• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    गज़ल अच्छी कहाँ लिख पाता हूँ मैं..

    साये अफ़सोस के छाए या बदली हो मसर्रत की,
    न उन पर भरोसा है न इनमें ही पनाह पाता हूँ मैं।

    कभी कहते थे वह हँसकर कि दिलोजाँ सब तुम्हारा है,
    मज़ाक़ उन पर था या मुझ पर कहाँ समझ पाता हूँ मैं ?

    वही इक दोस्त हैं जिनकी ज़रूरत है मुझे सचमुच,
    कहाँ सबको ज़ख़म जले दिल के दिखा पाता हूँ मैं ?

    फ़र्क पड़ता था लोगों को तबीयत नासाज़ हो गर अपनी,
    सफ़र में आख़री भी चार कंधे ही कहाँ पाता हूँ मैं।

    सजाना पत्थरों में ही न फूलों में दफ़न करना,
    महक से आग न निकले तो सर्द हो जाता हूँ मैं।

    पटक कर सर तबाही दर पे दस्तक दे रही है आज,
    गुम अपनी बेख़याली में सुन ही कहाँ पाता हूँ मैं।

    न पानी है, न पौधे हैं, न बादल है, न पुरवाई,
    हमले अब भी क़ुदरत पर रुकवा कहाँ पाता हूँ मैं ?

    कहीं से और भी कुछ रास्ते खुलते हों खुल जाएँ,
    यही सोचकर मिलता हूँ तो देर तक बतियाता हूँ मैं।

    मैं आलिम तो नहीं पर कुछ शऊर मैंने भी सीखा है,
    पढ़े लिक्खों की महफ़िल में फिर भी बहुत घबराता हूँ मैं।

    न जाने कौन पूछ बैठे कहो किस ज़ात से हो तुम,
    तो नाम पीछे बाइज़्ज़त ज़ात पहले ही बतलाता हूँ मैं।

    तलाश जारी है जब मुकम्मल होनी हो होगी,
    मगर क्या चाहिए ख़ुद से भी जाने क्यूँ छिपा जाता हूँ मैं ?

    नहीं मालूम है मजनूँ को ज़माने के रिवाज और क़समें,
    मगर लैला को हर हर्फ़ के मक़ासिद रोज़ समझाता हूँ मैं।

    गई बातें न लौटेंगी गए क़िस्से बेमानी हैं,
    मैं तो जानता हूँ पर दिल को कहाँ समझा पाता हूँ मैं ?

    रदीफ़ औ’ क़ाफ़िये के साथ कुछ तुकबंदियाँ की हैं,
    कोशिश तो की है पर गज़ल अच्छी कहाँ लिख पाता हूँ मैं।