• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • images (17)

    आज़ादी हम लाएँगे …

    एक व्यापारी है जो हज़ारों करोड़ लूटकर पार्टी करता है वह हमारे ‘उच्च सदन’ का सम्मानित सदस्य है। किसान कुछ हज़ार रुपयों के लिए अपनी जान लेने को मजबूर है और हमें देश में एक शेर की मौजूदगी पर ग़रूर है हम तो बस कुछ स्कूली बच्चों पर ताक़त आज़मा कर ख़ुश हैं।

    सच्चाई तो ये है कि

    सियाचिन के शेरों को देश के प्रधानमंत्री शरीफ़ की चाय पर बेच आते हैं
    किसानों का ख़ून पीकर ही तोटी़वी पर आई.पी.एल. के मैच आते हैं

    प्रधानमंत्री जी संसद में महिला दिवस मनाने की बात कहते हैं
    पर कहाँ मंदिरों में महिलाओं के भीतर जाने के सवाल याद करते हैं

    परमवीर चक्र विजेता शहीदों का ऐसे सम्मान करते हैं,
    पाकिस्तान को घर बुलाकर मैच खेलते हैं, जलपान करते हैं

    भारत की बर्बादी के नारे लगाने वालों को जेल में डालने वाले शेर
    चूहे बनकर भारत को बर्बाद करने वालों से मुहब्बत का दम भरते हैं
    बात बात पर देश प्रेम का नगाड़ा ठोंकने वाले लकड़बग्घे,
    शहीदों का अपमान करते हैं और दुश्मनों की चाय हज़म करते हैं

    शेर नहीं है जिसने केवल अब तक गाल बजाए हैं
    शेर नहीं है जिसने सियाचिन में माँ के लाल गँवाए हैं
    शेर देखने हैं तो आओ सरहद पर आकर देखो
    शेर देखने हैं तो जाकर भूदेव किसानों के घर देखो

    सो जाओ कुछ करने धरने का रहा कोई उत्साह नहीं
    देखो खेलो खेल, रही अब देशप्रेम की चाह नहीं

    पर यदि सच्ची ताक़त है मन में और ग़ुस्सा हो छाती में
    सीमा पर और घर भीतर की निर्मम मौतों पर शरम तनिक भी आती है

    तो राजनीति के रँगे सियारों को शेर बुलाना बंद करो
    लहू बहा जिस धरती पर मत वहाँ सियासी रंग भरो

    भारत माता का गौरव वापस लाने की बात करो
    माल्या, राजा, कलमाड़ी, सहारा की छाती पर लात धरो

    पूछो आगे बढ़कर कहाँ गया काले धन का वादा
    अच्छे दिन को लाने का क्या धूमिल हुआ इरादा

    महँगाई के कारण थाली से दाल और सब्ज़ी रूठ गए
    काले धन वाले मामा को सौ में पैंतालीस देकर क्यूँ छूट गए

    क्यूँ माँ आज भी फटे पुराने चिथड़े ढोती है
    भूकी नंगी संतानों पर क्यूँ ख़ून के आँसू रोती है

    बहुमत पाकर भूल गए हो अगर हमारी तकलीफ़ें
    सत्तामद में लाँघ रहे हो तुम जो सारी दहलीज़ें

    सर से ऊपर बहता पानी अब और नहीं सह पाएँगे
    बाँध सबर का टूट गया तो सब सत्ताधारी बह जाएँगे

    शपथ उठाओ भारत माँ की त्यागो सुख की सेज उठो
    रणभूमि आह्वान कर रही गहो अस्त्र रण मध्य चलो

    शत्रु हमारे गाल बजाने वाले स्कूली छात्र नहीं
    धन की लंका बनाने वाले राक्षस दया के पात्र नहीं

    कर वध भी यदि लेना होगा तो हम आगे बढ़कर छीनेंगे
    सैनिक और किसान न अब इस देश में तिनके बीनेंगे

    तिरस्कार कर नौकरियों का क्रान्ति की आग जलाएँगे
    सच्ची और सभी की ख़ातिर आज़ादी हम लाएँगे …