• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    बैंकर इस बार होली न खेंले…रंग ख़रीद लिया है तो फेंक दें

    मेरे प्यारे तेरह लाख बैंकर

    क्या वाक़ई आपसे ग़ुलामी कराई जा रही है? अगर इसका जवाब हां हैं तो इस होली पर रंग न खेलें। ख़रीदा हुआ रंग फेंक दें। आपको कोई हक़ नहीं है कि आज़ाद भारत मे ग़ुलामी स्वीकार रंग खेलने का नाटक करें। जब आपके दैनिक जीवन में रंग नहीं है तो होली भी बिना रंग के गुज़र जाएगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इस ग़ुलामी से निकलने का नैतिक बल विकसित कीजिए। इस दौरान गांधी को पढ़िए। आपकी चुप्पी गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद, भगत सिंह, तिलक, लाला लाजपत राय से वादाख़िलाफ़ी है।

    मुझे लगता है कि मैंने ग़लती कर दी। मुझे आपके भेजे गए गुप्त पत्रों को नहीं पढ़ना चाहिए था। हज़ारों पत्रों को पढ़ने का जुनून कब और कैसे सवार हो गया, मुझे भी पता नहीं चला। अब मैं उन पत्रों को पढ़ते हुए रोने लगा हूं। शायद आपकी पीड़ा से गुज़रने लगा हूं। मुझे एक दो पत्र पढ़ने और एक दो एपिसोड करने के बाद यह सीरीज़ बंद कर देनी चाहिए थी।

    मैं उन कैशियरों और क्लर्कों की जगह ख़ुद को रख कर देख रहा हूं जिन्होंने नोटबंदी के दौरान अपनी जेब से दो हज़ार से लेकर, दस हज़ार, पंद्रह हज़ार, तीस हज़ार, चालीस हज़ार, डेढ़ लाख, ढाई लाख और पांच लाख तक जुर्माना भरा। मुझे नहीं पता था कि बैंकों के भीतर कर्मचारी इतने कम हैं। आप बैंकर रात भर जाग जागकर दिन भर खड़े होकर नोटबंदी के दौरान नोट बदलते रहे। गिनने में ग़लती हुई, सड़े गले नोट आ गए, जाली नोट आ गए तो उसके बदले में आपको अपनी जेब से देना पड़ा।

    आप पर नोटबंदी थोपी गई मगर आपने देश सेवा समझ कर खुद को झोंक दिया मगर लोन लेकर ढाई लाख और तीन लाख चुकाना ये बड़ी क़ुर्बानी है। आज ही एक नेता पर भड़क गया कि आप लोगों ने उन कर्मचारियों की सूची क्यों नहीं बनाई जिन्होंने नोटबंदी के दौरान नोटों की गिनती में हुई चूक के कारण अपनी जेब से हज़ारों रुपये भरे। क्यों नहीं बैंकरों ने इसे दुनिया को बताया।

    मैंने आपकी पहचान की रक्षा के लिए उन पत्रों को नष्ट कर दिया। कायदे से उसे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेज देना चाहिए था। यह कैसा लोकतंत्र है जहांं तेरह लाख लोग बोलने से डर जाएं। मुझे किसी हिन्दी सिनेमा के सीन की तरह खलनायक की खदान में बैंकर ग़ुलाम की तरह कोयला ढोते नज़र आ रहे हैं।

    सैंकड़ों महिला बैंकरों की दास्तान ने नागरिक शक्ति में मेरा विश्वास कमज़ोर कर दिया है। किसी गर्भवती को यह कर डांटा गया कि मार्च क्लोज़िग महीना होता है, उसके हिसाब से गर्भ धारण करना चाहिए था, किसी को कहा गया कि चुपचाप टारगेट पूरा करो वरना बिना शौचालय वाले ब्रांच में भेज दिया जाएगा। किसी को छुट्टी मांगने पर कहा गया कि पहले टारगेट पूरा करो। तब भी छुट्टी नहीं दी गई। पुरुषों के साथ भी यही हुआ।

    इतने सालों तक बैंक के बाहर स्वच्छता का बैनर लगा रहा मगर उन्हीं के भीतर शौचालय तक नहीं है। स्त्री के लिए भी नहीं, कई बार पुरुषों के लिए भी। मेरी सीरीज़ के बाद पिछले तीन दिन में कई बैंकों ने आदेश दिए हैं। ब्रांचों के सर्वे हो रहे हैं, पोर्टल बन रहे हैं। यह पहले क्यों नहीं दिखा। क्यों एक पीओ महिला को हाथ में गैलन लेकर शौचालय जाने के लिए मजबूर किया गया या फिर शौच कर सड़क पार दूर चल कर कहीं और जाने के लिए मजबूर किया गया।

    मैं 55 साल की उस महिला की रोती हुई आवाज़ से कांप गया हूं। इतने फोन आ रहे हैं कि अब झुंझलाने लगा हूं। कोई अकेला हज़ारों मेसेज नहीं पढ़ सकता, न फोन उठा सकता है। लिहाज़ा ब्लाक करने लगा। बिना जवाब दिए डिलिट करने लगा जबकि मैं ऐसा नहीं करता था। आप बैंकरों की यह ग़ुलामी अब मुझी को चीर रही है। मुझे बदल रही है।

