• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    क्या समाज को मीडिया चाहिए

    700 श्लोक करेंगे प्रधानमंत्री की रक्षा। टीवी पर जब यह लाइन फ्लैश हुई तो मैं यही सोच रहा था कि इस पंक्ति को आप किस पैमाने पर टेस्ट करेंगे। इसमें ज्योतिष है जिसे कुछ लोग विज्ञान कहते हैं, जिसे कुछ लोग अंधविश्वास कहते हैं, इसमें आस्था है जिसे चुनौती देंगे तो कुछ लोग नाराज़ हो सकते हैं, इसमें शायद कोई नया डिफेंस मेकनिज़्म है जो अगर प्रधानमंत्री की रक्षा में सफल हो गया तो हमें टैंक, राकेट और बंदूकें रखने के लिए कैंटोनमेंट की ज़रूरत ही न पड़े। श्लोक तो आप ध्यान में भी रख सकते हैं। रोज़ चैनलों पर तरह तरह के ज्योतिष जिसे देश तय नहीं कर पाया कि विज्ञान है या अंधविश्वास, बताते हैं कि लाल रूमाल लेकर निकले और रास्ते में किसी के घर के सामने पांच किलो चना फेंक दें तो दुश्मन का नाश हो जाएगा। ये लोग रोज टीवी अखबारों में आते छपते हैं और बिना किसी संपादन के जो मन में आता है बोल जाते हैं। ठीक है इसे हम एक अलग (विधा) ‘ज़ानर’ मान कर छोड़ सकते हैं लेकिन जब यह ‘ज़ानर’ मेन न्यूज़ में घुस आए तो आप क्या करेंगे। 700 श्लोक करेंगे प्रधानमंत्री की रक्षा। संपादकीय पैमाना अब ख़बरों की नैतिकता से आगे जा चुका है।

    हमारे देश में सेल्फ रेगुलेशन का सिस्टम बहुत नया है। इसके नाम कुछ कामयाबी है, कुछ शिकायतों का निपटारा भी है और शायद ये नाकामी भी है कि कई मामलों में यह कारगर साबित नहीं हुआ। सेल्फ रेगुलेशन और संवैधानिक रेगुलेशन के नाम पर सरकारी सिस्टम  के अपने खतरे हैं । क्या हम सोच सकते हैं कि अगर संवैधानिक रेगुलेशन से लैस सेल्फ रेगुलेशन की कोई व्यवस्था हो,उसका ढांचा और काम थोड़ा और स्पष्ट हो तो उसका असर कैसा रहेगा। वनिता कोहली खांडेकर की एक बात सही लगी कि जब फिल्म जगत में पैसे और बनाने की व्यवस्था पहले से बेहतर हो सकती है, काले धन का इस्तमाल कम हो सकता है तो मीडिया में क्यों नहीं प्रयास होना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि कोई मान्य पैमाना हमारी समझ के बाहर है, होना ही नहीं चाहिए ये भी कोई वाजिब दलील नहीं है। हम जैसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जो मीडिया कानून का क भी नहीं जानते होंगे। इस पेशे के लोगों ने कभी इस नज़रिये से नहीं सोचा। कुछ साल से चलन शुरू हुआ है तो इससे भागने की बजाय टकराना ही एकमात्र रास्ता है। हम कुछ व्यावहारिक मानदंडों पर रोज़ काम करते हैं और सबकुछ परंपरा के आधार पर है। होना भी चाहिए लेकिन जब यह लंबे समय तक टूटने लगे या कोई नियंत्रण की किसी तरकीब से तोड़ दे तो कहां जाया जाए। कोई सिस्टम तो होना चाहिए। जैसे संपादक वैसे स्पीकर। सदन चलाने के स्पीकर के अधिकार को आप चुनौती नहीं दे सकते मगर परंपराओं के साथ कानून तो है ही। जिन्हें चुनौती देकर भी लोकतंत्र का नियमित परीक्षण होता रहता है। सेल्फ रेगुलेशन के दायरे में प्राइवेट मीडिया ही क्यों आये, सरकार से बड़ा मीडिया मालिक कोई नहीं है। पब्लिक ब्राडकास्ट के चैनल सेल्फ रेगुलेशन में क्यों नहीं आने चाहिए।

