• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    सूखे से बेहाल लोग और बेपरवाह सरकार

    सूखा सिर्फ़ खेतों में नहीं पसरा है, हमारी संवेदनाएँ भी सच में सूख गयी हैं। सबको पता है कि देश गंभीर सूखा से जूझ रहा है। लेकिन हम आँखें मूंदे बैठे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी कि “सरकारों का शुतुरमुर्ग-रवैया बड़े अफ़सोस की बात है”, अनायास नहीं है। देश एक ऐसी सूखा आपदा से गुजर रहा है जिसमें जवाबदेहियों का भी सूखा है।

    आँकडों की बात करें तो देश के 13 राज्यों में,  कुल जनसंख्या के पाँचवे हिस्सा का दोगुना, यानि 54 करोड़ किसान और ग्रामीण सूखा की गिरफ्त में हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जिनके लिए सूखा लगातार दूसरे या तीसरे साल आया है। लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। खाद्यान्न की कमी है। किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। भूखे-प्यासे घरेलु पशु खुला छोड़ दिए गए हैं, मर रहे हैं। खेत बंजर पड़े हैं। जीवन और जीविका में जैसे एक ठहराव आ गया है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे की स्थिति भयावह है। नदी, तालाब और कुओं का पानी सूख चुका है। चापाकल (हैन्डपंप) तक सूख गए हैं।

    पिछले साल 2015 के अक्टूबर में जब सूखा की आहट मिलने लगी थी तो स्थिति का जायजा लेने के लिए स्वराज अभियान के ‘जय किसान आन्दोलन’ के तहत योगेन्द्र यादव के नेतृत्व में एक संवेदना यात्रा की गई थी। 2 अक्टूबर गाँधी जयंती के दिन उत्तर कर्णाटक के यादगिर से चल कर तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान होते हुए हरयाणा में संवेदना यात्रा का समापन हुआ था। सूखा प्रभावित 7 राज्यों के 37 ज़िलों से होते हुए इस यात्रा ने 4700 किलोमीटर की दूरी तय की। इस संवेदना यात्रा के दौरान सूखे की भयावह स्थिति और राज्य एवं केंद्र सरकारों की निष्क्रियता खुल कर सामने आयी। यह पहली ऐसी पहल थी जिसने ग्रामीण भारत के संकट को राष्ट्रीय पटल पर रखा और इस ओर लोगों का ध्यान खींचा।

    हमारे संविधान का अनुच्छेद २१ मौलिक अधिकार के रूप में ‘जीने के अधिकार’ को सुनिश्चित करता है। सूखा का सवाल ‘जीने का अधिकार’ से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण भारत का सूखा संकट गहरा था लेकिन राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था जैसे सोई हुई थी। सरकारें अपने संवैधानिक दायित्वों से आँखें मूंदे बैठी थी। तब स्वराज अभियान ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। 14 दिसम्बर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में सूखा राहत याचिका दायर की गई। याचिका के माध्यम से यह प्रार्थना की गई कि अदालत केंद्र सरकार एवं 12 राज्य सरकारों को सूखा प्रभावित लोगों के राहत के लिए काम करने का निर्देश दे। 16 दिसम्बर को याचिका दाखिल हुई। स्वराज अभियान की ओर से प्रशांत भूषण ने जिरह की। 4 महीने तक, लगभग 40 घंटे चली 15 सुनवाइयों में सूखा संबंधी हर पहलू पर अदालत ने जाँच की। सरकारों की जवाबदेही तय हुई और कई अवसरों पर फटकार लगी। 11 एवं 13 मई को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला आया।

    सूखा राहत याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि आपदा अधिनियम के तहत सूखा भी एक ‘आपदा’ है। सूखे को संभालने की जिम्मेदारी भले ही राज्य सरकार की है, अंतिम जिम्मेदारी निश्चित रूप से केंद्र सरकार की है। अदालत ने बार-बार इस बात की पुष्टि की है कि सरकार वित्तीय बाधा का बहाना लेकर लोगों के मौलिक अधिकार सुनिश्चित करने से मुकर नहीं सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने सूखा के आकलन और घोषणा के लिए भी एक नई विधि की आधारशिला रखी। और, जैसा कि स्वराज अभियान के ‘जय किसान आन्दोलन’ के संयोजक योगेन्द्र यादव कहते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला दरअसल ‘औपनिवेशिक अकाल कोड’ से ‘आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था’ की ओर प्रतिमान विस्थापन है। यह औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकल कर नागरिक अधिकारों के लिए बड़ा बदलाव है।”

    कोर्ट ने केंद्र सरकार को आपदा प्रबंधन कानून 2005 के अनुसार अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने का निर्देश दिया। पिछले एक दशक से इन संवैधानिक प्रावधानों को पूरा नहीं करने पर अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि आपदा प्रबंधन कानून के अनुसार 3 महीने के अन्दर एक राष्ट्रीय आपदा शमन कोष का गठन करे, 6 महीने के अन्दर राष्ट्रीय आपदा उत्तरदायी बल और जितना जल्दी हो सके एक राष्ट्रीय आपदा योजना बने।

    इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को “धन की कमी के परदे” के पीछे नहीं छिपने का आदेश देते हुए कहा कि सरकार देश के 12 राज्यों में सूखा प्रभावित लोगों के लिए व्यापक राहत प्रदान करे। सूखा प्रभावित क्षेत्र में रह रहे सारे लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत मिलने वाले लाभ के हक़दार हैं। यानि कि सूखा प्रभावित क्षेत्र के प्रत्येक घर को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान मिलना चाहिए। लाभ के लिए ‘योग्य’ या ‘अयोग्य’ घरों का वर्तमान विभेद लागू नहीं होगा। राशन कार्ड नहीं होने की स्थिति में भी किसी को खाद्यान देने से मना नहीं किया जा सकता, वैकल्पिक पहचान पत्र भी स्वीकार किया जाएगा। अदालत ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत निर्धारित निरीक्षण तंत्र को और मज़बूत करते हुए खाद्य आयुक्तों और जिला शिकायत समितियों की नियुक्ति का आदेश दिया है।

    अदालत ने सरकारों को निर्देश दिया है कि सूखा प्रभावित राज्यों के स्कूलों में गर्मी की छुट्टी के दौरान भी मिड डे मील दिया जाए और मिड डे मील में पोषण पूरक के तौर पर एक अंडा या एक गिलास दूध या कोई दूसरा पौष्टिक आहार सप्ताह में 5 दिन या कम से कम 3 दिन दिया जाए। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि मनरेगा के तहत राज्य सरकारों को पर्याप्त और समय पर फंड जारी करे ताकि काम करने वाले लोगों को समय पर भुगतान मिल सके। सुप्रीम कोर्ट 1 अगस्त को सरकार द्वारा की गयी कार्रवाईयों की समीक्षा भी करेगा।

    विडंबना देखिए कि जो काम देश के चुने हुए नुमाईंदों को करना चाहिए था उसके लिए न्यायपालिका को बीच में आना पड़ा। देश की संसद और विधानसभाएँ अब भी जग जाएँ और अदालत के आदेश को इसकी मूल भावना के साथ लागू करें तो लोगों को संकट से कुछ राहत मिले।

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा सूखा पर ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद स्वराज अभियान का जय किसान आंदोलन इसके क्रियान्वयन पर नज़र रखने के लिए दो अहम् पहल कर रहा है। इस दिशा में एक पहल है “सूखा के प्रति कर्तव्य” (ड्राउट ड्यूटी)। देश भर के युवाओं और छात्रों से आह्वान है कि सूखा आपदा की इस लड़ाई में ‘सूखा सेनानी’ बनें और किसी एक सूखा प्रभावित गाँव में ड्राउट ड्यूटी  इंटर्नशिप के तहत एक सप्ताह का समय दें।  दूसरी पहल के रूप में स्वराज अभियान की योजना नेशनल एलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट्स, जल बिरादरी और एकता परिषद के साथ मिलकर 21 मई से 31 मई के बीच एक जल-हल पदयात्रा की है जो मराठवाड़ा के लातूर से बुंदेलखंड के महोबा तक जाएगी। जल-हल पदयात्रा का उद्देश्य अदालत के आदेशों को देश के अंतिम व्यक्ति तक ले जाना है ताकि वो अपने अधिकारों को समझ सकें और एक बेहतर जीवन जी सकें।

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    Kunal Gauraw

    Kunal Gauraw is a Senior Research Engineer by profession, associated with Swaraj Abhiyan and Jai Kisan Andolan.
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