• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
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    ‘अपराध और दंड’ के बीच तैयार एक पेचीदा समीकरण: निर्भया कांड 

    गलती अथवा क्षति के किसी भी स्वरूप के असर को किसी भी प्रक्रिया द्वारा पलटकर पूरी तरह से पहले की स्थिति में नहीं लाया जा सकता। यह बात वस्तुओं एवं पदार्थों से लेकर मनुष्य के भावनात्मक संबंधों तक पर समान रूप से लागू होती है। इसी प्रकार दिसंबर 2012 में निर्भया उर्फ दामिनी के साथ जो कुछ भी हुआ, उसकी प्रतिक्रिया में की गई किसी भी कार्रवाई के जरिए निर्भया पर बीते जुर्म के दौर की पीड़ा के असर को अतीत से हटाया नहीं जा सकता। लेकिन अपराध के स्‍वरूप और गंभीरता के मद्देनजर उसे अंजाम देने वालों को दंडित किया जाना भी उतना ही अनिवार्य है। इसमें भी दो राय नहीं कि घटित हुई आपराधिक घटना की नृशंसता और बर्बरता आदि के मद्देनजर यदि मौजूदा कानूनी प्रावधान कम पड़ते हों, तो उनमें तब्दीली भी होनी चाहिए तथा उनका सख्ती से अनुपालन भी होना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हम सिर्फ उदारवादी सोच के अनुप्रयोग से ऐसी मानसिकता वाले लोगों के (कु)कृत्यों पर कतई नकेल न कस सकेंगे, जिनके द्वारा आपराधिक वारदात किन्हीं चूक अथवा मजबूरी की हालत में पड़ जाने की बजाय पूर्व-नियोजित षडयंत्रों के तहत किए जाते हैं। किन्तु इन सबके बावजूद, न्यापयपालिका द्वारा ऐसे मामलों में किसी तरह के भावनात्मक अथवा राजनैतिक दबाव में आकर विधि के उन मूलभूत सिद्धांतों से समझौता भी नहीं किया जाना चाहिए जिसके चलते आने वाले समय में अपराधी एवं दंड के आपसी समीकरणों के बीच कोई ऐसी परिपाटी चल निकले जो सुनियोजित अपराध के कर्ताओं के लिए कोई नई राह खोल दे। हाल-फिलहाल में कुछ रसूख वाले लोगों द्वारा प्रभाव-पूँजी-पहुँच के दम पर देश के कानूनी प्रावधानों के मखौल उड़ाए जाने की घटनाएँ इस बात का गवाह भी हैं।

    निर्भया मामले के कुल छ: अभियुक्तों में से एक ने तो अपने ऊपर खुद का न्याय लागू करते हुए खुदकुशी कर ली, शेष पाँच में से चार के मामलों में हाई कोर्ट तक ने फाँसी की सजा सुना डाली है (यहाँ यह मुद्दा, कि सबसे बड़ी सजा के तौर पर ‘मृत्यु दंड’ हो, अथवा ‘शेष जीवन का मारक, अंधकारयुक्त एकाकीपन’ आदि, की बात एक अलग ही बहस है), एवं शेष रह गए एक अभियुक्त, जो कि वारदात के समय अठारह वर्ष से कम आयु का यानी अवयस्क होने के कारण भारतीय दंड संहिता के तहत किसी भी तरह के अपराध के लिए अधिकतम तीन वर्ष की सजा का हकदार था, ने अपनी सजा का अधिकतम दौर पूरा कर लिया। जाहिर है कि निर्भया पर गुजरे जुर्म को याद करते हुए उसे अंजाम देने वाले (भले ही वह कानूनी रूप से वयस्क न रहा हो) द्वारा मात्र तीन वर्ष की अवधि जेल में गुजारकर बाहर आ जाना एक कमतर न्याय दिखाई देता है। इसमें भी किसी को द्विविधा नहीं होनी चाहिए कि उक्त अभियुक्त का बाहर आना, निर्भया के दु:ख से खुद को जुड़ा पाने वाले करोड़ों लोगों के लिए एक निराशाजनक खबर है। किन्तु, किसी भी तर्क के तहत उसके बाहर न आने तथा दंड के अन्य/अतिरिक्त प्रावधान का भोगी होने की स्थिति से उत्पन्न होने वाले हालात के बारे में विचार करने के उपरांत न्याअयाल द्वारा उसे बरी किए जाने को सही ठहराना कदाचित अनुचित नहीं लगता। न्यायलय के इस तर्क के पीछे का सबसे बड़ा कारण वह कानून है, जिसके तहत किसी भी अभियुक्त पर अपराध को अंजाम दिए जाने के समय तक बने कानून के तहत ही दंड आदि का प्रावधान किया जा सकता है। हालाँकि उसके बाद के समय में न्यायालय द्वारा स्त्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने, तथा उनके साथ विभिन्न प्रकार के दुर्व्यवहारों को अंजाम देने वालों के खिलाफ तैयार अनेक प्रावधानों के अतिरिक्ते उस कानून पर भी मुहर लगा दी गई कि ऐसे जघन्य् अपराध को अंजाम देने वाले 16 से 18 वर्ष की बीच की आयु वाले अभियुक्तों  के विरूद्ध  भी वयस्कों के समान दंड के विधान होंगे। न्यायालय द्वारा अनुमोदित यह कानून अभी राज्य सभा की स्वीकृति की बाट देख रहा है, किंतु मेरी व्य‍क्तिगत राय में इसे स्वीकृति मिल जानी चाहिए। लेकिन स्वीकृति मिलने के साथ नए स्वी‍कृत विधान को अतीत में घटित अपराध के अभियुक्त पर लागू करने सरीखे नए विधान की कवायद, अपराध एवं दंड के बीच के संबंधों को सुधारगामी बनाने की बजाय उनमें कहीं अधिक विसंगतियाँ एवं जटिलताएँ लाने वाला साबित होगा। अत: इन सबको ध्यान में रखते हुए, निर्भया के परिजनों तथा उनके दु:ख में शरीक होने वाले विशाल जन-मानस की भावनाओं के प्रति पर्याप्त सम्माान जाहिर करने के साथ न्यायालय द्वारा अपने वैधानिक दायरे का उल्लंघन न किए जाने का भी स्वागत किया जाना चाहिए। यहाँ यह भी उल्ले‍खनीय है, कि एक बार सजायाफ्ता होकर बरी हो जाने के बाद भी कानून की दृष्टि उस अभियुक्त से हटती नहीं, बल्कि उसके द्वारा भविष्य में यदि किसी नए अपराध को अंजाम दिया जाता है, तो नए मामले की सुनवाई के समय न्या‍यालय उसके अतीत के सभी अपराधों तथा संबंधित दंड को भी संज्ञान में लेते हुए नए नतीजे तक पहुँचती है। इसे ध्यान में रखते हुए, जाहिर है कि निर्भया मामले में बरी हो रहे किशोर का भविष्य ऐसी मानसिकता रखकर जीने के लिए फूलों की सेज नहीं होने जा रही, बल्कि समाज एवं शासन की तिरछी नजर उस पर सदैव बनी रहने वाली है।

    (Author of the article is Shrikant Dubey, working in ministry of environment based in Delhi. Views expressed above are personal)