• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • JKA

    जय किसान आंदोलन – मार्च से सत्याग्रह तक ..

    1 अगस्त को पंजाब के बरनाला से हमने दिल्ली की तरफ एक ट्रेक्टर-मार्च शुरू किया। हरियाणा और उत्तर-प्रदेश के गाॉवों से होते हुए हम जंतर-मंतर पहुँचने वाले थे। 9 अगस्त को लगभग 200 ट्रेक्टरों पर जब सैकड़ों किसान दिल्ली बॉर्डर पर पहुँचे तो पुलिस ने हमें रोक दिया। कहा कि हमारे ट्रेक्टरों को अंदर नहीं आने दिया जायेगा। हमने एक महीने पहले परमिशन ले रखी थी। यहां तक कि जिस रुट पर हम जाने वाले थे, वो भी पुलिस ने ही सुझाया था। 2 घंटे की जद्दोजहद के बाद हमने पैदल ही दिल्ली में प्रवेश करने का निर्णय लिया।

    शाम 9 बजे तक हम जंतर-मंतर पहुँचे। रात को हमारे कुछ साथी अगले दिन होने वाली रैली की तैयारियों का जायज़ा ले रहे थे। तभी आधी रात को दिल्ली पुलिस के कुछ गुंडों ने हमारे दोस्तों की बेरहमी से पिटाई कर दी। 11 लोग घायल हो गए जिनमें से 6 को राम मनोहर लोहिया हस्पताल में भर्ती करवाया गया। लड़कों की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने कुछ बेक़सूर लोगों को गुंडों से बचाने की कोशिश की।

    अगले दिन 10 अगस्त को देश भर से हज़ारों किसान जंतर-मंतर पर इक्कट्ठे होकर हुंकार भरी और जय-किसान रैली को सफल बनाया। सभा में यह तय हुआ कि किसान संघर्ष के प्रतीक के तौर पर 200 किलो का एक हल हम प्रधानमंत्री के घर के सामने बने रेस-कोर्स पर स्थापित करेंगे। जी हाँ, वही रेस-कोर्स, जहाँ प्रधानमंत्री के नाक के नीचे जुए और सट्टेबाज़ी का अड्डा चलता है। विदर्भ में ख़ुदकुशी किये कुछ किसानों की विधवा महिलाएं हमारे रैली में आयीं थी। इन्हीं महिलाओं के नेतृत्व में हम हल को लेकर रेस-कोर्स की तरफ बढे। लेकिन 100 मीटर पर ही हमें रोक दिया गया। पुलिस ने हमारी राह के आगे बैरिकेड लगा दिए। महिलाओं ने पुलिस प्रसाशन को समझाने की खूब कोशिश की। हमने निवेदन किया कि सिर्फ़ 10 महिलाओं को जाने दिया जाए जो शांतिपूर्वक ढंग से किसान के इस प्रतीक को स्थापित कर आएँगी। लेकिन फिर भी हमें इजाज़त नहीं मिली। हमने एक बार भी बैरिकेड तोड़ने या पुलिस से झड़प करने की कोशिश नहीं की। बिलकुल शालीनता से कानून का पालन करते हुए हमने वहीँ खड़े होकर हल-सत्याग्रह शुरू कर दिया। ये वही सत्याग्रह है जिसने मात्र 6 घंटों में सरकार को हिला कर रख दिया। हमने ये तय किया कि 15 अगस्त के प्रधानमंत्री के भाषण तक 200 किलो के इस पवित्र हल को हम अपने कंधों पर लेकर खड़े रहेंगे, नीचे ज़मीन पर नहीं रखेंगे। हमने कहा कि प्रधानमंत्री अपने भाषण में यह मानें कि किसान अपनी दयनीय स्थिति के कारण ख़ुदकुशी कर रहे हैं, ना कि प्रेम प्रसंग के कारण। हमने प्रधानमंत्री से आत्महत्या-मुक्त भारत बनाने के लिए उनका कार्यक्रम बताने को कहा।

    1 घंटे बाद पुलिस ने हमसे थोड़ा पीछे हो जाने का निवेदन किया ताकि मेट्रो स्टेशन जाने वाला एक रास्ता फ्री हो सके। हम तुरंत मान गए और वापिस अपने पंडाल में जाकर हल को कंधे पर लिए खड़े हो गए। हम पुलिस की बात और हर कानून का पालन करते गए। लेकिन इतने शान्ति और शालीनता से आंदोलन करने के बाद भी रात के 12:30 पर मुझे जानकारी मिली कि सैकड़ों पुलिस हमारे पंडाल के सामने इक्कट्ठे हो रहे हैं। मैं जल्दी-जल्दी में जंतर मंतर पहुँचा। तब तक योगेन्द्र यादव के साथ हमारे 90 साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी। देश के किसानों के प्रतीक हमारे हल को पुलिस ने ज़ब्त कर लिया। योगेन्द्र यादव के साथ बद्सलूखी की गयी। उसके कुछ देर बाद संसद मार्ग थाने की पुलिस ने मुझे और राजीव गोदारा को भी गिरफ़्तार कर लिया।

