• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Joe Cycling(1)

    मिटटी-पुत्र: मिलिए ‘जो मडीयथ’ से जिन्होंने एक आशा को सिंचित किया है.

    उनके व्यक्तित्व की सुन्दरता उनके गहरे समर्पण एवं भेदभाव से लड़ने की उनके अप्रतिम शक्ति में निहीत है. उनके समर्पण की गहराई उनके दूरदर्शिता का सीधा-समानुपाती है. जमीनी स्तर पर समाज के सबसे वंचित समुदायों के जीवन में बदलाव लाने हेतु उनकी ऊर्जा एवं उत्साह का कोई जवाब नही है.

    विनम्रता उनके व्यक्तित्व की मूल पहचान है. वह जितने ऊँचे हैं, उतने ही विनम्र भी. हम सबने ‘सादा जीवन, ऊँच्च विचार’ वाली कहावत जरुर सुनी होगी – मगर वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जो इस वाक्य को प्रति मिनट, प्रति सेकंड एवं प्रति क्षण जीते हैं. वह व्यक्ति जिसने भारत के गावों में मौजूद गरीबी को स्वयं से देखने, समझने और महसूस करने के लिए साइकिल पर भारत-भ्रमण किया था – आज भी आप उन्हें अपने घर से कार्यालय तक साइकिल से जाते हुए देख सकते हैं.

    उनके व्यक्तित्व के सबसे प्रमुख आयाम जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, वह है उनके धैर्यपूर्वक सुनने की कला. हो सकता है ऐसा इसलिए हो क्योंकि विपरीत गुण आकर्षित करते हैं – चूँकि एक वकील होने के कारण मुझे देर तक बोलते रहने का अभ्यास है. वह कम बोलते हैं और ज्यादा सुनते हैं, और इसी कारण, जब वह कुछ बोलते हैं तो इसका गहरा मतलब होता है और उनकी बातों में प्रयाप्त वजन होता है.

    उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सामजिक अन्याय से लड़ते हुए बिताया है. उन्होंने समाज के वंचित तबके को स्वच्छ पानी एवं एक स्वच्छ जीवन मुहैया कराने के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है. चूँकि, अपने जीवन का अधिकाँश हिस्सा उन्होंने जमीनी स्तर पर दबे-कुचलों के बेहतरी के लिए काम किया है, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जो शेष भारत से लगभग कटा हुआ रहा है, मेरे लिए उन्हें ‘मिटटी-पुत्र’ कहना सर्वाधिक प्रासंगिक लगता है, और इसी संज्ञा के सहारे उन्होंने जो बदलाव लाये हैं, उसके लिए मैं अपना आदर उन्हें प्रेषित करता हूँ.

    उनके कार्यों का प्रभाव भारत के अलावे अफ्रीकन देशों में भी देखा जा सकता है. यह सही है की भारत में उनके कार्यस्थल का मुख्य बिंदु ओड़िशा ही रहा है, ऐसा इसलिए भी क्योंकि उनके संगठन के पास सीमित संसाधन हैं, बावजूद इसके झारखण्ड और आन्ध्र-प्रदेश जैसे राज्यों पर भी अब ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है. यह जीवन-यात्रा किसी और की नहीं बल्कि जो मदीयथ की है जिन्होंने अत्यंत ही समर्पण भाव से उनलोगों का जीवन-स्तर ऊपर उठाने का काम किया है जिन्हें देश के सबसे वंचित एवं गरीब तबके के लोगों में शुमार किया जाता है.

    3 दिसम्बर 1950 को भारत के केरल राज्य में जन्मे जो मडीयथ का बचपन से ही विद्रोही स्वभाव था. वह अपने किशोरावस्था में ही, लगभग 12 वर्ष की उम्र में, अपने पिताजी से इसलिए विद्रोह कर बैठे थे क्योंकि उन्हें लगा कि उनके पैतृक जमीन पर काम करने वालों मजदूरों के साथ अन्याय हो रहा है. इन मजदूरों के दयनीय हालत से क्षुब्ध होकर जो मडीयथ ने उन्हें संगठित किया और साथ ही उनके हक़ के लिए आवाज उठायी.

    उनके विद्रोही स्वभाव को भांपते हुए और ऐसी घटनाएं फिर न उत्पन्न हो इसके लिए उनके पिताजी ने कलकत्ता के आवासीय स्कूल में उनका दाखिला करा दिया. प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ से बातचीत में जो मडीयथ इस घटना को इस प्रकार याद करते हैं:

    “मेरे पिताजी द्वारा काम पर रखे गए मजदूरों को संगठित करने का वह प्रयास, पीछे मुड़कर देखने पर, एक अतिरंजित अनुभूति थी. मैं निश्चित तौर पर साम्यवादी आन्दोलन से प्रभावित था. यही वह समय था जब ईमीएस मिनिस्ट्री सत्ता में आई थी और सामाजिक समानता की पुकार चारो तरफ थी. वास्तव में, मैं ऐसे सामजिक निर्वासन का गवाह था, विशेषकर कुट्टन्द में.”

