा की अनदेखी कर किसी भी कीमत पर विकास के रास्ते पर बढ़ने की पुरानी रणनीति अपना रही है। सरदार सरोवर बांध और केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की ऊंचाई बढ़ाने के लिए जल्दबाजी में दी गयी मंजूरी से पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचेगी। कल कारखानों को लगाने के लिए वन पर्यावरण और प्रदुषण के के मानदंडों को कमजोर कर, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्वायत्तता से समझौता कर और ग्रीन ट्रिब्यूनल को डाउनग्रेड करके पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकशान पहुँचाने का संकेत सरकार दे चुकी है। जहाँ तक शिक्षा में सुधार का सवाल है, सरकार शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों को ही ठीक से नहीं समझ पा रही है। शिक्षा के अधिकार का जमाना है और ऐसे में शिक्षक दिवस के अवसर पर देश भर के स्कूली छात्रों को प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए मजबूर कर देना, क्या शिक्षा को दुरुस्त करने की कवायद मानी जा सकती है? अब तो प्रधानमंत्री के इस अभियान को सफल बनाने में यूपी सरकार भी जी-जान से जुट गयी है। उच्च शिक्षा में किस तरह की अराजकता है, दिल्ली विश्वविद्यालय और यूजीसी के बीच चार-साल और तीन साल के पाठ्यक्रम को लेकर उठे विवाद से खुलकर सामने आ चूका है। गुजरात के सरकारी स्कूलों में संघ से जुड़े एक लेखक की जिस तरह की १३ पुस्तकों को मुफ्त में बांटने का फैसला लिया गया है और देश स्तर पर जिस तरह से पाठ्यक्रमों और इतिहास के साथ छेड़छाड़ की संभावना बलवती होती जा रही है, शिक्षा के उबरने की कम पूरी तरह से डूब जाने का खतरा ज्यादा है। तीसरा सबसे बड़ा खतरा सांप्रदायिक सद्भाव के बिगड़ने का सामने आया है। मोदी ने पंद्रह अगस्त को विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए देश के तमाम लोगों से सांप्रदायिक और जातीय झगड़े की बात भुला देने की अपील किया लेकिन ये सच है कि उनकी सरकार आने के बाद जिस तरह से तीन महीनों में उत्तर प्रदेश में सैकड़ों दंगे हुए हैं, पहले कभी नहीं हुए। जिस तरह से “ लव-जिहाद “ के नाम पर रोज बवाल मच रहा है और हिन्दू संगठनों के ही नहीं बल्कि बीजेपी के नेता जिस तरह से अल्प-संख्यकों के खिलाफ जहर उगल रहे हैं, मोदी उनसे संयम बनाए रखने की अपील करने की बजाय प्रधानमंत्री द्वारा इफ्तार पार्टी देने की परम्परा को कायम रखते तो उसका ज्यादा असर होता। मोदी सरकार ने राज्यपालों को हटाये जाने के मामले में भी कांग्रेसी पुराणी परम्परा का ही पालन करते नजर आये। एक पूर्व न्यायधीश को राज्यपाल बनाने का फैसला लेकर तो उन्होंने न्यायपालिका को ही काबू में कर लेने का “खेल” खेल दिया है।

    मोदी की तत्काल और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती सुशासन को लेकर है। यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से नाराज होकर लोगों ने मोदी को मौका दिया है। मोदी नौकरशाहों के समय से दफ्तर पहुँचने, समय से फाइलों के निबटारे के लिए जो कुछ कर रहे हैं, लोगों को अच्छा लग रहा है लेकिन मोदी की असल चुनौती तब शुरू होगी जब लोग इस हाई वोल्टेज ड्रामा की तरह दिखानेवाले परिवर्तन का हिसाब किताब मांगना शुरू करेगें।

     

    श्रीकांत प्रत्यूष