    आज हमारा पेशा मीडियम न्यूट्रल है। मतलब आप हमारे और किसी पत्रकार में टीवी, प्रिंट या इंटरनेट के आधार पर अंतर नहीं कर सकते। क्रास ओनरशिप की तरह आप इसे क्रास मीडियम कह सकते हैं। नतीजा यह हुआ है कि अब दुनिया की कई अदालतों में बहस ही इस बात पर हो रही है कि पत्रकार कौन है। न्यूज़ीलैंड से लेकर फ्लोरिडा की अदालत में ऐसे मामले आए और अदालत ने फैसला दिया कि किसी उद्योगपति के खिलाफ ब्लागर ने जो लिखा है उसे भी पत्रकार माना जाए और डिफेमेशन कानून है उसके तहत संरक्षण दिया जाए। यानी कि उद्योगपति उसे मजबूर नहीं कर सकता कि तुम अपना सोर्स बताओ। हमारे देश में तो उद्योपति चैनलों को सिम्पल नोटिस भेज कर डरा देते हैं कि फलां राजनीतिक दल की प्रेस कांफ्रेंस दिखायेंगे तो मानहानि का मुकदमा ठोक दिया जाएगा। कोई कह सकता है कि लोकपाल जैसी भारी भरकम संस्था बन जाएगी लेकिन इससे कब तक बचा जा सकता है। नए माध्यमों के बारे में सोचा जाना चाहिए।

    अमरीक के कई राज्यों में शील्ड ला है इसे भी लेकर विवाद है मगर यह ला पत्रकार को सुरक्षा देता है कि वह अपना सोर्स न बताये और अगर सोर्स का नाम छाप दिया तब भी उसे मानहानि से संरक्षण मिले। हमारी सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में शायद प्रशांत भूषण से सोर्स बताने के लिए कहा है। यह खतरनाक है। एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष कह रहे हैं कि सोर्स बताना चाहिए। क्या कोई ऐसा रेगुलेशन है जो मीडिया संस्थान और कंटेंट से पहले पत्रकार और पत्रकारिता को सुरक्षा प्रदान करे। कोई सूचना सचिव फोनकर धमकाये या खबर बदलने के लिए कहे, या न्यूज़ फ्लोर पर कोई मालिक संपादक को यह कहे कि आप यह खबर नहीं कर सकते तो  उसकी शिकायत का मंच कौन सा है और क्या कोई संरक्षण हो सकता है। मालिक बदलते हैं तो संपादक बदल दिया जाता और हम इसे सामान्य रूप से स्वीकार कर लेते हैं। चार कारपोरेटर मिलकर अगर किसी क्रिटिकल संपादक को ब्लाक कर दें तो उसके लिए क्या रेगुलेशन है। सोचना चाहिए। कोई भी रेगुलेशन बिना इस संरक्षण के काम नहीं करेगा। क्या कोई पत्रकार इस्तीफा देने से आगे जाकर कुछ कर सकता है। कई मामले में मीडिया संस्थान महंगे वकीलों के दम पर अपने ही पुराने पत्रकार की कमर तोड़ देते हैं। उसकी आवाज़ दबा देते हैं। वो कहां जाए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तो अपने लिए हर तरह का संरक्षण ले लेते हैं ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे तो पत्रकारों को क्यों नहीं इस तरह का संरक्षण मिलना चाहिए।

