• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    जब ख़बर न छपे, जब टीवी न दिखाये तब भी..

    सब कुछ पर्दे पर हो यह ज़रूरी नहीं है,
    सब कुछ पन्ने पर हो बिल्कुल जरूरी नहीं है
    कभी कभी पीठ भी पन्ने का काम कर सकती है
    कभी कभी पीठ भी पर्दे की तरह प्रसारित कर सकती है
    लाठियों से खींच गई ख़ूनी लकीरों को
    तरंगों में बदल कर उन्हीं काली रातों में चुपचाप
    जिनके सहारे सरकारों ने पीठ दाग दी थी छात्रों की
    जाँघों पर तो कभी पेट में मारा था छात्राओं के
    चुप्पी हमेशा संपादक के फ़ैसले की ग़ुलाम नहीं होती है
    वो पीठ पर खींची लकीरों की लानत से पसरती है
    सलाखों के पीछे तमाम धाराओं में बंद हो जाने के बाद भी
    सिसकियों ने कुछ तो दर्ज किया ही होगा अपने भीतर
    हालिया बयान से लेकर इकबालिया बयान तक
    किसी से तो कहा होगा, किसी ने तो पूछा होगा,
    किसी ने तो आँखें फेरने से पहले देखा होगा
    बालों को खींचकर, पीठ पर मारकर लाये जाते हुए
    खींच खींच कर बरसाई गयीं होंगी लाठियाँ
    तब भी जब किसी ने न सुना होगा
    क्या उसने भी न सुनी होगी
    जिसकी पीठ पर पड़ी होंगी लाठियाँ
    जिसके पेट में पड़े होंगे लात-घूँसे
    कम से कम मारने वाले ने तो देखा ही होगा
    मारते हुए और घसीटते हुए
    फिर कौन कहता है कि ख़बर छपी नहीं,
    कहीं कुछ दिखा नहीं,
    कुछ वकील और कुछ डाक्टर ने तो देखा ही होगा
    तब भी जब गढ़ी गईं होंगी झूठी दलीलें और रिपोर्ट
    फिर कौन कहता है कि ख़बर छपी नहीं
    कहीं कुछ दिखा नहीं
    पीठ जब तक विकल्प है टीवी और अख़बारों का
    तब तक प्रमाण है
    कि ख़बर नहीं छपने से मिट नहीं जाती है
    वो बची रहेगी और रह जाती है
    उन बेचैनियों में कि कहीं से कोई आवाज़ क्यों न आई
    कहीं किसी ने हमारी आवाज़ सुनी नहीं
    जब तक पीठ है तब तक टिके रहो
    जब तक पुलिस है पीठ पर लिखवाते रहो
    सहने के लिए सत्ता की ताकत
    पन्ने और पर्दे नहीं
    एक पीठ चाहिए
    उनसे बचने के लिए जो पीठ दिखा कर भाग जाते हैं

    नोट: यह कविता विगत वर्ष के भादो में लिखी गई थी । इसका हैदराबाद या किसी विश्विद्यालय की घटना से कोई संबंध नहीं है । यह सही है कि मैं कविता पहले लिख लेता हूँ । घटना बाद में हो जाती है । इसमें कविता का कोई क़सूर नहीं है । मैं तो सिर्फ भगत सिंह का पोस्टर शेयर करता हूँ । पोस्टर का पीठ से क्या लेना देना । पोस्टर का फंदे से क्या लेना देना । अगर मैं घटनाओं के असर में कविता लिखने लगा तो कितनी घटनाओं पर कविता लिख सकूँगा । असंभव । संभव है कि होली मनाई जाए । होली मनाने से एकता का त्योहार मन जाता है । हमारी एकता को त्योहारों की सख़्त ज़रूरत है । कविता की कोई ज़रूरत नहीं है ।