• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Screenshot_2017-07-28-12-05-37-679

    क्या नीतीश कुमार ही सोनम गुप्ता हैं ?

    बिहार में राजनीति ऐसे गरमायी है जैसे बेमौसम बरसात या बिन बुलाए मेहमान ! इस देश ने सियासी उठा पटक तो बहुत देखे हैं लेकिन चुनाव की घबराहट बहुत कम ही देखा है जो आज साफ़ दिख रहा है। ऐसे समय में जब विपक्ष ख़ुद को मज़बूत करने में लगा हुआ था रोज़गार,किसान,अर्थव्यवस्था पर बात होने लगी थी तब ही नीतीश बाबू ने भाजपा के पिन से इस फूलते ग़ुब्बारे को फोड़ दिया। इससे पिछली रात अमित शाह ने एक अच्छी चैन की नींद ले ली…

    तो क्या नीतीश कुमार ही सोनम गुप्ता हैं ? अगर हाँ तो किसके लिए, सैद्धांतिक राजनीति के लिए या राजद,कांग्रेस और पूरे विपक्ष के लिये? 

    यह पूरी कहानी सोनी टीवी पे आने वाली शो सी॰आई॰डी॰ के तरह थी जो एक ही एपिसोड में जाँच ख़त्म कर मुजरिम को पकड़ लेतें हैं। नीतीश कुमार ने भी कुछ ऐसा ही किया शाम में कुर्सी छोड़ा और सुबह फिर पकड़ लिया। क्या यह रोलर-कोस्टर रूपी कहानी उनकी राजनैतिक अंत का संकेत दे रही है ?

    जब नीतीश ने वैकल्पिक राजनीति और संघर्ष का रास्ता छोड़ा:

    आपातकाल के बाद बिहार में आन्दोलन के समय की गठित “छात्र युवा संघर्ष समिति” बनी रही। इसका सम्मेलन 1978-79 के बीच बिहार में हुई थी। किशन पटनायक जो उन दीनो समाजवादियों के मर्गदर्शक थे वो भी उस सम्मेलन में मौजूद थे। उस समय के छात्र-युवा नेता शिवानन्द जी,अख्तर हुसेन जी,बजरंग जी, रघुपति जी, नीतिश जी आदि मौजूद थे।सम्मेलन मे नीतीश बाबू ने सबके सामने उनका साथ यह कहते हुए छोड़ा कि उन्हें जनता पार्टी मे जाना है।किसी को तोडकर नहीं, अकेले जाना है। यह इसीलिए क्योंकि उन्हें संसदीय राजनीति ही करनी है। उनमें चुनाव लड़ने की हड़बड़ी होगी तभी शायद नयी राजनीति से बेवफ़ा हो गए हमारे सोनम गुप्ता।

    इससे राजनीतिक महत्वकांक्षा रखने वालों पर भी असर पड़ा है, सैद्धांतिक राजनीति से उनका विश्वास और उठता जा रहा है। अवसरवाद ज़्यादा तर सिद्धांतों पर भारी पड़ता है। हाँ, अगर नीतीश कुमार बिना कुर्सी के राजनीति करते तो इतिहास और भविष्य दोनो में सबसे निष्पक्ष नेता के तौर पर देखे जाते। जदयू सांसद अली अनवर ने कहा “मेरी ज़मीर मुझे यह इजाज़त नहीं देती की मैं उनके इस फ़ैसले का समर्थन करूँ”। ख़ुद की पार्टी के क़द्दावर नेताओं के ऐसी प्रतिक्रिया के बाद उनका रुख़ भी देखने लायक होगा। यह सब तो ठीक है पर नीतीश के इस क़दम के बाद केजरीवाल क्या सोच रहे होंगे? क्या किसी मीडिया बंधु ने उनसे इसपर राय पूछी? वो तो विपक्ष में इनको अपने साथी के तौर पर देखते थे।

    लोकतंत्र का क्या हुआ ?

    जी हाँ मुर्दे लोकतंत्र को ज़िंदा कर फिर से मार दिया गया ! ज़िंदा तब हुआ जब भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने ने इस्तीफ़ा दिया और मौत तब हुई जब बीजेपी से गठबंधन हुआ। तेजस्वी यादव का कहना है कि वे विधान सभा में सबसे बड़े दल थे तो उन्हें पहले मौक़ा दिया जाना चाहिए था।इससे राज्यपाल पर भी सवाल खड़े होते हैं। वैसे सरकार तो नहीं बनती पर एक दिन का ड्रामा और बढ़ जाता। लोग भी तमाशा देखते रह गए। कुछ लोग तो अभी भी कन्फ़्यूज़ होंगे की हमने वोट किसको दिया था और सरकार किसकी बनी ! कुछ जो नीतीश को मुख्यमंत्री तो देखना चाहते थे पर लालू के साथ नहीं वो आज बहुत ख़ुश होंगे और विकास के इंतज़ार में और 40 महीने ख़ुद को सांतवना देंगे। मुझे डर है की कहीं चुनाव एक प्रक्रिया मात्र बनकर ना रह जाए जिसपर अलोकतांत्रिक ताक़तों से क़ब्ज़ा किया जा सकता है।

    इसमें कोई शक नहीं है की नीतीश कुमार जबसे कुर्सी पर बैठे हैं तबसे बिहार में बदलाव हुए हैं या नहीं बिलकुल हुआ है, विकास हुआ है और बीजेपी के साथ भी हुआ है पर जिन सवालों और उसूलों को लेकर वो इस पक्ष से उस पक्ष में कूदे हैं वो बहुत अचम्भित कर देने वाला है ! 

    तो क्या सिधांतो की और उसूलों की राजनीति में कोई जगह नहीं है ? क्या यह सब सिर्फ़ किताबी बातें हैं? क्या जनता को किसी से ऐसी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए? जो लोग आज ये सवाल नीतीश कुमार से नहीं कर रहे हैं उन लोगों को लालू से राहुल से या किसी भी नेता से सवाल करने का अधिकार नहीं है।

    ख़ुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले सिपाही बनाकर क्या वो सहारा बिरला डायरी, प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना घोटाला जैसे अन्य मुद्दों पर भी बोलेंगे? यह तो वक़्त ही बताएगा की भाजपा के साथ सरकार बनाकर वे ऐसे कितने मुद्दों पर अपनी राय रखेंगे हैं।

    क्या भ्रष्टाचार को देखते हुए वो फिर से इस्तीफ़ा देने की हिम्मत रखते हैं? शायद बिहार की जनता अब उन्हें इस्तीफ़ा देने लायक नहीं छोड़ेगी। जो भी हो नीतीश कुमार के इस क़दम से हमारे देश की राजनीति और खोखली हो गयी है जिसे अगर जल्द नहीं भरा गया तो देश की दशा और दिशा दोनो बिगड़ते जाएगी।

    (Author of the article is Rishav Ranjan)