• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • Photo Courtesy - Rediff
    Photo Courtesy - Rediff

    ‘आप’ ऐसे तो न थे !

    हमने कहा था कि – ‘आप’ के सपने अभी हमारे हैं। अफ़सोस कि शायद ‘आप’ उन सपनों से आगे निकल गयी। बीते कुछ हफ़्ते बड़े कष्टकारी रहे। ख़ामोशी-सी छा गयी। इस ख़ामोशी के अंतर में कई प्रश्न उमड़ रहे थे। कुछ के उत्तर मिले, कुछ अब भी अनुत्तरित हैं। बहरहाल इन सारी उधेड़बुन से जो तस्वीर उभरती है वो निराशाजनक ही है और एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा कर रही है।

    व्यक्ति और घटनाक्रम महत्वपूर्ण नहीं हैं, ये तो मात्र निमित हैं और किसी न किसी सकारात्मक या नकारात्मक प्रेरणा के आधार पर घटित होते रहे। महत्वपूर्ण है, इनकी अभिव्यक्ति और सिद्धांत निरूपण। किसने क्या कहा, पहले किसने कहा, कौन किसके साथ खड़ा है, कौन किसके विरोध में खड़ा है- इन प्रश्नों में जिनकी रूचि हो, वो बेशक इस घटनाक्रम पर विस्तृत चर्चा करेंगे। लेकिन हमारे प्रश्नों के उत्तर इन सबसे इतर कहीं और हैं।

    फ़रवरी से मार्च बीतते बीतते सारी ऊष्णता सर्द पड़ चुकी है। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘आप’ का चरित्र बदल गया है। हमारे विचार और कर्म ही चरित्र का निर्माण करते हैं, विचार से कर्म निर्देशित होते हैं। लगता है, कहीं न कहीं विचार कमज़ोर पड़ गया है। तभी, कर्म सकारात्मक न रहे और परस्पर प्रक्रिया में विचार भी नकारात्मकता के शिकार होते चले गए। कर्म और विचार – दोनों की संकीर्णता ने फिर चारित्रिक ह्रास की दिशा में ढकेल दिया। उच्च नैतिक पायदान से फिसलने लगे। ये अलग बात है कि तुलनात्मक रूप से ‘आप’ पायदान पर भले ही कुछ ऊपर नज़र आएँ लेकिन अब दिशा ऊपर की ओर नहीं बल्कि नीचे की ओर है। और यही नैराश्य का मूल कारण है।

    अब चुनौती क्या है? चुनौती है इस दिशा को वापस ऊर्ध्वाधर बनाने की, चुनौती है इस सपने को नई ऊर्जा देने की, चुनौती है वैकल्पिक राजनीति को स्थापित करने की। इन सारी चुनौती से टकराने का एक ही रास्ता है – संघर्ष, संरचना और संयम। नैराश्य ने जो टिमटिमाती उम्मीद को सुसुप्तावस्था में भेज दिया है, उसे इसी आधार पर फिर से जागृत करना सबसे बड़ी चुनौती है।

    साध्य और साधन की पवित्रता का आग्रह ही सत्याग्रह है। और किसी भी महान यज्ञ में इसका आग्रह तो होना ही चाहिए। यही आग्रह जनमानस में एक रचनात्मक उम्मीद को जन्म देता है। उम्मीद अपना संवाहक ढूँढ लेती है, निमित गढ़ लेती है, नई ऊर्जा का सूत्रपात होता है और अंत:प्रेरणा के आधार पर घटनाक्रम घटित होने लगते हैं। शायद इसी में इस कालक्रम की सार्थकता हो।

     

    (Writer of the article Kunal Gauraw is an engineer by profession, currently working as a Image Processing Algorithm Developer in an Automotive Research Center in Gurgaon)

    • Rabindra Nath Roy

      इस लेख कॉ अरबिन्द न पढे तो अच्छा रहेगा क्यॉन्कि अगर अब भी उनमे कुछ सोच समझ बची हॉ तो उनकॉ बडा ही कस्ट हॉगा , वैसे ऐसी उम्मीद करना भी नाजायज हॉगा . अरविन्द केजरिवाल जॉ एक आन्दॉलन का प्रतीक था वो आज राजनैतिकॉ की भीड मे गुम हो ग़या है उसे ढुन्ढने की चेस्टा अपना समय बर्बाद करने जैसा ही हॉगा . भटक गई आत्मा की शान्ति के लिये हम प्रार्थना करते है>