• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    एक राष्ट्र के रूप में आखिर हम जा कहाँ रहे हैं ?

    ‘जय हो’ जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
    जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।

    राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ (रश्मिरथी, प्रथम सर्ग)

     

    आज मन बहुत उद्दीग्न है और उद्द्वेलित भी। सोच रहा हूँ कि एक राष्ट्र के रूप में आखिर हम जा कहाँ रहे हैं ? क्या जाति-आधारित भेदभाव ने हमारी राष्ट्रीय चेतना को भी इतना विदीर्ण एवं खंड-खंड कर दिया है कि भारत के एक शहीद वीर-सपूत की परम-पावन शहादत को भी हम जातियता के तुच्छ तराजू पर तौल रहे हैं ? उसको उसीकी मिट्टी पर जिसकी सुगंध में वह पला-बढ़ा, रात दिन जिसकी तन्मयता से हिफाजत की, जिसके सीमा पर जागने से हम रात में चैन कि नींद सो सके, जो स्वयं चारों पहर मौत के साए में रहकर, हमें हरपल महफूज रखा, आज उसकी शहादत पर हम उसे दो गज जमीन देने के लिए मुकर रहे थे ? वही जमीन जिसकी कण-कण की रक्षा करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुआ ? वही जमीन जिसकी इंच-इंच पर सर्वप्रथम मौलिक हक उसीका है ? वही जमीन जो मिट्टी के इस लाल को पाकर स्वयं भी गर्व से प्रफुल्लित हो रही होगी ? और यह इनकार और अस्वीकृति इसलिए कि वह शहीद होते हुए भी किसी तथाकथित निचली जाती से आता है ?

    पिछले दिनों हुई ऐसी एक घटना ने मुझे अन्दर तक आहत किया है। पिछले शनिवार को जम्मू-कश्मीर के पम्पोर में हुए आतंकवादी हमले में हमारे सीआरपीएफ के आठ जवान शहीद हो गए। इन्हीं में से एक जवान थे हेड कांस्टेबल वीर सिंह। वह उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद अंतर्गत नागला केवल गाँव के निवासी थे। रविवार को उनका शव उनके गाँव लाये जाने से पहले वहां भारी उथल-पुथल का माहौल था। गाँव के कुछ तथाकथित ऊँच जाति के लोगों ने शहीद के अंतिम संस्कार के लिए परिवार वालों को जमीन देने से मना कर दिया, और वह भी सर्वसामान्य की जमीन अर्थात पब्लिक प्रॉपर्टी। बात जिला प्रशासन तक पहुंची। ग्रामीणों एवं जिला प्रशासन के बीच घंटों बातचीत के बाद ऊँच जाति के लोग 10 बाई 10 की जमीन देने को तैयार हुए। वीर सिंह के परिवार वाले चाहते थे कि उनकी मूर्ति भी लगे लेकिन तथाकथित उच्च जाति के लोगों ने ऐसा नही होने दिया। कंथारी ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान विजय सिंह से अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए यह कहा कि, “ वीर सिंह के परिवार वाले पब्लिक प्रॉपर्टी पर उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। गाँव वाले इसके लिए राजी नही थे मगर जिला प्रशासन से लम्बी बातचीत के बाद गाँव वाले इसके लिए मान गए।” वीर सिंह की उम्र 52 वर्ष थी। वह अपने घर में कमाने वाले एकलौते थे। वीर सिंह के पिता फिरोजाबाद में रिक्शा चलाने का काम करते हैं और छोटा भाई मजदूरी का काम करता है। उनका परिवार अभी भी गरीबी में ही जीने को विवश है। 