    आप बैंकरों की संख्या तेरह लाख से ज़्यादा बताई जाती है। क्या कोई इतनी बड़ी आबादी से ग़ुलामी करा सकता है? मेरी जो समझ बनी है उसके आधार पर कह सकता हूं कि बिल्कुल ग़ुलाम बना सकता है। शायद आपको पता भी नहीं है कि यह ग़ुलामी है। दासता है। बैंकरों की ग़ुलामी की हालत यहां तक पहुंच गई है कि आज उनकी सैलरी आधी कर दी जाए तो भी वे चुपचाप काम करेंगे। एक तरह से आधी कर भी दी गई है। आप अपने स्वार्थों के कारण टुकड़ों में बंट गए हैं। अगर आप बोल पाते, बोलने लग जाते तो इस ग़ुलामी से निकल पाते। अपने हितों के लिए न सही, आज़ादी और आवाज़ के लिए तो एक हो जाइये।

    किसी ग्राहक को पकड़ कर बीमा या कोई और पालिसी बेच देनी होती है। वो मना करे तो किसी और ग्राहक के खाते से बिना बताए प्रीमियम काट लेना पड़ता है। जब इससे भी पूरा नहीं होता है तब अपनी जेब से भर देना पड़ता है। यही नहीं आप ख़ुद भी उन बीमा पालिसी को खरीदने के लिए मजबूर किए जा रहेे हैं। बैंकों के भीतर आपकी आर्थिक आज़ादी समाप्त हो गई है। बैंक के ऊपर वालों का टारगेट पूरा होने के लिए आपके रिश्तेदारों के नाम पालिसी खरीद रहे हैं। एनपीए होने से बचाने के लिए खाते में अपनी जेब से पैसे डाल रहे हैं। क्या बैंक आपके पैसे से चलेगा? आप अपनी जेब से एक से दस रुपये का नोट जनधन खाते में डाल रहे हैं।

    आप ख़ुद से वादा कीजिए, जब तक इस ग़ुलामी से निकलेंगे, तब तक कोई त्योहार नहीं मनाएंगे। अगर आप इस ग़ुलामी से नहीं लड़ सकते तो आपको कोई हक़ नहीं है कि आप होली मनाएं। दिवाली मनाएं। या तो आप कहें कि आप ग़ुलाम नहीं हैं। फिर अपने भेजे गए पत्रों का क्या करेंगे। बोलने से क्यों डर लगता है?

    जिस तरह अपना नाम छिपा कर मुझे पत्र लिखा, उसी तरह आप सभी एक सादे काग़ज़ पर सब कुछ लिख डालिए। उसे लिफाफे में डालकर किसी सोसायटी में हर घर में डलवा दीजिए। हज़ारों बोतलों में बंदकर गंगा में छोड़ दीजिए। जो भी रास्ते में मिले उसे दे दीजिए। रेल में सहयात्री को दे दीजिए, किसी सिपाही को दे दीजिए, भिखारी से लेकर ड्राइवर को दे दीजिए। शादियों में जाइये तो तोहफे के लिफाफे में वो पत्र लिखकर नए जोड़े को दे दीजिए। वेटर को दे दीजिए, क्लिनर को दे दीजिए।

    बताइये देश को कि आपको ग़ुलाम बना कर रखा गया है। सबको बता दीजिए कि बैंकों के भीतर झूठ की एक कालकोठरी है जिससे काले रंग का डेटा निकलता है और जिसे राजनीति के बाज़ार में मोती बताकर बेचा जा रहा है। जो ग़लत है उसे एक दिन ग़लत कहना ही होगा।

    मुझे पता है लेदर की कुर्सी पर सफेद तौलिया डालकर जी हुज़ूरी करने वाले चेयरमैन अब जल्दी खंडन करेंगे मगर वे तब खंडन नहीं कर पाए जब मैंने महिलाओं के शौचालय की हकीकत दुनिया को दिखा दी। उनकी बोलती बंद हो गई। उनके चेले नोटिस भेज रहे हैं कि किसी पत्रकार को ब्रांच में न घुमाएं। यह नोटिस कैसे भेजी जा सकती है कि किसी मीडिया वाले से दोस्ती न करे, वरना वो आपसे दोस्ती कर भीतर का राज़ जान जाएगा। ये कौन सा भीतर का राज़ है? किसके लिए ये राज़ है? क्या चेयरमैन इस देश की संविधान की आत्मा से ऊपर हैं?

    मैं आपकी जगह होता तो इस ग़ुलामी पर होली नहीं मनाता। किसी को होली का संदेश तक नहीं भेजता। मुझे होली मुबारक का कोई संदेश न भेजें।आपको कोई हक नहीं है झूठ के रंग के साथ होली का रंग खेलने का। घर में छोटे बच्चे हैं तो उनके लिए खेल लीजिए मगर संभव हो तो मत खेलिए।

    हम सब नौकरी की शर्तों और अनुशासन से बंधे हैं। मैं भी। हम सब एक सीमा तक चुप भी रहते हैं मगर वो सीमा यह नहीं कि कोई हमारी गर्दन दबा दे, कोई हमारी बचत पर डाका डाल दे, कोई नौ महीने की गर्भवती को फील्ड में सर्वे के लिए भेज दे। आप होली नहीं खेलेंगे तो आपके रिश्तेदार भी जानेंगे, पड़ोसी भी जानेंगे कि आप किन हालात से गुज़र रहे हैं। फैसला आपको करना है।

    सबका,

    रवीश कुमार