• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश: अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक और अनैतिक

    उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों को जब भारत में अपनी जड़ें मजबूत करनी थी तो उन्होंने एक कानून बनाया – भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894. आज़ादी के बाद इस कानून को ख़त्म करने की लगातार मांग होती रही. कई सालों के आन्दोलनों और संघर्ष के बाद 2013 में इस कानून को ख़त्म किया गया. भाजपा सहित कई दलों के समर्थन और लम्बी संसदीय चर्चा के बाद 27 सितम्बर 2013 को एक नया भूमि अधिग्रहण कानून बन पाया जिसने 1894 के कानून की जगह ले ली.

    आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये पिछले साल बने इस कानून के हर सकारात्मक पहलु को ख़त्म कर दिया. सरकार के एक कदम के साथ ही हम व्यावहारिक तौर पर 1894 के उसी तानाशाही अधिनियम पर वापस आ गए जिसे एक लम्बे संघर्ष द्वारा बदला गया था.  इस अध्यादेश का किसानों, आदिवासियों और गांववालों पर सीधा असर पड़ेगा.

    सरकार ने पाँच श्रेणियों को भू-मालिकों की सहमती, समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आंकलन और खाद्य सुरक्षा आंकलन के प्रावधानों से मुक्त कर दिया है. ये पाँच श्रेणियां हैं: 1) रक्षा 2) औद्योगिक कॉरिडोर 3) ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत निर्माण 4) सस्ते मकान एवं निम्न ग़रीब वर्ग के लिए आवास योजना और 5) पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाली सामाजिक ढांचागत परियोजनाएं जहाँ कि भूमि सरकार की ओर से दी जानी हो. अब आप खुद देखिये कि इन पाँच श्रेणियों में मिली छूट की आड़ में क्या क्या नहीं किया जा सकता.

    • किसी भी परियोजना को अब इन पाँच में से किसी न किसी श्रेणी में डालकर अधिग्रहण को कानूनन जायज़ ठहराया जा सकेगा.
    • अब सरकार बिना आपकी सहमती के भी आपकी ज़मीन ले सकती है.
    • अब सरकार के लिए ये ज़रूरी नहीं होगा कि वो ज़मीन का कब्ज़ा लेने से पहले वहाँ के समाज पर पड़ रहे इसके प्रभाव का आंकलन करे.
    • पाँच साल तक मुवावज़ा न मिलने या सरकार द्वारा ज़मीन पर कब्ज़ा न लेने की सूरत में हमें अपनी ज़मीन पर वापस अपना दावा करने का अधिकार था. सरकार ने अध्यादेश के जरिये हमारा ये अधिकार भी छीन लिया है.
    • अब निजी कम्पनी के अलावा प्रोप्राइटरशिप, पार्टनरशिप या किसी एन.जी.ओ के लिए भी सरकार हमारी ज़मीन ले सकती है.
    • “रक्षा” शब्द की परिभाषा बदलकर “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई भी परियोजना” और “रक्षा उत्पाद” को शामिल कर लिया गया है. इनमें से कोई भी “ढांचागत निर्माण परियोजना” या “निजी परियोजना” हो सकती है.
    • अब अगर कोई भूमि अधिग्रहण अधिकारी कुछ गलती भी करता है तो हम बिना सरकार के इजाज़त के उसे अदालत में नहीं ले जा सकते.

    2013 का अधिनियम पारित होने से पहले बीजेपी समेत सभी दलों ने इसपर व्यापक चर्चा किया और अपनी राय दी. यहाँ तक कि जिस संसदीय समिती ने इसे पारित किया उसकी अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन थी, जो आजकल लोकसभा की अध्यक्षा हैं. राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे कई भाजपा नेताओं ने बड़ी बड़ी बातें की थी और 2013 के कानून को अमली-जामा पहनाने में सक्रीय भूमिका निभायी. बिल पर वोट करने वाले 235 सांसदों में से 216 ने इसका समर्थन किया था. ऐसे व्यापक समर्थन के बाद बने कानून को एक झटके में अध्यादेश के जरिये खारिज कर देना अनैतिक ही नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रियायों के प्रति वर्तमान सरकार की कमज़ोर प्रतिबद्धता का भी परिचायक है.

