• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

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    सिनेमा का सफ़र और भावनाओं का बाज़ार

    गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं.  शाम का समय.  कॉलोनी के सारे बच्चे खेल-कूद हो-हल्ला कर रहे थे.  छोटे, बड़े, हर उम्र के.  लड़कियाँ झुण्ड बनाकर गपशप हाँक रहीं थी.  कुछ आँटी जी अपने दरवाजों से ही बच्चों पर निगाह रखे हुए शाम के चहल पहल का आनंद ले रही थीं.  कहीं शोरगुल, ठहाके, कहीं बच्चों के रोने की आवाज़, तो कहीं बच्चों के माँ की पुकार या चिकार.
     
    लेकिन तभी खेलते खेलते माहौल कुछ बदल सा गया.  मुझे आभास हुआ की सारी चहलकदमी ख़त्म हो गयी.  सबके सब एकदम से गायब हो गए, अपने घरों में.  मई का महीना और शाम के पाँच बजे एकाएक इलाके में सन्नाटा पसर गया.  मेरी बालक बुद्धि पूरी कोशिश करके भी मामला समझ नहीं पा रही थी.  माजरा तब जाकर समझ आया जब मेरे एक दोस्त ने बड़े आश्चर्य से पूछ डाला, “पिक्चर नहीं देखना है क्या?” और वो खुद भागता हुआ अपने घर घुस गया.
     
    मुझे पता नहीं था कि आज सन्डे है और दूरदर्शन पर साप्ताहिक सिनेमा आने वाला था.  वो भी फ़ारूख शेख़ और रेखा की “बीवी हो तो ऐसी.”  मूवीज़ में बहुत कम रुची थी मेरी.  इसलिए अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठा और  सामाजिक तौर पर बहिष्कृत सा फील करने लगा.
     
    आधे घंटे बाद ही लोगों का हुजूम दुबारा अपने अपने घरों से एक झटके में निकला.  इस बार मेरी बालक बुद्धि थोड़ी मैच्यूर हो गयी थी.  मैं समझ गया कि लाइट चली गयी है.
     
    ऐसा होता था सिनेमा का क्रेज़ तब.  एक फिल्म देखने के लिए सात दिनों का इंतज़ार किसी भी मूवी को मदर इंडिया और शोले के टक्कर का बना देता था.  टीवी का मतलब ही दूरदर्शन होता था.  आज तो दर्ज़नो ऐसे चैनेल्स हैं जो दिन रात सिनेमा ही दिखाते हैं.  चहू ओर टीआरपी का खेला चल रहा है.



    अरमानों के कुचले जाने की ऐसी ही एक और घटना है.  अमन सात साल का था जब उसे छुट्टियाँ मनाने अपने गाँव जाना था.  हाजीपुर.  लेकिन उसका मन तो रविवार को आने वाली मूवी पर टिका था. गाँव में बिजली थी नहीं.  सो मम्मी-पापा से बगावत कर वह चन्द्रपुरा में ही रुक गया.  घरवाले लड़के को अकेला छोड़ हाजीपुर चले गए.
     
    लेकिन बेचारे की किस्मत ही फूटी निकली.  उसी सप्ताह पूर्व राष्ट्रपति ग्यानी ज़ेयल सिंह का निधन हो गया और सात दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा हो गयी.  एक सप्ताह तक टीवी पर शास्त्रीय संगीत बजता रहा.  बेचारे अमन का दुर्भाग्य देखिये.  शास्त्रीय संगीत सुनने से कहीं ज़्यादा उसकी गाँव जाने की इच्छा थी.  उस बच्चे के अरमान एक राष्ट्रीय दुर्घटना की आँधी तले तहस नहस हो गए.  अमन की भी बालक बुद्धी थोड़ी परिपक्व हो गयी.  उसे दो बातें समझ आ गयी. एक, कि राष्ट्रीय शोक क्या होता है और दूसरी सीख ये कि सन्डे की मूवी से ज्यादा महत्वपूर्ण चीज़ें भी हैं दुनिया में.
     
    ख़ैर, उस समय तो वो बच्चा सिनेमा नहीं देख पाया लेकिन आज जब बाज़ार में कम्पीटीशन बढ़ा, टीआरपी की होड़ मची तो दूरदर्शन ने नेताओं के मरने पर शोक मनाना भी छोड़ दिया.  वो सप्ताह भर का शोक मनाना आज घाटे का सौदा है.  आज तो उनके मृत्यु को भी भुनाने की ही कोशिश होती है.  संवेदनाओं का इस हद तक व्यवसायीकरण हो चुका है.
     
    बाज़ार भारी है भावनाओं पर भी!