    आखिर निष्पक्ष मीडिया किसे चाहिए। समाज और लोकतंत्र को चाहिए तो उसकी क्या जिम्मेदारी बनती है। क्या ये जिम्मेदारी हमेशा एकतरफा बनेगी या लादी जाएगी। ठीक है कि मीडिया ने भी गड़बड़िया कीं हैं तो इसे दूर करने के तरीकों पर सोचा जाना चाहिए न कि इसका लाभ उठाकर काम करने वाले पत्रकारों को धमकाने और मारने के मौके में बदलना चाहिए। समाज भी इन बातों को तवज्जो दे कि किस दौर में मीडिया स्वतंत्र है और किस दौर में कम स्वतंत्र है। पहले नहीं सोचा तो अब सोचिये। कंपनी पत्रकारों की जिम्मेदारी लेती नहीं, समाज लेगा नहीं और सरकार के लिए तो यह स्वर्णिम अवसर है ही कि उनके दो टके की नौकरी की असुरक्षा से खेलो। अब तो ऐसी दलीलें दी जा रही हैं कि न्यूयार्क में राजदीप ही अकेले क्यों पिटे। वहां और भी तो पत्रकार थे। क्या किसी पत्रकार की राजनीतिक हत्या हो जाए तब भी यही दलील दी जाएगी कि बाकी तो ज़िंदा है। क्या पत्रकारिता स्थगित कर दी जानी चाहिए क्योंकि लोगों ने किसी को चुन लिया है तो फिर लोग बंद कर दें पत्रकारों को फोन कर देना। वो कौन लोग हैं जो खबरों को सरकार के खिलाफ देखते हैं। ब्रांड करते हैं आप इस उस के खिलाफ है। कोई नेता दावा कर दे कि सारे अस्पताल बेहतर हो गए और कोई पत्रकार उन दावों की पोल खोल दे तो क्या उसे मारा जाएगा कि वो उस नेता का विरोधी है। राजनीतिक समर्थक, कार्यकर्ताओं और फैन को असहमतियों के निपटारे का ऐसा दायित्व सौंपने से पहले एक बार सोच लीजिएगा। फैन होना कोई गैर राजनीतिक होना नहीं होता है। बहुत ले लिया गया फैन के नाम पर छूट। ये ऐसे तत्व हैं जिन्हें राजनीतिक दल ही बढ़ावा दे रहे हैं ताकि इनकी किसी करतूत की जिम्मेदारी उन पर न आए और काम भी हो जाए। सियासी गुंडों की नई जमात है फैन।  रूप से कोई पत्रकार महत्वपूर्ण नहीं हैं। संस्था बड़ी चीज़ होती है। अगर आप इन बातों से सहमत हैं तो आप वो लोग हैं जो आवाज दबाना चाहते हैं। पत्रकारिता को ऊर्जा भी समाज से मिलनी चाहिए। उसे बढ़ावा भी उस राजनीतिक जमात से मिलना चाहिए जो खुद को लोकतंत्र का दावेदार मानता है। लोकतंत्र के दावेदार सिर्फ राजनीतिक दल होते तो अन्य संस्थाएं नहीं होती । चुनाव ही अंतिम परीक्षण नहीं है। लोकप्रियता ही अंतिम सत्य नहीं हैं। जो समाज पत्रकारिता के साथ खड़ा नहीं होगा वो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा। पत्रकार की आवाज़ नहीं मरेगी, समाज की मार दी जाएगी। कोई भी व्यक्ति बिना आवाज़ के नहीं रहना चाहेगा। बोलने की आज़ादी का चरम वो है कि हम अपनी बात कहें और आप सुनें। तर्क करें। न पसंद आए तो चले जाएं। मगर पत्रकारों को नौकरियों से निकलवाना, उन्हें डराना ये ठीक नहीं है। आज कई लोग सहमति के जुनून में हैं कल उन्हीं को अपनी किसी बात से असहमति जताने के लिए पत्रकार की ज़रूरत होगी।

