• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Photo Credit - The Guardian
    Photo Credit - The Guardian

    भगाओ मत जाम से कमाओ

    Vox  एक साइट है जिसपर एक शोधपरक लेख आया है। ब्राउन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री मैथ्यू टर्नर ने कई मुल्कों और अमरीका के कई महानगरों की उन सड़कों का शोध करके बताया है कि आप सड़कों का जितना चौड़ीकरण करेंगे उसी अनुपात मे कारें भी दूरी तय करने लगती हैं। कार चालक प्रेरित हो जाता है और भी लंबा सफ़र तय करने के लिए। नतीजा यह होता है कि पांच दस साल और अरबों रुपये लगाकर सड़क चौड़ी तो हो जाती है मगर ट्रैफिक की समस्या जस की तस रह जाती है।

    टर्नर लास एंजिलिस की सड़क I-405 की मरम्मत के बाद ट्रैफिक का अध्ययन किया है। इस सड़क को 60 अरब रुपये की लागत से पांच साल के निर्माण के बाद चौड़ा किया गया है। लेकिन टर्नर ने पाया कि नई सड़क पर ट्रैफिक की रफ्तार पहले से भी धीमी है। टर्नर और पेन्सिलविनिया विश्वविद्यालय के उनके साथी गिलिस दुरांतन इसे ट्रैफिक का बुनियादी सिद्धांत बता रहे हैं। जिसके मुताबिक सड़क की क्षमता बढ़ने पर उसी अनुपात में कारों की दूरी तय करने की क्षमता भी बढ़ जाती है। क्योंकि सड़क पर चलने के लिए चालक से कोई पैसे नहीं लिये जाते हैं। इस लेख में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि क्या टोल टैक्स लेने से कार चालक कम प्रेरित होता है चलाने के लिए और वहां कार की रफ्तार बढ़ जाती है।

    इन विद्वानों का यह भी कहना है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी सड़क पर जाम समाप्त करने में पर्याप्त नहीं है। अभी तक भारत में यही दलील दी जाती रही है। टर्नर और दुरांतन का कहना है कि एक बस में जितने लोग कार से सवाल होंगे उनसे खाली जगह में उतनी ही कारें चलने लगती हैं। अपनी इन दोनों बातों के लिए उन्होंने कई साल के आंकड़ों का अध्ययन किया है। टर्नर बता रहे हैं कि मान लीजिए कोई स्टोर हैं जहां कोई सामान दस प्रतिशत कम दाम पर मिलता है लेकिन स्टोर घर से दस मील दूर है। अगर आपको यह लगे कि ट्रैफिक जाम है और काफी समय लगेगा तो आप नहीं जायेंगे। लेकिन जैसे ही हाईवे पर एक नई लेन जुड़ने की जानकारी होती है आप कार लेकर निकल पड़ते हैं। धीरे धीरे हज़ारों लोग इसी प्रकार का हिसाब लगाने लगते हैं।

    टर्नर दलील दे रहे हैं कि ट्रैफिक बहुत बुरी चीज़ नहीं है। इसका मतलब है कि बहुत सारे लोग सड़क का इस्तमाल करना चाहते हैं। अगर आप चाहते हैं लोग और भारी परिवहन आपके शहर की तरफ आएं तो नई सड़कों पर निवेश एक किस्म का बुनियादी ढांचे में निवेश करने जैसा है। इसलिए इनके अनुसार पैसा वसूल करना चाहिए। मुझे ये पढ़कर लगा कि क्यों न लोगों से मुफ्त में काम कराया जाए, कोई तनख्वाह ही न दी जाए। स्कूल अस्पताल के बाद सड़कों का निजीकरण तो हो ही चुका है अब मोहल्ले से लेकर तमाम सड़कों का भी हो ही जाए। फिर सरकार को एक मुश्त टैक्स देने के बजाए टोल टैक्स देते चलिए।

    फिर भी इन विद्वानों का तर्क है कि कंजेशन यानी जाम के समय में उस सड़क पर आने वाली कारों से पैसे लिये जाएं। मध्य रात्रि की तुलना में दिन के वक्त जब ट्रैफिक ज्यादा हो तब यह शुल्क ज्यादा हो सकता है। लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों ने इसे आज़माया है। रिसर्च से पता चलता है कि इससे ट्रैफिक में काफी गिरावट आती है। लेकिन इस स्कीम की आलोचना यह है कि लोग इसे गरीब विरोधी मानेंगे। इसमें कुछ सच्चाई भी है लेकिन सड़क बनाने में काफी लागत आती है और इसका इस्तमाल सिर्फ गरीब ही नहीं करते। ये टर्नर की दलील है। इनका कहना है कि व्यक्ति की आमदनी और कार द्वारा तय दूरी के हिसाब से भी यह शुल्क तय किया जा सकता है।

    इस तरह के शोध दुनिया में आ रहे हैं। यह दलील देने वाले भी मिल जायेंगे कि आपको सुविधा चाहिए तो पैसे तो देने पड़ेंगे। मैंने कुछ पढ़ा तो आपके सामने हिन्दी में पेश कर दिया। विचार करते रहिए।

    • Ashwani

      I don’t think its wise to collect money from people who are already stuck in traffic jam. We already paid taxed when the cars or vehicles bought and in form of toll plaazas taxes and etc.
      So why annoy people by asking for more money instead of having flyovers and proper traffic management and routing.