• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    बिहार की बिसात में मांझी की नैया

    नाम मांझी है, लेकिन मंझधार में उन्होंने कितनों को फंसा रखा है। मांझी जो पार लगाए वाला अमर प्रेम का गाना बिहार की राजनीति में बहुत लोग गा रहे हैं।

    जीतन राम मांझी की राजनीति ने कांशीराम के उस दौर की याद दिला दी है, जब वे सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करने के लिए कभी हाथ मिलाते थे तो कभी झटक कर चल देते थे। 70 के दशक के आखिरी साल में कर्पूरी ठाकुर को किन लोगों ने अपमानित किया बिहार की राजनीति जानती है। कर्पूरी को कुर्सी से हटाकर एक दलित चेहरा खोजा गया, रामसुंदर दास का। जिन्हें सवर्ण नेताओं के समूह और जनसंघ ने समर्थन दिया था।

    दिक्कत यह है कि आप जीतन राम मांझी को सामाजिक न्याय के प्रतीक से अलग भी नहीं कर सकते, लेकिन उस सियासत से आंख भी बंद नहीं कर सकते जो दिल्ली से पटना तक में इस प्रतीक के नाम पर खेली जा रही है। नैतिकता और न्याय सियासत में कब पाखंड है और कब प्रतीक यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप नीतीश को पसंद करते हैं या नरेंद्र मोदी को या फिर मांझी को।

    जिन तीन दलों ने मांझी को पद से हटाया है उन सभी में वे पहले रह चुके हैं। कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू। लेकिन मांझी के झटके से वे दल भी उबर नहीं पाएंगे, जिनमें मांझी नहीं हैं। जेडीयू से बर्खास्त मांझी इस्तीफा नहीं दे रहे हैं और दूसरी तरफ विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद भी नीतीश कुमार शपथ नहीं ले पा रहे हैं।

    राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी की किस्मत ही कुछ ऐसी है कि वे जहां भी जाते हैं, यूपी विधानसभा की स्थिति पैदा हो जाती है। नीतीश कुमार राज्यपाल से मिलकर दावा कर आए हैं कि विधायकों का बहुमत उनके साथ है। मांझी कहते हैं कि नीतीश का नेता चुना जाना अवैध है। नेता वे हैं और सदन में बहुमत साबित कर देंगे। बीजेपी ने खुलकर कुछ भी नहीं कहा है। मांझी समर्थक नरेंद्र सिंह कहते हैं कि बीजेपी का सपोर्ट हासिल है। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान मांझी के साथ मिलकर काम करने की बात कर रहे हैं। सुशील मोदी चुनाव की बात कर रहे हैं।

    बीजेपी को भी सोचना होगा कि मांझी का अभी साथ देकर सामाजिक न्याय का ढिंढोरा पीटा तो छुटकारा पाने के वक्त क्या कहेंगे। कहीं बीजेपी की हालत भी नीतीश जैसी न हो जाए। मांझी को साथ देने का मतलब है कि नीतीश, मांझी सरकार की तमाम नाकामियों को भी अपने सर ले लेना। और ये साथ कब तक का है।

    मांझी की त्रासदी यह है कि कोई इन्हें अपनी नाव का खेवनहार नहीं बनाना चाहता, बल्कि सब मांझी को नाव बनाकर खेवनहार बनना चाहते हैं। मांझी हैं कि तूफान का मज़ा लेना चाहते हैं। आखिर बीजेपी मांझी का साथ क्यों दे रही है? महादलित की चिंता थी तब बीजेपी ने मांझी के सीएम बनने पर स्वागत क्यों नहीं किया। क्यों कहा कि ये कठपुतली मुख्यमंत्री है। हर दिन मांझी पर हमला हुआ। पर इस बीच मांझी कैसे बीजेपी के करीब पहुंच गए। इस पोलिटिक्स को आप केमिस्ट्री की क्लास में समझना चाहते हैं या कॉमर्स की।

    पिछले रविवार को मांझी दिल्ली में प्रधानमंत्री से 50 मिनट की मुलाकात करते हैं, बाहर आकर इस्तीफे से इंकार करते हैं और नीतीश को सत्ता के भूखे बताते हैं। कुछ ही दिन पहले कह रहे थे कि नीतीश जब भी कहेंगे सत्ता छोड़ देंगे। अब क्यों कह रहे हैं कि नहीं छोड़ेंगे।