    सरकार, राजनीतिक दल और कारपोरेट अब मीडिया के ज़रिये संवाद नहीं करते बल्कि अब इनका पूरा का पूरा मीडिया डिपार्टमेंट हैं। प्रोपेगैंडा करना एक वैध तरीका है। उन्हें करना चाहिए मगर आपको देखना होगा कि जो उनके अधीन नहीं हैं वो प्रोपेगैंडा कर रहे हैं या पत्रकारिता। ये राजनीतिक दल रातों रात चुनाव के समय चैनल लांच कर देते हैं। क्या उस दौरान ये चैनल किसी सेल्फ रेगुलेशन में आते हैं या आए थे। आचार संहिता से पहले चैनल लांच करो और सरकारी कोष से जनता के पैसे दे दो, विज्ञापन के नाम पर। एक दल ने अखबारों में विज्ञापन के सारे स्पेस खरीद लिये। दूसरे दल को मौका नहीं मिला। क्या इससे लोकतंत्र का हनन नहीं हुआ। इसकी पारदर्शिता क्या है। क्या चुनाव के समय आचार संहिता के बाद विज्ञापन की पारदर्शिता के कोई नियम हो सकते हैं। अगर दूरदर्शन के लिए नियम हो सकता है कि कई मुख्य दलों को अपनी बात कहने का बराबर मौका मिले तो प्राइवेट चैनलों के लिए यही बात क्यों न हो। यह भी नियम क्यों न हो कि प्रमुख उम्मीदवार कम से कम पांच चैनलों या अखबारों को इंटरव्यू तो देगा ही। यह होने लगा है कि कई नेता अपने स्तर पर फैसला कर लेते हैं कि हम किसी को इंटरव्यू नहीं देंगे। सरकारी महकमों में ट्विटर और सोशल मीडिया के ज़रिये सूचना देने के मामले को लेकर एक याचिका हमारे देश की अदालत मे विचाराधीन है। कई कंपनियों के अपने ट्वीटर अकाउंट हैं वो खुद अपने स्तर पर संवाद कर रही हैं क्या वो भी कल को पत्रकार या मीडिया होने का दावा कर सकती हैं। अमरीका में कई कंपनियों ने अपने टाउनशिप या लोकेलिटी के लिए अखबार या वेबसाइट निकाल लिया है। यहां भी होने वाला है बल्कि हो रहा है।

    कोई राजनीतिक दल या मुख्य उम्मीदवार चुनकर दो चार मीडिया हाउस को इंटरव्यू न दे या कोई चैनल किसी नेता को दिखाना बंद कर दे तो क्या इसके लिए भी कोई रेगुलेटरी मैकेनिज्म हो सकता है। क्या इन सब सवालों पर विचार किये कोई मैकेनिज़्म पूरा हो सकता है। हमारे पास जो सेल्फ रेगुलेशन का सिस्टम है वो इसे अड्रेस नहीं सकता। हर नेता का अपना ब्लाग है और यू ट्यूब चैनल है। उसका रेगुलेशन कौन करेगा। डीएवीपी जैसी संस्थाएं किसे कितना विज्ञापन देती हैं क्या इसकी पारदर्शिता लोगों के बीच में मौजूद है। कई राज्यों में विपरीत खबर लिखने के बाद विज्ञापन रोके गए हैं। क्या कोई कानून है अगर है तो पालन नहीं होता। रातों रात राजनीतिक दलों के चैनल खुल जाते हैं और आचार संहिता लागू होने से पहले उन्हें सरकारी विज्ञापन भी मिलने लगता है। सरकार भी अपने आप में विशाल मीडिया समूह है। मंत्रियों और मंत्रालयों के टवीटर अकाउंट हैं। क्या उन पर रेगुलेशन लागू होगा। अगर वो गलत तथ्य दें तो कहां शिकायत करें। क्या इनके लिए प्राइवेट मीडिया से अलग का कोई रेगुलेशन होना चाहिए। क्यों होना चाहिए।

    कोई राजनीतिक दल किराये के लोग जमाकर फर्जी ट्वीटर अकाउंट खुलवाकर पूरी मीडिया को डिफेम कर सकता है ,न्यूज ट्रेडर, पेड मीडिया, कांगी मीडिया, कोरपोरेटर मीडिया, संघी मीडिया, आप मीडिया कितना कुछ है सिर्फ मीडिया नहीं है। अगर ऐसी जांच हो कि कोई किराये की टीम से किसी पत्रकार या मीडिया हाउस को डिफेम करने के नाम पर परेशान कर रहा है तो क्या सेल्फ रेगुलेशन का कोई सिस्टम इस मामले में भी प्रोटेक्शन देगा। अगर एफ आई आर हो और पुलिस के साथ सेल्फ रेगुलेशन संस्था की टीम मिलकर जांच करे औऱ सही साबित हो तो उस नेता या दल या व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है। हमें भी तो पता चले कि आम आदमी गाली दे रहा है या कोई नेता ये काम करवा रहा है। क्या सार्वजनिक स्पेस में किसी नेता या दल या विचारधारा के फोटो और प्रतीकों का लगाकर किसी को मीडिया पर दिनरात हमला करने की छूट दी जा सकती है। क्या सबकुछ स्वाभाविक ही हो रहा है या कहीं कुछ संगठित भी है। अगर संगठित है तो डरने और मरने से पहले लड़िये।  परिभाषा और भूमिका के सवालों से जूझना होगा और एक रास्ता तो निकालना ही होगा। इसका दायरा बहुत बड़ा है इसलिए कोई कारगर कानून नहीं हो सकता यह किसी कानून की मजबूरी नहीं हो सकती। कानून की खूबी ही यही होती है कि वो व्यापक दायरे पर लागू हो।

    भारत में पेड न्यूज के मामले में विधायक की सदस्यता चली गई मगर न्यूज़ पेपर के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं हुई क्योंकि उन्होंने सूक्ष्म तरीके से विज्ञापन लिखा जो किसी को नज़र नहीं आया मगर कानून को आ गया और वो बच गए । किसी भी लोकतंत्र में सरकार के कामकाज के मूल्यांकन में प्रेस की आज़ादी को शामिल नहीं किया गया है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। क्या जनता और संस्थाओं को सचेत नहीं होना चाहिए कि किसी दौर में मीडिया आज़ाद है या नहीं. सिर्फ रिपोर्टर्स बिदाउट बार्डर्स टाइप संस्था ही इस तरह की रेटिंग क्यों निकाले कि प्रेस की आज़ादी के मामले में भारत की स्थिति चीन से भी खराब है जबकि हम चीन से ज्यादा लोकतांत्रिक माने जाते हैं।

    सब चाहते हैं कि कंट्रोल करें। रेगुलेशन कंट्रोल का नया नाम है। वो नहीं होना चाहिए। इसीलिए संवैधानिक प्रावधानों से लैस सेल्फ रेगुलेशन का सिस्टम होना चाहिए। प्रेस काउंसिल आफ इंडिया भंग कर नई संस्था बने। ये क्या करती है देश का कोई भी पत्रकार नहीं बता सकता। जो भी संस्था बने वो पत्रकार और पत्रकारिता की प्रक्रिया की रक्षा करे। व्यावहारिक और सख्त मानदंड कायम करे। और यह संस्था सभी माध्यमों के लिए हो। जिसके चेयरमैन से लेकर सदस्य तक की नियुक्ति को राजनीतिक प्रभाव से बाहर रखा जाए। यह काम पेशेवर तरीके से किया जाए और इसके चेयरमैन का मकान हापुड़ या इटावा में हो ताकि कोई रिटायरमेंट के बाद ल्युटियन दिल्ली में सिर्फ मकान के लालच में यह पद न लें।

    एक गाइडलाइन तो होनी ही चाहिए जो व्यापक हो और लचीला हो इस तरह से न हो कि संपादक का गला घोंट दिया जाए। सोच कर देखिये कि क्या संपादक को बनाने या हटाने का मामला संस्थान से बाहर किसी संस्था को सूचित करने या वहां अपना पक्ष रखने के मौके से जुड़ सकता है क्या। जिस तरह से एक जज को पर्याप्त अधिकार दिये गए हैं उसी तरह से पत्रकारों संपादकों को भी कुछ सुरक्षित  करना होगा। यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। कोई चूं तक नहीं करता रातों रात पत्रकार निकाल दिये जाते हैं। मालिक बदलते ही संपादक बदल जाता है। उसकी मर्जी पर है कब संपादक माने कब कर्मचारी। सारी लड़ाई एक पत्रकारी की व्यक्तिगत हो जाती है। अपने अस्तित्व और अभिव्यक्ति की आजादी दोनों की। पूरी दुनिया में इसे लेकर बहस हो रही है।