• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • Photo Courtesy - PTI
    Photo Courtesy - PTI

    सरकार को याद रहे कि जिस गरीब का घर बह गया है आप उसके नौकर है ..

    एक आठ से दस साल की बच्ची नदी के किनारे से अपनी खाने की प्लेट में मिटटी भर रही थी कि किसी ने पूछा “ऐ छोरि का करबे ई मिटटी का?” उसने मिटटी से सना अपना हाथ माथे पर लगाते हुए कहा “घर बनैबे अपना” वो बच्ची गुडिया गुड्डों के खेल वाला घर नहीं बनाना चाह रही थी बल्कि वो घर बनाना चाह रही थी जिसे बनाने में मज़बूत से मज़बूत काँधे भी झुक जाते हैं। उस बच्ची का छोटा सा महल जो नदी के पास के गाँव में था वो बाढ़ अपने साथ ले गयी थी। अब न वहां उसका घर था, न उसके मिटटी के खिलौने, न उसका वो प्यारा सा दोस्त उसका छोटा सा मेमना और न ही उसके घर में पले मवेशी। सब कुछ ख़तम हो चुका था। ये सिर्फ एक ही बच्ची नहीं थी। ऐसे जाने कितने अनगिनत बच्चों की सूनी आँखें अपने घरों को ढूंढ रही थी। अनगिनत भूखे पेट सरकारी खाना आने का इंतज़ार कर रहे थे जो लोग अच्छे बड़े आलिशान घरों में रहते हैं वो शायद ये कभी सोचते भी नहीं कि घर न होना क्या होता है? कुछ रात भूखे सोना क्या होता है? अपने बच्चे को अपनी आँखों से सामने बाढ़ में बहते हुए देखना और उसे न बचा पाने का दर्द क्या होता है?

    हमे ये भूलना नहीं चाहिए की हम एक गरीब देश हैं, विकास की और अग्रसर होना चाहते हैं। विकास कैसे होगा? हम विकसित देश कैसे बनेगे ? मैंने आजतक किसी नेता को कोई सटीक टिपण्णी देते हुए नहीं सुना। जो सुना वो खोखला और बेजान था। जब तक देश में गरीबी रहेगी, जब तक ऐसी बच्चियों के घर बाढ़ में बहते रहेंगे तब तक हमे विकसित देश बनने का ख्वाब भी नहीं देखना चाहिए। देश के कई प्रदेशों में बाढ़ का कहर जारी है। अगर सही आंकड़े पर जाया जाए तो कई हज़ार लोग अपनी जान गवां चुके हैं। लेकिन मरने वाले हैं गरीब, जी हाँ, गरीब। इसीलिए कुछ ज्यादा नहीं होगा। वो बेचारे बस अपनी किस्मत पर रोयेंगे शायद भगवन को भी कोसेंगे। इससे जादा कुछ नहीं। फिर अगले साल बाढ़ का इंतज़ार करेंगे। सरकार से सवाल ज़रूर करेंगे लेकिन उनकी आवाज़ आएगी नहीं यहाँ तक क्यूंकि सरकार के कान ख़राब है, उसकी नीतिया ख़राब है। बाढ़ से त्रासदी में सरकार की कोई गलती नहीं है। प्राकृतिक आपदा बता के थोड़ी न आती है लेकिन आती हर साल है। आसाम, बिहार, उत्तर प्रदेश इस समय तीनो राज्यों में बाढ़ से बुरा हाल है। हर साल सरकार बाढ़ आने के बाद मदद भी करती है लेकिन पहले से तय्यारी नहीं करती। क्या इस समय देश को बुलेट ट्रेन की ज्यादा ज़रुरत है या देश भर की नदियों को आपस में जोड़ने की ज्यादा। भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल जी देश की नदियों को आपस में क्यूँ जोड़ना चाह्ते थे? शायद इसलिए क्यूंकि उन्होंने तब ही बाढ़ से होने वाली तबाही को देख लिया था। किसानो को सूखे के कारण आत्महत्या करते हुए देख लिया था। पानी अधिक हो जाता है तो भी गरीब इन्सांन मरता है और पानी नहीं होता तब भी मरना गरीब को ही है।

    बुलेट ट्रेन की ज़रुरत देश को नहीं है। जो ट्रेन्स चल रही है वही ढंग से चल जाएँ यहीं अचिएव्मेट होगा। ज़रुरत है उन करोडो गरीबों को उनके घरों को बाढ़ से बचाने की। सारे देश की नदियों को आपस में जोड़ने की।काम आसन नहीं है लेकिन नामुमकिन भी नहीं। अगर एक प्रधानमत्री इसका सुझाव दे सकता है तो इसे अमल में भी लाया जा सकता है। पेट्रोल पर दो रुपये और बढ़ा दिए जाएँ लेकिन ये काम शुरू कर दिया जाये। गरीब और किसानों को फायदा होगा। बाढ़ में किसी बच्ची को अपना घर नहीं खोना पड़ेगा। देश में पानी का कमी पूरी होगी और सिचाई के लिए पानी की कमी की वजह से किसान आत्महत्या नहीं करेगा। जब तक देश में अमीर और गरीब के बीच बैलेंस नहीं बनेगा तब तक हम गरीब देश ही रहेंगे। बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटीज से गरीबों की जान नहीं बच सकती। उनके लिए काम करना पड़ेगा। एक्शन लेना पड़ेगा। बड़ी योजनाये शुरू करनी पड़ेंगी। सरकार को याद रहे कि जिस गरीब का घर बह गया है आप उसके नौकर है। वो हजारों लोग बेघर भूखे रोड पर है, अगर आप दिल्ली में चैन से बैठे हैं तो हम सबने गलत चुनाव कर लिया है।

    बिलाल हसन