• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    एक थी साईकिल..

    सातवीं क्लास में पढ़ते थे हम.  आज भी याद है.  शनिवार की शाम थी.  पापा की छुट्टी का दिन, जब मेरी नयी साईकिल घर आई थी.  BSA SLR, 18 इंच!

    शाम को माँ के कहने पर थोड़ी देर के लिए किताब-कॉपी खोल कर बैठ गए, क्यूंकि इसी शर्त पर तो साईकिल खरीदी गयी थी.  लेकिन, किताब के पन्नो पर भी मुझे मेरी नव अर्जित संपत्ति ही दिख रही थी.  साथ ही, आश्चर्य लग रहा था कि कैसे माँ-पापा साईकिल छोड़ दीन-दुनिया की बातें कर रहे थे.  कैसे TV पर कुछ अलग नहीं हो रहा था, और कैसे हर रात की तरह आज भी खाना खा, दूध पीकर मुझे सो जाना था.  असल में, मेरे लिए तो सब बदला बदला सा था.  दुनिया रंगीन लग रही थी, मानो जीवनसाथी मिल गया हो.

    रात भर हम यही सोचते रहे कि कब सुबह हो और अपनी नयी दुल्हन को दिन के उजाले में देखें.  इंतज़ार करना कठिन होता जा रहा था.  इतना कि आँख लगी तो सपने में ही साईकिल चलाने लग गए.  नए मेहमान के लिए ऐसा शौक-ए-दीदार कि रात ढाई बजे ही नींद भी खुल गयी.  चुपके से माँ-पापा से बचते बचाते साईकिल के पास पहुंचे और अगले आधे घंटे प्राणप्रिये के दर्शन में ही बीत गए, एक सुहाने सुबह की योजना बनाते बनाते.

    तभी कमरे से आवाज़ आई, “अनुपम!” और माँ से डांट पड़ गयी.  मन मार, दिल पर पत्थर रख हम वापस सो गए.


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    ये तो मेरा अपना संस्मरण था.  लेकिन एक बात दावे से कह सकता हूँ कि इंसान को उसकी पहली नयी साईकिल जो आनंद देती है वो फिर जीवनकाल में दुबारा नहीं मिलता.  कैसा लगा था जब पहली बार आपको पता चला कि साईकिल चल रही है और आप उसपर बिलकुल अकेले बैठे हैं?  याद है?  उस चरम भाव की प्राप्ति फिर कभी नहीं हुई होगी.

    स्वतंत्रता, स्वछंदता और सशक्तिकरण का पहला डोज़ हमें साईकिल से ही मिलता था.  जैसे कि एक नन्ही चिड़िया ने उड़ना सीख लिया हो.  हमारे समाज में इस दो-चकिये का अपना स्थान रहा है.  चमचमाती एटलस से बाज़ार निकलना शान की बात होती थी और अगर आपके बच्चों के पास भी साईकिल है तो आप आर्थिक उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते हैं.  साईकिल मेकैनिक गाँव का सबसे जाना माना चेहरा होता था.

    दहेज़ में अगर फिलिप्स की रेडियो, टाईटन की घड़ी और ‘एक साईकिल’ मिल जाए तो क्या कहने.  मतलब शादी धांसू रही.  लड़का पढ़ा-लिखा  है, काबिल है.

    भावनाओं की बात करें या तर्क की – समाज निर्माण में साईकिल का महत्व चरखे से कोई कम नहीं है.  विडम्बना ये है कि निर्माण के ये दोनों औजार विलुप्त होने के कगार पर है.  आज के शहरों से साईकिल गायब होता जा रहा.  दिखता भी है तो उन कुछ मजदूर वर्ग के पास जिनकी इच्छा नहीं मजबूरी है साईकिल चलाना.

    आज साईकिल का वो दौर भी ख़त्म हो चुका है जब वो समाजवाद की पहचान हुआ करता था.  आज तो सिर्फ समाजवादी पार्टी कि पहचान है.  वो भी चुनाव चिन्ह है इसलिए, वरना चलाते तो वो भी सिर्फ रैलियों में ही हैं.

    साईकिल को एक स्वस्थ और पर्यावरणप्रिय विकल्प हर कोई मानता है.  कुछ संस्थान तो अपने प्रांगन को “नो मोटर” ज़ोन भी बना चुके हैं.  लेकिन ये सब प्रतीकात्मक मात्र हैं.  सच्चाई तो ये है कि मोटर का सहारा लीजिये, आगे निकल आइये. या फिर हाशिये पर धकेल दिए जायेंगे.  आज खरगोश कछुए से जीतता दिख रहा है!

    सामाजिक सशक्तिकरण में भी साईकिल एक अहम् किरदार अदा करती है.  हाल ही में बिहार और झारखण्ड की सरकारों ने लड़कियों को मुफ्त साईकिल बाँटें.  इसके दूरगामी परिणाम उन लड़कियों से बेहतर कोई नहीं बता सकता.  अगर इन कुछ एक सराहनीय क़दमों को छोड़ दिया जाए तो वो दिन दूर नहीं जब साईकिल सिर्फ संग्रहालयों की शोभा बढ़ाएंगे.

    मुझे तो आनंद का वो चरम भाव साईकिल चलाते वक़्त ही मिला.  इतना कि शनिवार की उस रात का एक एक पल याद है.  क्या अगली पीढ़ी इतनी खुशनसीब होगी?

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    Anupam

    Chief National Spokesperson & Delhi President - Swaraj India (Party)
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    • Harsh Raghubanshi

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