    अलोकतांत्रिक होने के साथ साथ सरकार का यह कदम असंवैधानिक भी है. हमारे संविधान में अध्यादेश लाने का प्रावधान दो सत्रों के बीच किसी आपात स्थिती के लिए किया गया है. सरकार को समझाना चाहिए कि आज ऐसी कौन सी आपातकालीन परिस्थिती है? किसानो, आदिवासियों और आम लोगों की कीमत पर किन चुनिंदा पूंजीपतियों को फायदा पहुँचाने के लिए मोदी सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा? अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने भी यह जानना चाहा है कि आखिर इतनी जल्दबाजी क्यूँ है सरकार को?

    पिछला भूमि अधिग्रहण कानून 1 जनवरी 2014 को लागू तो हुआ, लेकिन कई राज्यों के विधान सभाओं में नियम नहीं बन पाने के कारण पूर्ण रूप से क्रियान्वयित नहीं हो पाया था. ऐसे में, एक वर्ष से भी कम समय में, कानून को जाँचे बगैर, कैसे सरकार ने इसके व्यवहारिकता का आंकलन भी लगा लिया और संशोधन की आवश्यकता समझ ली ये शायद नरेन्द्र मोदी और अरुण जेटली ही जानते हों.

    सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तय कर लिया है कि वो कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और व्यापारी घरानों को फायदे पहुंचाएंगे और देश के किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों को उनकी इस चाल का पता नहीं चलेगा.

    2013 में पारित कानून के हर सकारात्मक बिंदु (जोकि भाजपा के भी सक्रीय समर्थन से बने था) को इस जनविरोधी अध्यादेश ने ख़त्म कर दिया है.  हम वापस अंग्रेजों के सन 1894 वाले कानून पर आ गए हैं. नया साल 2015 मुबारक हो!

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    Anupam

    Chief National Spokesperson & Delhi President - Swaraj India (Party)
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    • Really its disgusting :(

    • sk

      It is very unfortunate that the prime minister who came to power saying sabka sath sabka vikas is doing vikas of only a handful of the people, the people who financed his advertisement campaign by providing about 20,000 crore rupee are demanding the favour back, one of the repayment is to amend the land acquisition act, the bjp government and the prime minister have to pay a heavy price in future for this act. This shows that the government does not care for the farmers,labours or the common man they are only concerned about the big industrialist, it is strange that bjp which advocated strong self reliant and swadeshi is following the corporate agenda, time will tell what will be the impact of these anti farmer ,anti labour and anti common people agenda of the BJP.

    • Pravin Kumar Shukla

      जिसके पास ज़मीन होती है उसका एक स्वभाव होता है, यही कि उसकी ज़मीन में मर्ज़ी उसकी चले

    • भू-अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने के लिए देश भर में होगा किसान आंदोलन : डॉ सुनीलम

      मोदी सरकार के गठन के बाद से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि सरकार द्वारा अब तक बने जनमुखी कानूनों में बदलाव किया जाएगा पहले श्रम कानून बदलने तथा अब भू-अधिग्रहण अध्यादेश लाने से वह आशंका सही व्यक्त हुई है उन्होंने कहा कि तारा (रायगढ़) में 10-11 अगस्त को आयोजित समाजवादी समागम में, 31अक्टूबर – 2 नवम्बर, पुणे में आयोजित एनएपीएम के राष्ट्रीय अधिवेशन में तथा ढिंकिया ओड़िसा में 29-30 नवम्बर को आयोजित जनसंघर्षो के राष्टीय सम्मलेन में भू-अधिग्रहण को लेकर राष्टीय आंदोलनों की रुपरेखा तय की गई थी. आगामी 12 जनवरी 2015 को मुलताई में तीनों समूहों के प्रतिनिधि मिलकर भू-अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने की रुपरेखा तय करेंगे.
      http://www.sangharshsamvad.org/2015/01/blog-post.html

    • abhinav

      Modi govt ne ye saaf kr diya ki jo usske chunavi naare slogan the “sabka saath sabka vikas” wo mahaj ek chalawa tha.