• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

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    सन्नाटे का छंद बुनने वाले “अज्ञेय”

    इन दिनों ‘अज्ञेय’ से फिर मुलाक़ात हो रही है, तक़रीबन हर रोज़। अरसे बाद की मुलाक़ात पुराने दिनों की याद ताज़ा कर देती है। ‘अज्ञेय’ से मेरा पहला परिचय हाई स्कूल की हिन्दी पाठ्य पुस्तक से हुई। एक कविता थी – ‘कतकी पूनो’। और, एक लघुकथा ‘शिक्षा’। बाल मन को सबसे पहले जिस बात ने आकर्षित किया, वो था उनका नाम – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

    अज्ञेय के नाम में तीन अहम बातें थी। एक, आमतौर पर जो नाम हमने सुन रखे थे उसकी तुलना में यह लंबा नाम था। दूसरा, लंबा और चौंकाने वाला नाम होने के बावजूद यह लयात्मक और काव्यात्मक था। ज़ुबान पर चढ़ने वाला नाम था। तीसरा, यह नाम रहस्यवादी लगता था, कौतूहल जगाता था।

    तब सौंदर्यानुभूति की समझ नहीं थी, शब्दों के अर्थ और भाव भी आधे-अधूरे ही समझ में आते थे। लेकिन ‘कतकी पूनो’ की ये चंद पंक्तियाँ आज भी याद हैं।

    “छिटक रही है चांदनी,

    मदमाती, उन्मादिनी,

    कलगी-मौर सजाव ले

    कास हुए हैं बावले

    ….” 

    हालाँकि कवि अज्ञेय से ज़्यादा लघु कथा ‘शिक्षा’ के लेखक अज्ञेय ने प्रभावित किया। शिक्षा ग्रहण करने आए शिष्य से गुरू कहता है – “कोई भी किसी को कुछ सिखाता नहीं है; जो सीखता है, अपने ही भीतर के किसी उन्मेष से सीख जाता है। जिन्हें गुरुत्व का श्रेय मिलता है वे वास्तव में केवल इस उन्मेष के निमित्त होते हैं। और निमित्त होने के लिए गुरु की क्या आवश्यकता है? सृष्टि में कोई भी वस्तु उन्मेष का निमित्त बन सकती है?” शिक्षा की इस व्याख्या ने मुझे स्वानुभूत और स्वाध्याय की ओर प्रेरित किया।

    स्कूल के बाद मैं विज्ञान का विद्यार्थी हो गया। पटना में जहाँ रहता था वहीं बग़ल के कमरे में एक सीनियर थे, शेखर। उनके कमरे में एक किताब पड़ी थी – शेखर : एक जीवनी का पहला भाग उत्थान। यह किताब शायद उन्होंने अपने हमनाम होने की वजह से ली होगी, क्योंकि दूसरा कोई उपन्यास तो मैंने वहाँ देखी नहीं। ख़ैर, मैं उसे चंद्रशेखर आज़ाद की जीवनी समझ उठा लाया। जैसे-जैसे पढ़ता गया, शेखर का किरदार सामने खुलता रहा। अगले दिन ‘शेखर : एक जीवनी’ का दोनों भाग ख़रीद लाया। इस तरह अज्ञेय से दूसरी मुलाक़ात हुई।

    दूसरी मुलाक़ात काफ़ी यादगार रही, प्रभाव भी ज़्यादा रहा है। ‘शेखर’ के कथानक, किरदार, मनोविज्ञान, फ़लसफ़ा और लेखन शैली ने बहुत प्रभावित किया। शेखर जीवन का अर्थ तलाश रहा है। पहले भाग की भूमिका में शेखर की जिज्ञासा के बारे में अज्ञेय लिखते हैं – “अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, तो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है- व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए?” यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। इस प्रश्न का अन्वेषण निजी हो सकता है, सामाजिक हो सकता है। हर खोज के अपने सूत्र हैं, अपने अर्थ हैं।

    शेखर एक अमात्मान्वेषी का अधूरा चरित्र है जो बन रहा है। अज्ञेय अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि “‘शेखर’ के तीसरे भाग में चित्र पूरा हो जाता है, पर वह अभी प्रकाशित नहीं हुआ है।… अन्त तक उस की शिक्षा (मेरी दृष्टि में) पूरी हो जाती है : वह हिंसावाद से आगे बढ़ जाता है। मैं समझता हूँ कि वह मरता है तो एक स्वतन्त्र और सम्पूर्ण मानव बनकर।” 

    शेखर की इस पूर्णता का हम जैसे पाठक साक्षात्कार नहीं कर पाए। शेखर की जीवनी का तीसरा भाग प्रकाशित नहीं ही हुआ। फिर भी लेखक के मन से उसके रचित पात्र को समझने की कोशिश कर सकते हैं। शेखर के जीवन-दर्शन को एक सूत्र में स्वंय अज्ञेय उसे ‘स्वातन्त्र्य की खोज’ कहते हैं, जिसकी व्याख्या ‘शेखर’ है। अज्ञेय के अनुसार, “शेखर की स्वातन्त्र्य की खोज, टूटती हुई नैतिक रूढ़ियों के बीच नीति के मूल-स्रोत की खोज है। कह लीजिए कि समाज की खोखली सिद्ध हो जाने वाली मान्यताओं के बदले व्यक्ति की दृढ़तर मान्यताओं की प्रतिष्ठा करने की कोशिश है।” 

    शेखर जैसा भी है, बना है, या कि बनने की संभावना थी; मेरी उत्सुक्ता उसमें ज़रूर रही, लेकिन मेरी रूचि अात्मान्वेष के प्रश्नों में अधिक है। जीवन के सुलझे-अनसुलझे सूत्रों में है, और इसी की छाप हमेशा बनी रही।

    सालों बाद अज्ञेय से फिर मिल रहा हूँ। यह मुलाक़ात ‘कवि अज्ञेय’ से है। मौन की अभिव्यंजना को संप्रेषित करने वाले, सन्नाटे का छंद बुनने वाले – ‘अज्ञेय’। परिचय पुराना है, लेकिन प्रेम और प्रकृति के चितेरे शब्द-शिल्पी की अनुभूतियों से अपने भीतर के उन्मेष को ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ। ‘असाध्य वीणा’ का मौन प्रियंवद ‘अपने को शोध रहा’ है। “फिर भी / जिज्ञासा का उत्तर अन्त नहीं है / जीवन का कौतूहल है अदम्य : जीवन की आशा / नहीं छोड़ सकती अन्वेषण”। “उड़ चल हारिल / लिये हाथ में / यही अकेला ओछा तिनका / उषा जाग उठी प्राची में / कैसी बाट, भरोसा किन का!”

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    Kunal Gauraw

    Kunal Gauraw is a Senior Research Engineer by profession, associated with Swaraj Abhiyan and Jai Kisan Andolan.
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