• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    हैप्पी बर्थडे चैंपियन! #ThankYouYuvi

    12 दिसम्बर 1983 को यूँ तो चंडीगढ़ में बहुत से बच्चों का जन्म हुआ होगा, लेकिन उनमें से एक को जन्म दिया था योगराज सिंह की पत्नी शबनम सिंह ने। किसी को नहीं पता था कि आगे जाकर ये बच्चा इस देश को क्रिकेट के जगत के अनेक ख़िताबों  से नवाज़ देगा। युवराज सिंह का जन्म चंडीगढ़ में आज हीं के दिन एक पंजाबी परिवार में हुआ था। पिता पहले से ही भारतीय टीम का हिस्सा थे इसीलिए बचपन से हीं क्रिकेट की तरफ अलग ही लगाव था। माना जाता है कि युवराज सिंह और भी कई खेल जैसे टेनिस और रोलर-स्केटिंग में रूचि रखते थे और अंडर-19 रोलर स्केटिंग चैंपियनशिप भी जीती थी। लेकिन योगराज सिंह एक टिपिकल इंडियन पेरेंट जैसे उन्हें सिर्फ क्रिकेट खेलते ही देखना चाहते थे। लगभग 14 साल की उम्र में युवराज पंजाब से अंडर-16 में  खेलने लगे। पदोन्नत हो कर युवराज को पंजाब अंडर-19 में जगह मिली और उन्होंने शानदार 137 रन कूट डाले। फलस्वरूप 1997-98 की रणजी ट्राफी में उन्होंने अपना पहला फर्स्ट क्लास मैच उड़ीसा के खिलाफ खेला। दुर्भाग्य से उस मैच में युवी खाता भी नहीं खोल पाए। युवराज शुरू से ही जिद्दी और हार न मानने वालों में से थे। क्रिकेट पंडितो की आंखे भौचक्की रह गयीं जब युवराज सिंह की तूती बोली कूच-बिहार ट्रॉफ़ी के फाइनल में। जहाँ बिहार 357 पर आल आउट हो गया था, इस नौजवान ने अकेले 358 रन बना डाले। 1999 में भारत अंडर-19 का प्रतिनिधित्व भी किया। मोहम्मद कैफ़ की अगुवाई में अंडर-19 विश्व कप को भारत ने जीता जिसमें युवराज को मैन ऑफ़ दी टूर्नामेंट का ख़िताब मिला। युवराज को अब पूरा देश जानने लगा था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड जैसी टीम के खिलाफ युवराज का प्रदर्शन बेहतरीन और काबिले तारीफ़ था जिसकी बदौलत उन्हें नेशनल क्रिकेट अकादमी का रास्ता मिला और 2000 में उन्हें आईसीसी नॉक ऑउट में राष्ट्रीय टीम में पर्दापण मिला। याद दिला दूँ कि ये वो दौर था जहाँ सौरव गांगुली की अगुवाई में टीम इंडिया विश्व क्रिकेट में अपना छाप छोड़ने की तैयारी में थी।

    गांगुली ने युवराज समेत सहवाग़, ज़हीर, हरभजन कई खिलाड़ियों को ढूँढ निकाला जिन्होंने आगे चल कर देश का नाम रोशन ही नहीं बल्कि देश को कई ख़िताबों से नवाज़ दिया। अपने पहले मैच में युवराज बैटिंग नहीं कर पाए। लेकिन क्वार्टर-फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इस 18 वर्ष के खिलाड़ी ने क्या किया पूरी दुनिया देख के दंग रह गयी। ब्रेट ली, गिल्लेस्पी, मैक्ग्राथ की अचूक गेंदबाजी भी युवराज सिंह को भेद न पाई और देश को मिला एक नया योद्धा जो आगे चल कर इसी ऑस्ट्रेलियाई टीम को सालों-साल तक पानी पिलाता रह गया।

    दिसम्बर 2000 में ज़िम्बाब्वे के खिलाफ ख़राब प्रदर्शन के कारण युवराज को टीम से बाहर होना पड़ा। लेकिन युवराज ठहरा बड़ा जिद्दी, शायद कमबैक किंग इसीलिए कहा जाता है।

