• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • rape-molest

    …अब कोई गुलशन न उजडे, अब वतन आज़ाद है !!

    आज अचानक इस गाने की कुछ लाइनें जुबां पर आ गईं , काम करते करते गुन-गुनाना मेरी आदत है, विरासत में जो मिली है माँ से।

    एक लाइन भी नहीं गायी थी की शब्दों पर ध्यान चला गया। व्यंगात्मक हँसी निकल गयी। मेरे पति से बोल पड़ी – जिसने भी ये गाना लिखा होगा, वो आज ज़रूर हंस रहा होगा – “अब कोई गुलशन न उजडे, अब वतन ‘आज़ाद’ है!!” (उसने कहा साहिर लुध्यानवी ने लिखा था।)

    मन में आसिफा की कहानी चल रही थी। आज़ादी तो मिल गयी, मगर ऐसे कई गुलशन पिछले 7 दशकों में फिर भी उजड़ गए। क्यों ?? कई बार ऐसा हुआ है। एक बार फिर वही हुआ।

    न जाने कितने विचार दौड़ पड़े मन में। जाने क्या समां रहा होगा आज़ादी की लड़ाई के दिनों में? उस पीढ़ी ने जिसने वो लड़ाई, वो बलिदान देखा ही नहीं, उसको भला इस बात का एहसास कैसे होगा की आज़ादी किस कीमत पर आयी थी? आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों ने अपने निस्वार्थ बलिदानों के बदले में किस भारत का सपना देखा था? ये तो वही वाली बात हो गयी की ‘बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद’। जिसने अमीर खानदान में जन्म लिया, उसको भला ‘गरीबी में आटा गीला’ हो जाने की पीड़ा का एहसास ही कैसे होगा?

    हम शायद इन बातों को समझ सकतें हैं, उनसे सहानुभूति कर सकतें है जिनकी जानें गई – आज़ादी में या नाइंसाफ विपरीत परिस्थियों में। मगर क्या आज हम सही मायने में यह एहसास कर सकतें हैं? आपका उत्तर हाँ है तो मेरा सवाल है कि “फिर आज भी #आसिफा, #उन्नाओ, #कठुआ क्यों”??

    क्यों न्यायिक व्यवस्था में बाधा तैयार की जा रही ??

    क्यों बचाने के लिए रैलियां निकली ?

    सिर्फ और सिर्फ संवेदना में डूबने के बजाए, क्यों हिन्दू-मुसलमानों में विभाजित हो गया समाज ?

    यही आज़ाद भारत की परिभाषा थी क्या? क्या ऐसे ही समाज का सपना देखा था हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने ?

    क्या हमें सच में उनके बलिदानों की / इस आज़ादी की कीमत का एहसास है ?

    या फिर “घर की मुर्गी दाल बराबर” वाला मामला हो चला है ?

    इंसानियत और समवेदना को समाज में प्राथमिकता दिलाने लिए क्या करना होगा ?

     

    अज्ञात