    पिछले साल नवंबर में जब मांझी ने अपने दामाद और भतीजे को नियुक्त किया तो सुशील कुमार मोदी ने उनका इस्तीफा मांगा था। अब क्या सुशील कुमार मोदी मांझी को समर्थन देकर खुद इस्तीफा देंगे।

    क्या मांझी बीजेपी की कठपुतली नहीं हैं? नीतीश अगर रिमोट के ज़रिये मांझी की सरकार चला रहे थे तो क्या बीजेपी रिमोट के ज़रिये मांझी को नहीं चला रही है। रामविलास पासवान के बाद मांझी का बीजेपी की तरफ आना उसके सामाजिक आधार का विस्तार तो करेगा, लेकिन इससे मांझी या दलित राजनीति को क्या मिलेगा। क्या चुनाव बाद मुख्यमंत्री का पद मिलेगा?

    नीतीश के खेमे में भी राजनीति कम घुमावदार नहीं है। पहले तो खबर आई कि लालू ने मांझी को अपने प्रभाव में ले लिया है। अब लालू नीतीश के साथ हैं। नीतीश तो दिल्ली निकले थे समाजवादी एकता के लिए लेकिन अब वह प्रोजेक्ट तो अधर में लटक गया है।

    क्या लोकतंत्र में पार्टी और उसकी सरकार वाकई इतने अलग हो सकते हैं जहां दोनों का एक दूसरे पर कोई अधिकार न हो। ऐसा कब हुआ है और कहां हुआ है। अपनी सरकार को किसी दूसरे के हाथ में जाते देख नीतीश को क्या करना चाहिए था। त्याग का कंबल ओढ़े घूमना चाहिए था या उस कंबल को उतारकर अखाड़े में आ जाना चाहिए था।

    आखिर बीजेपी ने खुद को इस खेल से खुलेआम अलग क्यों नहीं किया है। क्या वह अब भीतरघात की राजनीति भी करेगी। मांझी ने पीएम से मिलकर कहा कि नीतीश का चेहरा एक्सपोज़ हो गया है। वे सत्ता के लालची हैं, लेकिन मांझी कैसे सत्ता के संन्यासी बने हुए हैं। सिर्फ इसलिए कि उनके पास एक ऐसा प्रतीक है जिसकी काट किसी के पास नहीं। क्या बीजेपी बिहार में यह सब सामाजिक न्याय के लिए कर रही है। तो क्या बिहार विधान सभा चुनाव में बीजेपी रामविलास पासवान को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएगी, मांझी को बनाएगी।

    इन सबके बीच आप एक नेता के रूप में मांझी की दावेदारियों को सीधे-सीधे खारिज नहीं कर सकते। वो अपनी बात सधे तरीके से कर रहे हैं। वे ना तो मासूम हैं न मोहरा। पर इस खेल का बादशाह कौन है पता नहीं। अगर बीजेपी और मांझी ने नीतीश को एक्सपोज़ कर दिया है तो बिहार की राजनीति इन दोनों का कौन सा चेहरा देख रही है।

    बिहार विधानसभा में 9 विधायक निष्कासित होने और एक विधायक के निधन के बाद सदन की संख्या इस वक्त 233 है। बहुमत साबित करने के लिए 117 की ज़रूरत है। नीतीश ने 130 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। जदयू के पास 111, आरजेडी 24, कांग्रेस के पांच, एक सीपीआई और 5 निर्दलीय हैं। लेकिन अगर सदन के पटल पर मांझी बीजेपी के 87 विधायकों के दम पर जेडीयू और राजद के बागियों के सहारे समर्थन हासिल करना चाहें तो उन्हें 30 और विधायक चाहिए।

    एक बार आप खुद को नीतीश की जगह रखकर देखिये, कभी मांझी की जगह रखकर देखिये तो कभी दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री की जगह। सब एक दूसरे की पीठ के पीछे छुरा लेकर खड़े हैं। तुर्रा ये कि यह सब विकास के लिए हो रहा है। वह विकास जो हर चुनाव से पहले होता है मगर चुनाव के बाद होते होते रह जाता है।

    • ranginee09 .

      Good analysis. Interesting punchline.