• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Kalpanadham

    ‘कल्पनाधाम’ का संवैधानिक पहलु

    कल्पनाधाम ‘ग्राम विकास आवासीय विद्यालय, कांकिया’ के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ है. यह विद्यालय ओड़िशा राज्य के गंजाम जिले में ब्रह्मपुर शहर से करीब 15 किमी दूर स्थित है. ‘कल्पनाधाम’ स्थापित करने का विचार सबसे पहले शालिनी कृष्णन के दिमाग में आया था जो उस समय एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फ़ेलोशिप के अंतर्गत 13 महीने के लिए ग्रामीण ओड़िशा में काम करने आई थीं. उन्हें ‘ग्राम विकास’ एनजीओ के अन्दर इसी स्कूल के साथ काम करने का मौका मिला था. वह एक अछे-खासे वेतन वाली नौकरी छोड़कर यहाँ आयी थीं. उनके पास विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों में लगभग 7 वर्ष तक काम करने का अनुभव भी था.

    इस विद्यालय में आने के बाद और विशेषकर बच्चों से बातचीत करने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि बच्चे कला के क्षेत्र में बहुत होनहार हैं और अगर उन्हें मौका मिले तो वे वास्तव में इस क्षेत्र में असीम ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं. शालिनी को ऐसा लगा कि बच्चों को उचित प्लेटफार्म और अवसर मिलने पर वह कला के क्षेत्र में कमाल कर सकते हैं. अतः, उन्होंने विद्यालय परिसर के अन्दर ‘कल्पनाधाम’ स्थापित करने का निर्णय लिया. एक ऐसी जगह जहाँ बच्चे उन्मुक्त रूप से सोंच सकते थे, अपने कल्पना को प्रयोग के धरातल पर उतार सकते थे, जो जी में आये वह चित्र बना सकते थे, अपने पसंद की पेंटिंग कर सकते थे, थिएटर कर सकते थे, गीत गुनगुना सकते थे एवं नृत्य कर सकते थे. सारांशतः, इसकी शुरुआत एक ऐसे जगह के तौर पर हुई जहाँ बच्चे अपनी कल्पनाओं को मूर्त रूप दे सकते थे, उसे वास्तविक जीवन में भरपूर जी सकते थे.

    ‘कल्पनाधाम’ की स्थापना के बाद विद्यालय के बच्चों के बीच यह अत्यधिक लोकप्रिय हो गया. विद्यार्थियों के लिए यह एक ऐसी जगह थी जहाँ वे कुछ अलग हटकर सोंच सकते थे, जहाँ वे कुछ अलग हटकर कर सकते थे, जहाँ वे उन्मुक्त रूप से सोंच सकते थे, जहाँ उन्हें अपने पसंद के कार्यों को करने की आज़ादी थी, जहाँ उन्हें क्लासरूम में हो रहे पढ़ाई के बारे में कुछ चिंता नही थी, जहाँ उनका पसंद ही सर्वोपरी था. एक रूप में यह उन बच्चों के लिए ‘स्वतंत्र-क्षेत्र’ था.

    स्थापना के तुरंत बाद ‘कल्पनाधाम’ के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे. बहुत सारे विद्यार्थी कला-सम्बंधित भिन्न-भिन्न प्रतियोगिताओं में जिला स्तर पर, राज्य स्तर पर और यहाँ तक की राष्ट्रीय स्तर पर भी भाग लेने लगे और परिणामस्वरूप कई सारे इनाम जीतकर भी आये. ‘कल्पनाधाम’ अभी भी उसी रूप में बरकरार है. यह अभी भी विद्यालय परिसर के अन्दर बच्चों का सबसे पसंदीदा स्थल है.

    मेरे लिए ‘कल्पनाधाम’ का महत्व सिर्फ कला तक ही सीमित नही है. कला के साथ-साथ ‘कल्पनाधाम’ ने विद्यार्थियों में संवैधानिक मूल्यों को भी पोषित-पल्लवित करने का काम किया है. मेरे लिए कल्पनाधाम विद्यार्थियों के ‘अभिव्यक्ति के अधिकार’ का एक सुन्दर प्रतिक है. ‘अभिव्यक्ति का अधिकार’ हमारे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारों में से एक है. मेरे विचार में, हरेक विद्यालय में ‘कल्पनाधाम’ जैसी जगह का होना हरेक विद्यार्थियों का संवैधानिक अधिकार है.

    प्रत्येक विद्यालय में एक ऐसी जगह का होना नितांत आवश्यक है जहाँ बच्चे अपने आप को उन्मुक्त महसूस कर सकें, किताबी पढ़ाई से थोड़े देर के लिए अलग हटकर सोंच सकें, जहाँ उनके कल्पनाशीलता को प्रोत्साहन मिल सके. आखिरकार, पढ़ाई का एक मुख्य उद्देश्य अपने आपको अच्छे तरीके से अभिव्यक्त करने का तरीका सीखना भी है. जब अभिव्यक्त करने के लिए सीखना पढ़ाई के महत्वपूर्ण आयामों में से एक है तो फिर बच्चों को ऐसे प्लेटफार्म और अवसर से कैसे महरूम रखा जा सकता है जो उनकी कल्पनाशीलता को पंख लगाए? मेरे विचार में ‘कल्पनाधाम’ हरेक विद्यार्थियों का एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक अधिकार है.

    जब सरकार बच्चों में नवरचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए ‘अटल इनोवेशन मिशन’ जैसे प्रोग्राम ला सकती है तो फिर बच्चों में कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता को बढ़ावा देने के लिये हरेक विद्यालयों में ‘कल्पनाधाम’ की स्थापना क्यों नही कर सकती है? आखिरकार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारे मुलभुत संवैधानिक अधिकारों में से एक है. मेरे समझ से, ‘ग्राम विकास आवासीय विद्यालय, कांकिया’ में कल्पनाधाम की स्थापना अपने समय से बहुत आगे की चीज है. इसे शेष जगहों पे भी क्रियान्वित किया जाना चाहिए.