    कौन भुला होगा वो 2001 का कोका कोला कप जहाँ युवराज से कोई भी श्रीलंकाई गेंदबाज बच नहीं पाया था। मुरली और वास जैसों को युवराज ने बहुत सूझ-बूझ से खेलकर पंडितो को फिर हैरान कर दिया | युवराज ने 2001/02 के बीच काफी  घरेलू क्रिकेट भी खेली और अपने खेल में निपुण होते गए। उसके बाद क्या हुआ उसे बताने की कभी जरुरत नहीं। देश को एक हरफनमौला खिलाड़ी तैयार होता नज़र आ रहा था। नेटवेस्ट सीरीज याद है ना? दादा की अगुवाई ने विश्व क्रिकेट में आग लगा रखी थी। 13 जुलाई का वो ऐतिहासिक दिन। अंग्रेजो के 324 के जवाब में भारत की पारी 146/5 जैसे हालत पे लड़खड़ा गयी और सबको लगने लगा की भारत अपने पुराने आदत का मुज़ायरा देने पे आतुर हो गया है। लेकिन मोहम्मद कैफ़ और युवराज ने क्या खूब खेल खेला और अंग्रेज़ों को पटखनी दे डाली। कैफ़ डाल-डाल तो युवी पात–पात जैसा खेल खेल रहे थे। किसे पता था कि भारत के इतिहास की सबसे अच्छी जीत की भूमिका लिखी जा रही है। वो जीत आज भी दिल को सुकून दे जाती है। स्टार स्पोर्ट्स पे आज भी जब उसका हाईलाइट देखता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं जी। दादा की खुली शर्ट की चर्चा, युवी और कैफ़ की पारियों से ही थी। किसे पता था कि आज इतिहास ही बन जाएगा। युवराज सिंह अपने आप में एक अलग किस्म के जुझारू इन्सान थे। चंचल, मस्तमौला और जिंदादिल किस्म के। 

    2002/03 में फिर युवी को थोडा उतार–चढ़ाव देखना पढ़ा लेकिन अपने इस हरफनमौला को विश्व कप के 15 सदस्य की टीम में हिस्सा मिल ही गया और पाकिस्तान, इंग्लैंड जैसी टीम के खिलाफ अच्छा खेल भी दिखाया। 2004/2007 का समय युवराज के खेल का अहम् हिस्सा रहा जिसमे युवराज ने काफी कुछ सीखा और अपने खेल से भारत की उम्मीदों को जगाये रखा। युवराज ने टेस्ट क्रिकेट में भी अपना दमखम दिखाया, सचिन के साथ 165 की अविजित साझेदारी कर के भारत को चेन्नई टेस्ट में अंग्रेजो के खिलाफ जीत दिलाई। ये वही जीत थी जिसे भारत ने चौथी पारी में 387 रन बना कर एक नया इतिहास रचा था। युवराज ने पाकिस्तान के खिलाफ 2007 में अपने टेस्ट पारी का सबसे बड़ा स्कोर 169 बनाया था। ये वही दौर था जब युवराज और धोनी की जोड़ी ने मध्यक्रम में धमाल मचाये रखा था और कुछ कुछ जगह युवराज ने अकेले टीम की नैया पार लगाई थी। 2007 का वो दुखद विश्व कप था जिसमें भारत को पहले ही दौर में बाहर होना पड़ा था लेकिन भारत ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फिर एक दौर आया जिसमे धोनी की मेजबानी में भारत ने एक नया इतिहास ही रच दिया। यूँ तो उस कहानी के कई लेखक थे, लेकिन युवराज ने जिस तरह उस पूरे विश्व कप में अपना वर्चस्व जमाया मानो कि दुनिया दंग ही रह गयी। टी-20 के इतिहास का सबसे तेज़ अर्धशतक जो आज भी एक रिकॉर्ड है। वो पल आज भी याद है जब स्टुअर्ट ब्रॉड को एक ही ओवर में युवी ने गगनचुम्बी 6 छक्के या यूँ कहूँ एक अंग्रेज को एक ही ओवर में 6 थप्पड़ मारे थे। पूरा भारतवर्ष दिवाली मना रहा था। ये एक अलग खिलाड़ी है। किताबो में लिखे शॉट नहीं खेलते। इनके ड्राइव, हुक, कट और स्वीप एक अलग ही दुनिया से है। बाज़ुओं में पंजाबी दम। ली, स्टुअर्ट दुनिया के बेहतरीन गेंदबाज कहे जाते थे, फिर युवी मिल गए एंड रेस्ट इज हिस्ट्री। उसके बाद जो ऑस्ट्रेलिया की धुलाई की, वो देखते ही बनी। ली को सबसे लम्बा छक्का जड़ा और ऑस्ट्रेलिया से अपना पुराना हिसाब बराबर किया। सिर्फ 30 बॉल में युवी ने 70 रन जड़ डाले और भारत की जीत के नायक बने। कोई भी कंगारू खिलाड़ी युवराज की मार से बचा नहीं था। उसके बाद एक अलग ही दौर आया 2011 का। क्या समय था वो युवराज सिंह के लिए। 2011 में हर खिलाड़ी ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिया। ज़हीर, सहवाग, सचिन, गौतम, धोनी सबने अपना योगदान दिया लेकिन पूरा विश्व कप इसी खिलाड़ी के इर्द-गिर्द ठहरा रहा। युवराज ने 362 रन बनाए और 15 विकेट चटकाए। आकड़ों में ये मामूली लगते होंगे लेकिन हर मैच में ये अहम् साबित हुए। ऑस्ट्रेलिया को फिर एक बार अपना शिकार बनाया युवी ने और रैना के साथ मिलकर जो साझेदारी की तो फिर कंगारूओं को मात दी| कैंसर से लड़ते ही इस महान खिलाड़ी ने वो कर दिखाया जिसका भारत 28 साल से सपना देख रहा था। युवराज ने जो भारतीय क्रिकेट को दिया उसकी जितनी तारीफ की जाए वो कम होगी। 

