• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • dilli

    जगजीत सिंह, राम और रामज़ादा

    तेरे आने की जब ख़बर महके, तेरी खुश्बू से सारा घर महके।

    जगजीत सिंह ऐसे गाते हैं जैसे कोई कानों के पास सरगोशियां कर रहा हो। घर ख़ाली हो और एक आवाज़ तैर रही हो। ख़बरों की दुनिया में दिन रात रहते रहते ख़बरों से ख़ुश्बू आती नहीं है। लेकिन जगजीत सिंह गा रहे हैं तेरे आने की जब ख़बर महके।

    काश अब कुछ ख़बरें ऐसी भी हों जिनके आने से सारा घर महके। मगर ख़बरें तो सरकार सियासत की गलियों से होकर आती हैं। उनमें ख़ुश्बू की संभावनाएं कहां होती हैं। कोई रामज़ादा कहता है तो कोई किसी को राम कह रहा है। इससे पहले किसी ने राम के नाम को एक गाली के समानंतर नहीं जपा था। क्या रामज़ादा उस गाली का विपरितार्थक शब्द है। कल को सिनेमावाले इस गाली की जगह रामज़ादा का इस्तमाल करने लगे तो। क्या उस साध्वी ने राम के साथ अन्याय नहीं किया है। आख़िर उनके मन में कैसे राम थे जो किसी गाली की तुलना में निकले। रामभक्त से रामज़ादा के बीच इस संक्रमणकाल में क्या राजनीति ने भक्ति, धर्म और उसके नायकों-देवों को इतना ही समझा है। फिर कैसे इन ख़बरों के आने पर ख़ुश्बू आए।

    शाम महके तेरे तसव्वुर से,

    शाम के बाद फिर सहर महके…..

    रात भर सोचता रहा तुझको

    ज़हनों दिल मेरे रात भर महके….

    याद आए तो दिल मुनव्वर हो, दीद हो जाये तो नज़र महके,

    दीद हो जाए तो नज़र महके,

    तेरे आने की जब ख़बर महके…..

    जगजीत सिंह को सुनते सुनते लिख रहा हूं। पहले भी ऐसा प्रयास किया था। एक शांत ग़ज़ल चला दीजिए फिर जो दिमाग़ में आए उसे लिखिये। देखिये कि आपका दिमाग़ उस ग़ज़ल की चाल से चल रहा था या उस गबन के हिसाब से जो राजनीति रोज़ हमारे ख़्यालातों में कर देती है। बेहद हल्का संगीत है। बांसुरी मिठास बढ़ा दे रही है। ऐसा लगता है कि शाम हो गई है।

    वो ख़बरें फिर सामने आ गईं हैं जिनसे कुछ होना-जाना नहीं है। इन बहसों में कोई नहीं जीतेगा। सिर्फ हार होती है और वो होती है हमारी, आपकी। ऐसे टूटे दिलों के ज़ख़्मों पर लोशन हैं जगजीत सिंह। कोई सियासत में इतना वहशी क्यों हो जाता है। रोटी कपड़ा मकान के इतने मसले हैं। आध्यात्म की बात करने वालों की ज़ुबान पर रामज़ादा उस गाली के विकल्प में क्यों आ जाता है जिसे यहां लिख भी नहीं सकता। कोई अपने नेता को राम बता रहा है। क्या हमारे राम का स्वरूप  इतना मूर्त हो गया है कि वो कोई भी हो सकता है। वो कैसा भी हो सकता है। वो सत्ता में आने के पहले राम क्यों नहीं होता। वो कुर्सी पाने के बाद ही क्यों राम बनता है। राम तो कुर्सी छोड़ने के बाद बने थे। अगर कोई भी राम हो सकता है तो फिर तो वो कहीं भी रह सकते हैं। फिर कोई अयोध्या क्यों गया । क्या कोई विरोधी राक्षस हो सकता है। क्या सब कुछ राम के नाम पर ही होगा। कोई राम का नाम लेकर सुकून क्यों नहीं पैदा करता।  हम मीठा क्यों नहीं बोल रहे हैं। हम ग़ज़ल क्यों नहीं सुन रहे हैं। हम राम में ग़ज़ल क्यों नहीं सुन रहे हैं।  जगजीत सिंह को क्यों नहीं सुन रहे है।

    बहुत समझाना चाहोगे, न समझा पाओगे

    मैं उतना याद आऊंगा, मुझे जितना भुलाओगे,

    कभी खामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे……

    एक और ग़ज़ल बजने लगी है। जगजीत सिंह किसी सागर की लहरों की तरह रूह पर लौट आए हैं। अब बहुत आराम है

    कभी दुनिया मुकम्मल बनके आएगी इन राहो में…

    कभी मेरी कमी दुनिया की हर इक शह में पाओगे……

    मैं उतना याद आऊंगा, मुझे जितना भुलाओगे…