• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • jnu

    क्या पा लिया जयचंद ने निज देश का हित हार के?

    क्या पा लिया जयचंद ने निज देश का हित हार के ?

    हैं कह रहे कन्नौज के वे सौध-धुस्स पुकार के –

    “जर्जर हुए भी आज तक हम इसलिए हैं जी रहे – 

    अब भी सजग हो जाएँ वे विद्वेष विष जो पी रहे” !!  (मैथिलीशरण गुप्त- ‘भारत भारती’)

     

    स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित उनकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना लिखते हुए 30 सितम्बर 1955 को जो बातें कही थीं वो सारी बातें आज उन्ही के नाम पर स्थापित भारत के ख्यातिबद्ध विश्वविद्यालयों में से एक ‘जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय’ में घटित हुए हालिया घटनाक्रम के सम्बन्ध में पूर्णतःप्रासंगिक हो उठती हैं।उन्होंने कहा था “भारत के समग्र इतिहास में हम दो परस्पर-विरोधी और प्रतिद्वंदी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है, जो बाहरी उपकरणों को पचाकर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह, जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है; जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रवृत्ति को बढाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुकाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियां हैं, जो केवल राजनैतिक ही नही, सांस्कृतिक एकता के लिए प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताकतें भी हैं, जो जीवन में विच्छेद डालती हैं, मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं। ” 

    यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण एवं निराशाजनक है कि जिस हकीकतपूर्ण स्थिति का वर्णन जवाहरलाल नेहरु ने आज से साठ वर्ष पहले किया था, हम आज भी वहीँ के वहीँ खड़े हैं, अपितु वह स्थिति आज एक खतरनाक स्तर पर पहुँच गयी है। जिस प्रकार से जेएनयू में एक छद्म विचारधारा की ओट में कुछ असामाजिक तत्वों ने सरेआम भारत-विरोधी एवं पकिस्तान समर्थित नारे लगाये तथा भारतीय लोकतंत्र की आत्मा के पवित्र एवं सर्वमान्य प्रतीक भारतीय संसद पर कायराना हमला करने वालों अफजल गुरु समेत अन्य आतंकियों को शहीद करार दिया, वह मात्र चिंताजनक ही नहीं अपितु राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के लिए एक बहुत बड़े खतरे की घंटी है। 

    किसी विशेष विचारधारा की ओट में किसी भी तरह के राष्ट्रविरोधी कृत्यों को न तो बर्दाश्त किया जाना चाहिए और न हीं उसे जेएनयू जैसे एक ख्यातिबद्ध उच्च-शिक्षण संस्थान में फलने-फूलने की इजाजत दी जानी चाहिए।किसी भी विचारधारा को राष्ट्रहित के खिलाफ जाकर तथा दुश्मन राष्ट्रों का गुणगान कर, भारतीय राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता एवं समरसता के मूल बिंदु पर कुठाराघात करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। जिस राष्ट्र की पावन मिट्टी ने उन विचारधाराओं को पुष्वित-पल्लवित होने का इतना सुनहरा अवसर प्रदान किया हो, जिस देश की धरती ने उन विचार-बीजों को प्रयाप्त उर्वरता प्रदान की हो, आज उसी देश की मिट्टी पर, उसी देश के खिलाफ, वो विचार इतने जहरीले हो उठे कि सरेआम देश-विरोधी जहर उगले जा रहे हैं? ‘इंडिया गो बैक’, ‘पकिस्तान जिंदाबाद’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’ और ‘कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा’ जैसे नारे लगाये जा रहे हैं? ये कैसी विचारधारा है ? ऐसे कृत्य ‘विचार-धारा’ नही अपितु ‘विचार-जकरन’ की श्रेणी में आते हैं जिसे राष्ट्र को राष्ट्रहित में तत्काल संवैधानिक दायरों में रहते हुए दुरूस्त करने की आवश्यकता है।