    मार्च 2012 में तीसरी और आखिरी कीमोथेरेपी के बाद युवराज अप्रैल में वापस भारत  आए और क्रिकेट खेलना शुरु किया और वर्ल्ड टी20 2012 में फिर से भारतीय टीम का हिस्सा बने। 

    युवराज को ऑस्ट्रेलिया से विशेष लगाव था और उनकी धुनाई में उन्हें बहुत मज़ा आता था। अक्टूबर 2013 में फिर कंगारुओ की धुलाई करते हुए युवी ने एक मात्र टी20 में 77 रन कूट डाले और एक बार फिर जब ऑस्ट्रेलिया से 2014 में मुलाकात हुई तो उसमें भी 60 रन रौंद डाले।

    मध्यक्रम के इस बल्लेबाज को गांगुली से आहूत सहयोग मिला और इसने एक अलग ही दुनिया बना ली। किसी ने भी नहीं सोचा होगा की आगे चल के भारत के लिए इतने इतिहास रचेगा। कभी न हार मानने वाला, गिरने पर उठ के वार करने वाले इस युवराज ने थोड़ा लिया, बहुत कुछ दिया। इनकी तुलना रिकॉर्ड में न करे। मुझे ज्ञात है कि बहुत से खिलाडियों का रिकॉर्ड युवराज से लाख गुना अच्छा है लेकिन कोई युवराज जैसा नहीं है। युवी सरीखा आल राउंडर भारत को शायद ही मिले। जिनको इनकी जगह लाया गया है वो आज भी मुँह से खून फेंक देते है बैटिंग करने में लेकिन बॉल का बल्ले से संपर्क नहीं करा पाते। जिस जोश से युवी ने बैटिंग, फील्डिंग की है शायद ही कोई कभी कर पाए। भूल गए कैसे गिलक्रिस्ट को ज़हीर की गेंदों पे लपका करते थे? दक्षिण अफ्रीका से आईसीसी ट्राफी तो याद होगी जहाँ युवी ने 3 शानदार कैच लेकर मैच का पासा पलट दिया था। कंगारूओं की सिडनी में जो धुलाई की वो आज भी याद है। राजकोट में इंग्लैंड को धुना। धोनी के साथ मिल के पाकिस्तान को पानी पिला दिया। शायद जितना युवराज ने इस टीम को दिया अगर उतना इस टीम ने युवराज को दिया होता तो आज इसके जैसा खिलाड़ी बहुत कुछ और भारत को दे जाता। युवराज भी उन खिलाडियों में से है जो अंदरूनी कूटनीति का शिकार बन गए। ख़ैर कोई बात नहीं, लोगों का रिकॉर्ड आप से अच्छा हो सकता है लेकिन आप आज भी चैंपियन हो और हमेशा रहोगे। चाहे वन-डे हो या टी-20,  आप हमेशा इंडिया के सुपर हीरो हो। आपकी जगह यहाँ कोई नहीं ले सकता।

    हैप्पी बर्थडे चैंपियन!
    #ThankYouYuvi