    जब पम्पोर में यह आतंकी हमला हुआ तो वीर सिंह बस में सवार थे। सात गोलियां लगने के बावजूद भी उन्होंने अपने एके-47 हथियार से 39 राउंड फायरिंग की और एक आतंकी को मार गिराया। यदि वह ऐसा न करते तो निश्चित रूप से शहीदों की संख्या में इजाफा होने की संभावना थी। जिन्होंने इस वतन के मिट्टी की रक्षा के लिए इतना कुछ किया, अपने प्राण की आहुति तक दे डाली, उनके साथ मरणोपरांत ऐसा व्यवहार ? इसे घृणित कहना भी घृणा का घोर अपमान होगा। ऐसे ओछी सोच वाले लोग यदि स्वयं को ऊँच जाति कहते हैं, तो उन्हें उच्चता की परिभाषा पढाये जाने की जरुरत है। ऐसे लोगों के पास आत्मग्लानि से सराबोर होने का यही उचित मौका है। ऐसे लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि यह वतन, इसकी मिट्टी, इसकी आबरू, राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं भारत की आत्मा वीर सिंह जैसे बहादुर वीर सपूतों के कारन जीवित है, न कि उन्हें मरणोपरांत जातीयता के नाम पर दो गज जमीन देने से इनकार करने वालों के घिनौने सोच के कारन। वीर सिंह जैसे वीर के कारन ही भारत के प्राण में उल्लास है, इसकी आत्मा में झंकार है, राष्ट्रीय संस्कृति के क्षितिज में निरंतर विस्तार है।

    हे तथाकथित ऊँच जाति के मुर्ख अभागों !! आज उस जमीन की मिट्टी भी अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही होगी, जिसे प्रथमतः तूने उसे सौपने से इनकार किया, जिसके लिए वह आखिरी सांस तक लड़ता रहा। तुम्हे यह कौन बताये कि बड़ा किसी वस्तु का ‘मालिक’ नही बल्कि उसका ‘रक्षक’ होता है। मैं कहता हूँ, तुम जाकर देखना, कुछ दिन बाद, नाक फैलाकर सूंघना, जहाँ वीर सिंह दफ़न हुए हैं, वहां की मिट्टी में सुगंध होगा, और कब्र के ऊपर बहती हवा में उल्लास। उस मिट्टी की उर्वरता न जाने ऐसे कितने वीर पैदा करेगी। परन्तु मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि उसी मिट्टी में तुम दफ़न किये जाओगे, तो वहां की मिट्टी में सरांध होगा और हवा में असीम बेरुखी, क्योंकि तुम उस मिट्टी में समाहित होने के लायक नही हो। वह मिट्टी तुम्हे अपने आगोश में लेने को तैयार नही होगी, जिसके अनमोल रतन को तूने उसमे मिलने देने से सर्वप्रथमतः मना किया। तुम्हारे जैसे लोगों के ऐसे कुत्सित विचार ने ही राष्ट्रीय चेतना को कभी इसकी सम्पूर्णता में जागृत नही होने दिया है।

    आज मेरे मानस-पटल पर राष्ट्रकवि दिनकर की उनुपम कृतियों में से एक ‘रश्मिरथी’ की कुछ पंक्तियाँ, अनायास ही बिजली सी कौंध रही हैं। कृपाचार्य का महारथी कर्ण से जाति पूछना और कर्ण का उनको यह रोषपूर्ण उत्तर, एक भाव-विह्वल दृश्य उत्तपन करता है कि :

    ‘जाति ! हाय री जाति !’ कर्ण का ह्रदय क्षोभ से डोला,
    कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला
    जाति-जाति रटते जिनकी पूंजी केवल पाखंड,
    मैं क्या जानू जाति ? जाति है ये मेरे भुजदंड !
    ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले के काले,
    शरमाते हैं नही जगत में जाति पूछने वाले।

    कर्ण आगे कहता है :

    ‘पूछो मेरी जाती, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से,
    रवि-सामान दीपित ललाट से और कवच-कुंडल से,
    पढो उसे जो झलक रहा है, मुझमे तेज प्रकाश,
    मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।

    कर्ण और कृपाचार्य के बीच इस संवाद में अचानक सुयोधन का प्रवेश होता है। वह कर्ण का पक्ष लेते हुए कहता है कि :

    ‘मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का और वीरों का,
    धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता है रणधीरों का ?
    पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शुर,
    ‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर-क्रूर।

    भीम द्वारा कृपाचार्य का बचाव करने एवं उनके पक्ष में बोलने पर दुर्योधन उन्हें भी फटकारते हुए कहता है कि :

    ‘बड़े वंश से क्या होता है, खोटे हों यदि काम’
    नर का गुण उज्जवल चरित्र है, नही वंश-धन-धान।