    भारत की आम जनता के खून-पसीनों से कमा कर चुकाए गए ‘कर’ की बदौलत चलने वाले इतने बड़े विश्वविद्यालय में इन छात्रों का ऐसा करतूत शर्मनाक ही नहीं, अपितु घोर आपराधिक, गैर-संवैधानिक एवं राष्ट्रविरोधी है। मैंने इन कृत्यों में सहभागी जेएनयू के कुछ छात्र प्रतिभागियों को टेलीविज़न पर यह कहते हुए सुना कि उन्होंने ऐसा आयोजन इसलिए रखा था क्योंकि वो लोग सैधांतिक तौर पर ‘मृत्यु-दंड’ के खिलाफ है. सैधांतिक तौर पर ‘मृत्युदंड’ के खिलाफ होने में कोई हर्ज़ नही है। चर्चित मानवाधिकार संगठन ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ के मुताबिक आज तक विश्व के 140 देशों ने ‘मृत्युदंड’ की व्यवस्था को समाप्त कर दिया है। इसलिए ऐसी विचारधारा रखना या इसका विरोध करना अपने आप में बुरा नही है।परन्तु, इस तरह के विरोध या ‘मृत्युदंड’ को ख़त्म करने की मांग सम्बंधित देश के संवैधानिक एवं लोकतान्त्रिक सीमाओं के दायरे में रहकर की जानी चाहिए, न कि उससे ऊपर उठकर और ‘मृत्युदंड’ दिए गए आतंकवादियों की ‘शहादत दिवस’ मनाकर और दुश्मन राष्ट्रों के समर्थन में नारे लगाकर। 

    मेरे विचार में जेएनयू में आयोजित इस कार्यक्रम का ऐसी किसी भी विचारधारा से दूर-दूर तक कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है क्योंकि ‘मृत्युदंड’ को ख़त्म करने की मांग का ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’ से क्या सम्बन्ध हो सकता है? क्या पकिस्तान ने मृत्युदंड समाप्त कर दिया है कि ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाये जा रहे थे? जिन देशों ने ‘मृत्युदंड’ की व्यवस्था को समाप्त किया है, क्या उन देशों ने अपने किसी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में लगाए गए ऐसे ‘राष्ट्रविरोधी नारे’ सुनकर ऐसा किया है ? यह इस बात को दर्शाता है कि कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व इस तरह की छद्म विचारधारा का आवरण ओढ़ राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता को तहस-नहस करना चाहते हैं। उनका असली मकसद देश की बर्बादी है जो वे स्वयं अपनी नारों के माध्यम से स्वीकार भी कर रहे हैं। 

    विख्यात फ्रेंच दार्शनिक वोल्टेयर ने कहा था कि “मुझे मेरे मित्रों से बचाओ, न शत्रुओं से मैं स्वयं बच लूँगा”। जेएनयू प्रसंग के मद्देनज़र भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के सम्बन्ध में यह उक्ति शत-प्रतिशत चरितार्थ हो उठती है। जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वाले ये असामाजिक लोग (चाहे वो किसी भी पार्टी के हो या पार्टी के न हो) इसी तरह के भारतीय नागरिक के आवरण में देशद्रोही तत्व हैं जिनके खिलाफ सतर्क रहने के साथ-साथ सख्ती से निपटने की आवश्यकता है। ऐसा करना अनेक दृष्टिकोण से आवश्यक भी है और उचित भी क्योंकि ऐसा न करने से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश जा सकता है कि भारत यदि अपने देश के ही अन्दर रह रहे भारत-विरोधी ताकतों से निपटने में सक्षम नही है तो वह दूसरे भारत विरोधी देशों से निपटने में क्या सक्षम हो सकेगा ? ऐसा न करने से भारत के दुश्मन राष्ट्रों के हौंसलों में निश्चित तौर पर इजाफा होने की प्रबल संभावना है और भारत को इसके दूरगामी अंतर्राष्ट्रीय परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। 

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक संवैधानिक अधिकार है। यह संविधान से निकलती है। संविधान से राष्ट्र संचालित होता है। परन्तु, यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि कुछ लोग इसी संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर इसके द्वारा संचालित होने वाले राष्ट्र की बर्बादी का सपना देख रहे हैं और तब तक जंग जारी रखने की कसम खा रहे हैं जब तक यह बर्बाद न हो जाये। 

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने आप में संपूर्ण नही है। इसकी अपनी कुछ संवैधानिक शर्तें भी हैं जिसकी मर्यादा में रहकर ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर भारत की ही बर्बादी का सपना अपनी आँखों में पालने वालों इन जयचंदों को देखकर तो मेरे मन में मात्र यही एक प्रश्न उठता है कि “भारत की कोख में आखिर इनलोगों ने जन्म ही क्यों लिया?”

    (ROHIT KUMAR is 4th year B.A.LL.B Student of School of Law, KIIT University, Bhubaneswar, Odisha)