• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • cheating

    पेपर पर पैरवी

    आज एकाएक बिहार में परीक्षाओं में नक़ल की बात बड़ी खबर बन गयी है. एक तस्वीर खूब चल रही है जिसमें जान हथेली पर रख के लोग खिड़कियों पर खड़े होकर इम्तिहान में चीटिंग करवा रहे हैं. फोटो देख कर मुझे भी बड़ा आनंद आया. कुछ दोस्त पूछ रहे हैं कि भाई बिहार में सच में ऐसा होता है क्या?

     

    राज्य के शिक्षा मंत्री ने तो कहा कि बिहार में नक़ल-मुक्त परीक्षा संभव नहीं है. मंत्री जी की इमानदारी को सलाम किया जाए या उनकी मजबूरी का मज़ाक बनाया जाए, ये आप ही बताइए? वैसे, मंत्री जी की बातों का बहाना लेकर मैं बिहार के परीक्षाओं का एक और पहलू आपसे साझा करता हूँ..

     

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    मैं तब छोटा सा था. शायद 8 – 10 साल का. गाँव से खबर आई कि बड़े भैया के मेट्रिक का इम्तिहान हो चुका है. ये भी पता चल गया है कि कौन सा पेपर जांच के लिए कहाँ भेजा जाएगा. गणित का भागलपुर, अंग्रेजी का दरभंगा, विज्ञान का कटिहार… बड़ी गंभीर मुद्रा में लोग बातें कर रहे थे कि कहाँ किसको बोला जाए पैरवी लगवाने के लिए. काम पड़ने पर रिश्तेदार तो हर शहर में मिल जाते हैं, नज़दीक नहीं तो दूर के.

     

    ये रस्म-ओ-रिवाज़ और प्रथा हर साल दोहराई जाती थी. बड़ा सा परिवार था हमारा और हर साल किसी ना किसी के मेट्रिक का इम्तिहान आ ही जाता था. सच बोलिए तो हमारे लिए बिलकुल सामान्य बात थी कि पेपर पर पैरवी लगवाई जाए. और परिणाम आने के बाद जिस भी पेपर में बच्चा फेल हो जाए उस शहर में रह रहे रिश्तेदार को ज़िम्मेदार माना जाता था, बच्चे को नहीं. इतना ही नहीं, बच्चा दो-तीन कोशिशों के बाद भी अगर मेट्रिक पास नहीं कर पाए तो दयालु समाज उसे गया कॉलेज से इम्तिहान दिलवाता था. आज का मुझे नहीं पता, लेकिन उन दिनों गया कॉलेज में पास होने की पूरी गारंटी मिलती थी और अगर आपको कलम पकड़ना आता हो तो आप फर्स्ट डिविज़न भी ला सकते थे. जो भी हो बिहार कि शिक्षा प्रणाली में बच्चे पर बेवजह दबाव कभी नहीं आने दिया जाता था. बिहार मॉडेल से शिक्षाविदों को सीखना चाहिए कि कैसे बच्चों पर इम्तिहान का कम से कम दबाव पड़े.. है कि नहीं?

    • Abhinav

      Pairvi wala angle to 100% sahi hai

    • Mohit Sinha

      Ye badhiya hai…..परिणाम आने के बाद जिस भी पेपर में बच्चा फेल हो जाए उस शहर में रह रहे रिश्तेदार को ज़िम्मेदार माना जाता था, बच्चे को नहीं.