    गिरफ़्तार करने की प्रक्रिया में हमारे साथ धक्का-मुक्की हुई, हर क़ानून का उल्लंघन हुआ और जेल के अंदर हमें जान से मार देने तक की धमकी मिली। इस पूरे संस्मरण में यदि मैं एक ख़ास सत्याग्रह का ज़िक्र ना करूँ तो आपसे बेईमानी होगी। संसद मार्ग थाने के अध्यक्ष की गुंडागर्दी के कारण हमने जेल के अंदर एक बिलकुल नए तरह का सत्याग्रह शुरू किया – जब भी थानाध्यक्ष हमारे सामने से गुजरता तो हम सभी 90 लोग उसको देख देखकर ज़ोर ज़ोर से हँसते थे। मैं आपको बता नहीं सकता ये कितना कारगर हथियार है – आधे घंटे में ही वो हमसे बच के निकलने लगा, हमारे पास आने से घबराने लगा।

    अगले सुबह तक हमें बताया नहीं गया कि हम किस ज़ुर्म में अंदर हैं। खाना तो दूर हमें पानी तक नहीं मिला। हमारे वकील प्रशांत भूषण को हमसे मिलने नहीं दिया गया। कई सांसद वहाँ पहुँचे लेकिन किसीको भी हमसे मिलने नहीं दिया गया। जब भी हम मीडिया से बात करते तो हमें ऐसे रोका जाता था जैसे कि कोई खूँखार आतंकवादी हो। हमें पता था कि ये सब ऊपर से हो रहा है। पुलिसवाले तो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रहे थे, असली परेशानी थी हमारे प्रधानसेवक को। हमारे सत्याग्रह से सरकार घबरा चुकी थी, डर चुकी थी। यह डर योगेन्द्र यादव या स्वराज अभियान से नहीं था। सरकार को डर था उस मजबूत प्रतीक से जिसको हमने प्रधानमंत्री के भाषण तक अपने कंधे पर रखने का प्रण लिया था। इस मौके पर मुझे बार बार गाँधी जी का नमक आंदोलन याद आता है। उस आंदोलन में भी “नमक” एक मजबूत प्रतीक था अंग्रेज़ों को हिलाने का। इतना तो मैं अच्छे से समझ गया था कि इस “हल” ने सरकार को हिला दिया था।

    दोपहर 3 बजे हमें मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया जहाँ पता चला की पुलिस ने मेरे ऊपर धारा 107 और 152 लगाया है। तब तक प्रशांत भूषण और कामिनी जायसवाल ने दिल्ली हाई-कोर्ट में याचिका दायर कर दिया था। हाई-कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाईं और हमारे ऊपर लगे सभी धाराओं को बेबुनियाद बताते हुए हमें रिहा कर दिया गया। लेकिन यहाँ से एक और कहानी शुरू हुई।

    अगले दिन, यानि 12 अगस्त को हम जंतर मंतर पर इक्कट्ठे हुए और किसानों का हल वापिस लेने संसद मार्ग थाने की तरफ बढे। पुलिस ने हमें फिर रोक दिया और बेवजह बद्तमीजी की। हमें कहा गया कि सिर्फ़ 4 लोगों को ही आगे बढ़ने दिया जायेगा। हमने हमेशा की तरह फिर पुलिस की बात मानी। लेकिन पुलिस ने हमें हल देने से इंकार कर दिया और ना ही विरोध करने के लिए जंतर मंतर पर इजाज़त दी। वापिस लौटते ही योगेन्द्र यादव ने ऐलान कर दिया कि वो अनशन पर बैठेंगे लेकिन इससे पहले एल.जी. से मिलकर एक अंतिम कोशिश करेंगे। शाम 05:15 पर हमारी एल.जी. से मुलाक़ात हुई। नजीब जंग ने हमें हल वापिस लौटाने का वादा किया। इसके अलावा उन्होंने 15 अगस्त के कारण दिल्ली के सुरक्षा हालातों के बारे में बताया। उन्होंने कई तरह के खतरों की आशंका के बारे में बताया जिसको कोई भी ज़िम्मेदार व्यक्ति अनसुना नहीं कर सकता था।

    15 अगस्त के मद्देनज़र देश पर मंडरा रहे खतरे को समझते हुए हमने अपने आंदोलन को रोकने का निर्णय लिया। आज मुझे गर्व है कि मेरे संगठन ने ज़िम्मेदारी और गंभीरता का परिचय दिया। हमारा आंदोलन चरम पर था, सरकार घबराई हुई थी। ऐसे में बहुत कम होते होंगे जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए राजनीतिक और सांगठनिक हित को पीछे रखें।

    ख़ैर, अब जाकर कुछ समय मिला है ठहर के सोचने का। आंदोलन, यात्रा, रैली, सत्याग्रह, जेल से होते हुए हम आ गए हैं वापिस, लेकिन तबियत ख़राब हो गयी है। कुछ दिन अभिनव के हाथ की चाय पिएंगे तो तबीयत दुरुस्त होगी।

    आज मैंने प्रधानमंत्री का भाषण भी सुन लिया। बड़ी बड़ी उम्मीदें लगाये बैठे थे किसान, लेकिन लगा जैसे मोदी जी स्वतंत्रता दिवस की जगह किसी चुनावी रैली में बोल रहे हों। मेज ठोक के बड़ी बड़ी बातें करके चले गए हमारे प्रधानसेवक। कृषि मंत्रालय का नाम अब कृषि किसान कल्याण मंत्रालय होगा। मोदी जी के इस क्रांतिकारी कदम से किसानों की ख़ुदकुशी बंद हो जाएगी, वैसे ही जैसे योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग रख देने से महंगाई घट गयी। जी हाँ, काम करने का ज़माना बीत चुका है। अब तो बस ब्रांडिंग करो, नामकरण करो, मीडियाबाज़ी करो और राज करो। स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, सिट-डाउन इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया…