• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    अगर आप औसत हैं तभी आप बेहतर हैं

    अखिल भारतीय कर्मचारी आयोग बनाने का ख़्याल आ रहा है। अगर आप इस तरह के कर्मचारी हैं तो प्रयास कीजिये कि बाकी भी आप जैसे हो जाएँ। अगर किसी दफ्तर में आप जैसे लोग न हों तो मैं दावे के साथ कर सकता हूँ कि वहाँ काम करने का कोई फ़न नहीं होता होगा, वहाँ की पोलिटिक्स बेकार होगी। आप ख़ुद को देखिये कि किस सूची में हैं। आप लोग जो दिन भर अपने अपने दफ्तर के क़िस्सों से मुझे पकाते रहते हैं, तो मैंने सोचा कि मैं भी बदला लूँ। आप सब के विवरण से जो श्रेणियाँ तैयार की हैं अगर आप भी उनमें से किसी एक में आते हैं तो मुझे माफ कर दीजियेगा।

    औसत कोई नहीं होता। औसत ही प्रतिभाशाली होता है। औसत बने रहना एक कला है। जो एम एफ हुसैन बनेगा उसे बाहर जाना होगा। औसत को कोई संकट नहीं होता। प्रतिभाशाली होना अपने आप में नैतिक संकट है। उस पर कई प्रकार के बोझ होते हैं। औसत वाक़ई में हल्का होता है। व्यावहारिक होता है। वो भले बोझ समझा जाता हो लेकिन बोझ तो वो हैं जो औसत को औसत समझते हैं। औसत की प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए। यही कि कैसे औसत आदमी बचा रह जाता है। काम न करने के बाद भी उसी का काम सबको दिखता है। हर हाल में ख़ुश रहने की कला औसतन से सीख लेने में हर्ज नहीं। बिन मक़सद के काम किये जाने का धीरज लेकर हर काम के मक़सद से आज़ाद हो जाइये। औसत हो जाइये।

    बहुत काम करने वाले सबसे ज़्यादा काम बहुत काम करते हुए दिखने में करते हैं। वे ईमेल लिखने में बिजी रहते हैं। बॉस को बताने के लिए सारा प्लान तैयार रहता है कि क्या क्या किया जा सकता है। क्या क्या नहीं हो रहा है। समस्या का कारण तो ख़ुद होते हैं लेकिन समस्या का विश्लेषण सबसे अच्छा करते हैं। बहुत काम करने वालों की एक और खूबी होती है। वो अपनी क्षमता का प्रदर्शन इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि जहाँ काम करते हैं उस जगह पर उनके काम की अहमियत नहीं समझी जाती। बहुत काम करने वाले बहुत काम न करते हुए भी बहुत काम करते रहते हैं। काम करते हुए दिखते रहना भी बहुत काम करना है।

    तूफ़ान चाहे कैसा भी हो। हमेशा कुछ को बच जाने का फ़न हासिल होता है। कभी वे डेस्क टॉप के पीछे छिप जाते हैं, कभी दोस्तों के पीछे। कभी बॉस के पीछे। तूफ़ान आता है, चला जाता है। बल्कि बचते बचते ये भी तूफ़ान बनने लगते हैं। फिर लोग इनसे बचने के प्रयास में मारे जाते हैं। इनकी स्थिति स्थायी हो जाती है। जो इनसे बच गया वो तूफ़ान से बच जाता है।

    कुछ काम करने वाले काम करते हुए इस बात का ख़्याल रखते हैं कि दूसरी जगह के बॉस भी उनके काम को देखें। नियमित तरीके से मैसेज करते हैं। प्लीज देखियेगा। छोटा भाई हूँ। आपका आशीर्वाद देवतुल्य है। ये हमेशा दूसरी जगह के लोगों से कहने में माहिर होते हैं कि सर आपके साथ काम करने की तमन्ना है। हमारे सर पर भी हाथ रख दीजिये। दूसरी जगह का बॉस जिसे उसकी जगह के लोग कुछ नहीं समझते, ख़ुश हो जाते हैं। वो भी फेसबुक पर स्टेटस लिख देता है। ट्वीट कर देता है। महफिल में उसे पहचान लेता है। इससे काम करने वाला उस बॉस को दिखा देता है जिसके साथ वो काम करता है। एक नेटवर्क बन जाता है। वो यहाँ गंध फैलाने के बाद वहाँ गंध फैलाने चला जाता है।

    कुछ लोग हर काल और दफ्तर में चुप रहते हैं। वो बोलते नहीं है। न व्यवस्था के ख़िलाफ़ न व्यवस्था के प्रति। इन्हें सुनने की ग़ज़ब की क्षमता होती है। ये फेसबुक पर सिर्फ दो प्याली चाय और उगते सूरज की तस्वीर पोस्ट करते हैं जिस पर गुड मार्निंग लिखा होता है। इनका मक़सद दुनिया को बदलना नहीं होता है। ये जैसा चल रहा है वैसा चलने दो के घोर समर्थक होते हैं। बल्कि वैसा नहीं चला तो ये अलग चलने वाले को वैसा बना देते हैं। इन्हें सब मालूम होता है लेकिन पूछने पर मुस्कुराते हैं। इनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि इनका किसी से बिगाड़ नहीं होता। ये आदेश को ऐसे पचा जाते हैं जैसे होली में पुआ ही न खाया हो। इनसे आदेश का सोर्स कोई पता नहीं कर सकता। सिस्टम को सिस्टम बनाने में इनका बड़ा योगदान होता है।

