• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • deepawali

    दीपावली का ‘दीप-दर्शन’

    2010 के बाद जब से अध्ययन के सिलसिले में बाहर रहना हुआ, तब से अनेक पर्व आये और गए, मसलन दीपावली, छठ, होली, दशहरा मकर संक्राति इत्यादि. अध्ययन के दरम्यान भी कई बार इन पर्वों को परिवार एवं गाँव के मित्रों के साथ मनाने का मौका मिला, मगर कई बार ऐसा भी हुआ कि इन पर्वों में किसी कारणवश घर नही जा पाया. जहाँ था वहीँ के मित्रों संग खुशियां मनायीं, मौज-मस्ती हुई, और जमकर हुई, ऐसा कि घर जाने का मलाल नही रहता था. ये मेरे वकालत की पढ़ाई के समय कॉलेज के दिन थे.

    परन्तु, उपरोक्त त्योहारों में से दो त्योहारों पर घर में न रहने का गहरा मलाल हमेशा मन में रहा है. ये दो त्योहारें हैं, क्रमशः महापर्व छठ और प्रकाशपर्व दीपावली. महापर्व छठ के बारे में अगले कुछ दिनों में विस्तार से लिखूंगा, अभी दीपावली की यादें, अनुभव एवं अपनी समझ साझा करता हूँ.

    बचपन में जब उल्लास के साथ आप कोई पर्व मनाते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, जश्न मनाते हैं, उस समय शायद ही इसकी ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक महत्ता का बोध होता है आपमें. बचपन में आप अपने वर्तमान में अपनी प्रसन्नता ढूंढते हैं, अपनी जिंदगी ढूंढते हैं, स्नेह के संगीत गुनगुनाते हैं, अपने सांस्कृतिक इतिहास में नही. और, होना भी ऐसा ही चाहिए. बचपन के कोमल कन्धों पर इतिहास और संस्कृति की समझ का बोझ नही लादा जाना चाहिए. ऐसी जिम्मेदारियां बचपन की यात्रा समाप्त हो जाने तक दूर रखी जा सकती हैं या यह कहिये कि तबतक सुरक्षित रखी जा सकती हैं।

    बचपन में जो आपके सामने होता है, वही आपके लिए सर्वस्व होता है. उसी की ख़ुशी में आप सराबोर होकर नहाते हैं, तैरते हैं और आकंठ डूबते हैं. मेरे लिए भी छोटी-छोटी चीजों में अपनी खुशियाँ ढूँढना ही दीपावली की प्रासंगिकता का चरमोत्कर्ष रहा है.

    घर में छोटी बहनों के साथ मिलकर घरौंदा बनाना, उसके लिए बाहर से ईट खोजकर लाना, अपने खेत से मिट्टी लाना, उसे सजाना, घरौंदा के छोटे से कमरों में कई-कई हांथी-घोड़ा एक साथ रख देना, मिट्टी के चुक्के से पानी पीना, बहनों को चिढाने एवं रुलाने के लिए घरौंदा से हांथी-घोड़ा लेकर भाग जाना ही बचपन में दीपावली का पर्याय रहा है मेरे लिए.

    जमकर पटाखे छोड़ने के सिवा, गाँव के मंदिर में दीप जलाना, घर के कोने-कोने में मोबत्तियां जलाना विशेषकर छत पर और यह देखते रहना कि कौन मोमबत्तियां बुझने के कागार पर है ताकि वहां पर नयी मोमबत्ती जलायी जा सके, दीपावली का समानार्थ रहा है मेरे लिए. हांथी और घोड़े के आकार में बने हुए मिठाई जिसे हमलोग ‘हंथिया-घोड़वा’ मिठाई कहते थे, उसे खाने के लिए उत्साहित रहना भी दीपावली का एक मतलब रहा है मेरे लिए. अभी चंद दिनों पहले जब गाँव गया था तो बिहटा बाज़ार में ये मिठाइयां देखकर स्वयं को रोक नही सका खरीद कर खाने से. मगर सच्चाई यह है कि बचपन वाली फीलिंग नही आयी.

    सारे लोगों के घरों में एक समान दीपों का, एक समान मोमबत्तियों का जलना और साथ ही साथ पुरे गाँव का एक साथ प्रकाशमय हो जाना, प्रत्येक मित्रों एवं ग्रामीणों के चेहरे पर अप्रतिम ख़ुशी, इस रूप में एकता और समानता का सर्वोत्तम प्रतिक रहा है मेरे लिए दीपावली. दीपावली की रात का रोशन होना सिर्फ रात का रोशन होना कभी नही रहा है मेरे लिए, हर बात का रोशन होना रहा है यह मेरे लिए।

    गाँव के मित्रों के साथ मिलकर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करना, उसके लिए दोस्तों के साथ मिलकर जगह की साफ़-सफाई करना भी दीपावली में निहित सामाजिक सौहाद्रता का एक आयाम रहा है मेरे समझ से।

    दीपावली का ‘दीप-दर्शन’ क्या है? दीपावली की दार्शनिकता क्या है? इसकी सांस्कृतिकता क्या है? ‘दीप-दर्शन’ है स्वयं को जलाकर भी आसपास को आलोकित करना। दीपावली की दार्शनिकता है, स्वयं जलकर भी, समाज को प्रज्जवलित रखना। इसकी सांस्कृतिकता है कि प्रकाश पर सबका एकसमान हक़ है, चाहे वह सूर्य का प्रकाश हो, या ज्ञान का प्रकाश हो। यही हमारी महान हिन्दू संस्कृति है।

    सनद रहे कि राष्ट्रकवि दिनकर ने भी अपनी कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ में कहा है कि,

    जहाँ कहीं है ज्योति जगत में, जहाँ कहीं उजियाला !
    वहां खड़ा है कोई अंतिम मोल चुकानेवाला !!

    ‘एक्सप्रेस टुडे’ की तरफ से आप सभी देशवासियों को दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.