• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    लगा दो संसद पर ताला !

    सातवीं कक्षा से पढ़ते आ रहा था की जनता के प्रतिनिधि होते हैं जो जनता के लिए लोकसभा और राज्यसभा नामक दरबार में बैठ के जनता की परेशानियों का हल निकालते हैं। लोकसभा को तो ‘पीपल्स हाउस’ कहा जाता है ना? राज्य सभा को ‘अपर हाउस’? अब तो शक होने लगा है इन नामो पर। बाबासाहेब होते तो वो भी शर्मसार हो जाते।इनका नाम बदल कर ‘बकवास हाउस’ कर देना चाहिए। बकवास के सिवा कुछ नहीं होता संसद में। सत्र से पहले भी नौटंकी सत्र के दौरान भी नौटंकी और सत्र खत्म होने के बाद भी नौटंकी। एैसे नेताओं को जनता का प्रतिनिधि तो नहीं पर अपनी अपनी पार्टी का प्रतिनिधि कहना चाहिए।

    एैसे लोग ‘मेम्बर ऑफ़ पार्टी’ हैं ‘मेम्बर ऑफ़ पारलियामेंट’ नहीं। संसद की मर्यादा गरिमा सब कुछ भूल चुके हैं ये माननिय लोग। विपक्ष तो विपक्ष, सरकार भी संसद नहीं चलने देती है। किस तरह का शासन करना चाहते हैं यह लोग?

    जनता को गुमराह करने के सिवाय इनके पास और कोई काम नहीं है। पर्दे के पीछे सब एक दूसरे को बचा लेते हैं।ख़ुद की वेतन बढाते वक़्त इनकी उत्सुकता तो देखिए सब एक जुट होकर पास कर देते हैं और वहीं भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून की बात आइ तो दोनो एक साथ मिलकर उसे नष्ट करने में लगे हैं। आज कौन करता है महंगई की बात, कौन करता है रुपया डॉलर की बात, कौन करता है युवाओं को नौकरी की बात?

    विमुद्रिकरण से लगा की भ्रष्टाचार की बात होगी पर प्रधानमंत्री ने भी हमें ठगलिया।

    इस बार तो हद हो गई इतना महत्वपूर्ण सत्र था यह जब पूरा देश बहुत दीनोबाद इस संसद को सुनना चाहता था।ज़्यादातर लोगों में संसद को सुनने की दिलचस्पी नहीं होती है पर इस समय थी। एैसे में इस संसद के रखवालों ने हमें धोखा दिया और अपनी अपनी पार्टी की चाटुकारिता करने में लगे रहे। सत्ता सुनने से डरती है और विपक्ष बोलने से डरता है।

    • एैसे लोगों के रहते क्यों चले यह संसद?

    • किस बात की पैसे देता है ये देश इनको? 

    • ऐसे लोगों को इतनी छूट क्यों ?

    इनकी सारी छूट बंद कर देनी चाहिए। जिस सत्र को ये बर्बाद करें उस महीने की वेतन इन्हें नहीं मिलनी चाहिए।

    क्यों मिले इन्हें फोकट का पैसा? अपने क्षेत्र में जाने के बजाय ये हमेशा दिल्ली में अपने पार्टी मंदिर का घंटा बजाते हैं और भगवान की तरह अपने नेताओं को मिठाई का प्रसाद चढ़ा कर आते हैं।

    जनता की याद तो उन्हें अब पाँच साल बाद चुनाव की परीक्षा में आने वाली है। यही कारण है वो निश्चिन्त हैं पर हमें उनकी नींद उड़ानी होगी। हमें उन्हें बताना होगा की मालिक कौन है और सेवक कौन है। मालिक चाहे तो सेवक को नौकरी से निकाल भी सकता है। मैं इस लेख की माध्यम से देशवासियों को अपील करता हूँ की अगर वो भी छला हुआ महसूस करते हैं, ठगा हुआ महसूस करते हैं तो चल कर इनके पार्टी कार्यालयों में और संसद पर ताला लगा दें।

    (Author of the article is Rishav Ranjan)