    कलकत्ता में दो वर्ष तक पढ़ाई करने बाद जो मडीयथ ‘इन्फैंट जीसस एंग्लो इंडियन हायर सेकेंडरी स्कूल’ में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने थान्गासेर्री वापस लौट गए. बाद में, मद्रास यूनीवर्सिटी में अपने पढ़ाई के दिनों में वह लोयोला कॉलेज, चेन्नई में छात्र संगठन के अध्यक्ष बन गए और उन्होंने ‘यंग स्टूडेंट्स मूवमेंट्स फॉर डेवलपमेंट’ की स्थापना की जिसे संक्षिप्त में ‘वायएसएमडी’ के नाम से भी जाना गया. इन्हीं दिनों, उन्होंने साइकिल पर अकेले सम्पूर्ण भारत-भ्रमण करने का निर्णय किया. इस भ्रमण ने उन्हें ग्रामीण भारत में फैली गरीबी, सामजिक अन्याय एवं भेदभाव को जानने और समझने का अवसर दिया. इस यात्रा ने संभवतः उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य बुनने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. संभवतः यहीं से, उनके जीवन का उद्देश्य एक उद्देश्यपूर्ण जीवन हो गया था.

    जो मडीयथ के जीवन में वर्ष 1971 बहुत ही महत्वपूर्ण था जब उन्होंने 400 ‘वायएसएमडी’ स्वयंसेवकों के दल का नेतृत्व किया था ताकि भूकंप से बर्बाद हो चुके पश्चिम बंगाल के सहायता शिविरों में बांग्लादेश से आ रहे शरणार्थियों को मदद पहुंचाई जा सके जो उस समय ‘बांग्लादेश मुक्ति युद्ध’ से आ रहे थे. हालांकि, उन्हें बाद में ऐसा महसूस हुआ कि भूकंप के कारण तबाह ओड़िशा पर लोगों की अपेक्षाकृत कम नज़र है और इसलिए उन्होंने ‘वायएसएमडी’ के अपने 40 स्वयंसेवकों के साथ ओड़िशा जाने का निर्णय कर लिया. जब स्थिति सामान्य हुई तो उनके कुछ साथी वापस चले गए किन्तु जो मडीयथ ने रुकने का निर्णय किया. 1976 में राज्य सरकार के एक आधिकारिक आमंत्रण पर स्थानीय समुदाय के बीच विकास कार्य की शुरुआत करने के लिए जो अपने टीम के साथ ओड़िशा के दक्षिणी भाग में स्थित गंजाम जिला चले आये. जो मडीयथ के ओड़िशा में रुक जाने और वंचित समुदायों के लिए काम करने के उनके निर्णय की परिणति 22 जनवरी 1979 को उनके संस्था ‘ग्राम विकास’ के स्थापना के रूप में हुई. वह अभी भी उसी गाँव मोहुदा में रहते हैं जो उन्हें बहुत अधिक प्रिय है.

    ग्राम विकास ने अभी तक 70000 परिवारों एवं 400,000 व्यक्तियों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाये हैं. संस्था के आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अभी तक संस्था ने ओड़िशा के 25 जिलों के 1200 गावों में अपने योजनाओं से प्रशंसनीय परिवर्तन लाये हैं. अभी हाल में, पांच और राज्यों में भी संस्था ने अपने प्रोजेक्ट शुरू किये हैं, मसलन, झारखंड, मध्य प्रदेश, नागालैंड, पश्चिम बंगाल और आन्ध्र प्रदेश.

    जो मडीयथ को उनके शानदार कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत सारे राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पुरष्कारों से नवाजा जा चूका है. इन पुरष्कारों में, ‘एशियाई डेवलपमेंट बैंक वाटर चैंपियन अवार्ड’, ‘गोडफ्रे फिल्लिप्स रेड एंड वाइट ब्रेवरी अवार्ड,लोक सम्मान अवार्ड इत्यादि है.

    जो मडीयथ अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं कि, ‘अंत में ना तो मिसाइल और ना ही मोटरकेड, ना तो कार और ना ही कंप्यूटर देश की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करवा सकते है, बिना शौचालय और नल के.’ जो मडीयथ वह बदलाव ला रहे हैं जिसे लाने का सपना उन्होंने अतीत में देखा था, और इसीलिए भविष्य भी उनका सहयोगी रहेगा. उनका समर्पण लोगों के लिए एक अनुसरणीय प्रेरणा है. वह यह साबित करने में सफल रहे हैं जो कि प्रसिद्द अंग्रेजी कवि विलियम ब्लेक ने एक बार कहा था कि, ‘आज जो साबित हो चूका है, उसकी कभी सिर्फ कल्पना की गयी थी.’