    आज जब एक बार फिर जातीयता ने वीरता पर हावी होने की कोशिश की है, तो दिनकर की ये सारी पंक्तियाँ प्रासंगिक मालुम पड़ती है। ह्रदय व्यथित हो उठता है। एक अजीब सी बेचैनी हो उठती है। मेरे स्वयं के राष्ट्र के सुनहले स्वपन में अचानक अँधेरा छा जाता है। यह बात मुझे सिर्फ ऊँची-नीची जातियों के बीच भेदभाव तक सिमटा हुआ ही नज़र नही आता बल्की राष्ट्रीय अंतःकरण को नष्ट करने की एक गहरी साजिश नज़र आती है। मुझे ऐसे सोच वाले लोग देश के सबसे बड़े गद्दार लगते हैं। कोई भी राष्ट्र मात्र भगौलिक सीमाओं का एक बंधन नही होता, सिर्फ सीमाएं इसे परिभाषित नही कर सकती, राष्ट्र को जीवित रहने के लिए राष्ट्रीयता का जीवित रहना जरुरी है और राष्ट्रीयता का जीवित रहने के लिए राष्ट्रीय चेतना का, परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसी घटनाएं राष्ट्रीय चेतना पर एक कुठाराघात का काम करती हैं।

    कुछ दिन पहले जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष ने हमारे सेना के जवानो को लेकर कुछ अभद्र टिपन्नियां की थी, जिससे मैं भी असहमत था। पुरे देश ने इसके लिए उसे राष्ट्रद्रोही कहा। मैंने भी उसकी भरपूर आलोचना की। उसके खिलाफ बहुत लेख भी लिखे। आज भी उसी रूप में उसकी आलोचना करता हूँ। मगर आज मैं यह पूछना चाहता हूँ कि क्या एक वीर शहीद को अंतिम संस्कार के लिए जातीय-आधारित भेदभाव के कारन प्रथमतः जमीन देने से मुकरने का यह कृत्य राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में नही आता ? एक वीर शहीद के परिवार को उसके गाँव वाले अंतिम संस्कार के लिए जमींन देने से मना करते हैं, मगर देश चुप रहता है। आखिर क्यों ? देश ऐसे कुत्सित विचारों की उसी रूप में भर्त्सना क्यों नही करता जैसा कन्हैया के खिलाफ किया गया ? उसी रूप और मात्रा में इस बात पर उतनी हायतौबा क्यों नही हुई जितनी कन्हैया के खिलाफ हुई ? कन्हैया ने तो सेना के खिलाफ मात्र वक्तव्य दिया मगर इन तथाकथित उच्च जाति के लोगों ने तो उसे कृत्य रूप में परिवर्तित करने की कोशिश की जिसमे वह भयवश असफल हुए। तो बड़ा राष्ट्रद्रोह कौन हुआ ? इसीलिए कहता हूँ कि यह बात सिर्फ उपरी और निचली जातियों के बीच भेदभाव की नही है. यह बात हम सब की है। यह बात समाज के एकत्रित अंतःकरण की है। हमें यह तय कर लेना चाहिए की आखिर हमारे गिरने की सीमा क्या है ? हम किस हद तक निचे गिरना चाहते हैं ? पूरा समाज ऐसी घटनाओं के लिए समान रूप से जिम्मेदार है। यदि ऐसी घटनाओं पर हम रहस्यमयी चुप्पी साधे रहेंगे, तो हम भी समान रूप से देशद्रोही हैं, इन्हीलोगों की तरह।

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    Rohit Kumar

    ROHIT KUMAR is a Law Graduate. He has extensively worked on 'RTI Act' and other such 'Rights legislation'. He has filed more than 200 RTI applications in different departments of the governments till date. He uses 'RTI' as a tool to fight corruption. The leading Indian English daily 'The New Indian Express' has covered a story on his constant and courageous fights against corruption titled "Taking on the System with Information as His Weapon". He regularly blogs for several other 'Media Platforms' on different sociopolitical and legal issues. He has formerly interned in MKSS; a grassroots organisation founded by Aruna Roy and Nikhil Dey, NCPRI and with celebrated Public interest lawyer Prashant Bhushan in the Supreme Court of India. He is also an editorial board member of the 'Express Today'.
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