    कुछ लोग अलग होते हैं। वे दूसरे को बताने में लगे रहते हैं कि कैसे प्रतिभाशाली बनें। नए लोगों को भी समझ आ जाता है कि प्रतिभा विकसित करने का फ़न किसे हासिल है। इसी के साथ साथ वो बताने लगता है कि कैसे उसकी प्रतिभा को मौका नहीं मिला फिर भी वो दूसरे की प्रतिभा के विकास में लगा है। दफ़्तरों में दबे शोषण दमन के क़िस्सों से सचेत करते करते ये नए को पुराना कर देते हैं। आगत को लगता है कि वो कई साल पहले आ चुका था। उसे रोना आता है कि इतना नाम सुना था। अब पता नहीं क्या होगा।

    कुछ लोग झोला ढोने के फ़न में माहिर होते हैं। वो हमेशा किसी शक्तिशाली के साथ नज़र आते हैं। साथ नज़र आ सकें इसलिए सबसे पहले पहुँच जाते हैं। ये अपना काम नहीं कर पाते हैं क्योंकि शक्तिशाली के काम को जनजन तक पहुँचाने के काम में ही सारा वक्त निकल जाता है। लेकिन समय निकाल कर रीतिकाल के रात्रिकाल चित्रण पर कुछ लिख देते हैं। शक्तिशाली लोग ऐसे लोगों की पहचान में सारा जीवन बिता देते हैं। वे खोज खोज कर इन्हें तैनात करवाते हैं। हर विभाग में ऐसे लोगों के भरोसे हमारा देश चलता है। ये लोग अपने बॉस के लिए कहीं भी चले जाते हैं। पुरस्कार समारोह या उनकी भांजी की सालगिरह। इन सबका स्वेटर या तो भद्दा होता है या बेहूदा चटख। ये हमेशा शक्तिशाली के आगे दयनीय लगने के फ़न में माहिर होते हैं। नौकरी पा लेने की कला का प्रशिक्षण इन्हीं सबसे लिया जाना चाहिए।

    कुछ लोग जड़ता के सिद्धांत के विरोधी होते हैं। ये सड़ना नहीं चाहते हैं। कुछ नया करना चाहते हैं। पहले कभी नया कर नहीं पाते लेकिन नया करने की चाहत छोड़ भी नहीं पाते। इन्हें चैलेंज चाहिए होता है जबकि ये ख़ुद चैलेंज हो जाते हैं। ये ताक में रहते हैं कि कैसे किसी मौके पर जल्दी पहुँच जायें। छुट्टी के दिन आ जायें और आ जायें तो जाये ही न। इस भारी त्याग के दम पर वे तमाम वरदान हासिल कर लेते हैं।

    लोगों का यह प्रकार सबसे अनोखा होता है। ये किसी भी विभाग में काम करते हों लेकिन ध्यान अकाउंट में रहता है। कौन सी स्कीम आई तो उनके लिए नहीं आई। तनख़्वाह बढ़ोत्तरी की पल पल की ख़बर रखने में माहिर होते हैं। किस काम का बजट क्या होता है। उसी काम के लिए दूसरे दफ्तर का बजट क्या होता है। दफ्तर आर्थिक संकट में है या बम बम है इन सब बातों की जानकारी न मिले तो इनका भोजन पच नहीं पाता। एक एक पैसे का हिसाब से अकाउंट डिपार्टमेंट से ज़्यादा रखते हैं।

    कई लोग ऐसे होते हैं जो पद के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। उनका पदनाम क्या है और अगला क्या है इसकी विवेचना में सारा जीवन निकाल देते हैं। आप इनसे बात कर आहत हो जायेंगे कि कैसे इनके जैसे सीनियर को बाइपास कर कल के आए जूनियर को काम दे दिया गया है। इनकी बातचीत का संसार सीनियर जूनियर में ही बँटा होता है। ये पदनामों को बहुत गंभीरता से लेते हैं। बॉस का राशिफल देखकर आते हैं और अपनी तरक़्क़ी के लिए वैष्णों देवी या दरगाह शरीफ़ जाते हैं। जब तक सचिव न लग जाए, निर्देशक न लग जाए इन्हें नौकरी योग का मोक्ष नहीं मिलता। ये लोग प्रमोशन की पार्टी या मिठाई ज़रूर खिलाते हैं। ससुराल में सबसे पहले फोन करते हैं। तनख्वाह किसी को नहीं बताते। न पिता को न ससुर को!

    कुछ लोग होते हैं जो सबको देख मुस्कुराते हैं। कुछ लोग होते हैं जो किसी को देख नहीं मुस्कुराते हैं। उनकी मुद्रा से टपकता रहता है कि काम करने की प्रेरणा अगर कोई है तो यहीं हैं यही हैं। एक टाइप और है। यह चाय सिगरेट का ब्रेक लेता रहता है। ये न हों तो दफ्तर के बाहर चाय की दुकान का रौनक़ ख़राब हो जाता है। ऐसे लोगों से मित्रता रखिये। आफिस पोलिटिक्स के सबसे अच्छे साथी होते हैं। रही बात काम की बात तो याद कीजिये कि आपने कितनी बार कहा होगा। यही कि काम भी करके देख लिया, यहाँ काम करने से कुछ नहीं होता!