• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • lonely

    हम आपके हैं कौन !

    रवीश कुमार  NDTV पर प्राइम-टाइम प्रस्तुत करते हैं ।
    प्रस्तुत ही नहीं, आते हैं – हमारे घरों में, ड्रॉइंग-रूम में और हमारे दिल में भी!  ..और कभी कभी तो ये प्राइम-टाइम की मुलाकात आदत बन जाती है कुछ दर्शकों के लिए ।  जब ऐसा होता है तो रवीश सदस्य बन जाते हैं उन दर्शकों के परिवार के ।

    ये संस्मरण ऐसे ही उन दर्शकों की कहानी है जिनके परिवार का हिस्सा बन चुके हैं रवीश कुमार… पढ़िये इस मार्मिकता को….

    आज सुबह दफ़्तर में एक फ़ोन आया । फ़ोन रखते ही मैं एक अनजान वृद्ध महिला के एकांत से घिर गया । दिल्ली के नीतिबाग में रहने वाली ये महिला किसी बड़े अफ़सर की पत्नी हैं । पहले तो अपनी कविता सुनाई । फिर कहने लगी कि तुम इतना बीमार क्यों रहते हो । मैंने मज़ाक़ में कह दिया कि छुट्टी मिलती है । वो रोने लगी । कहने लगीं कि मैं माँ हूँ । तुम मेरे बेटे हो । मैं रोज़ रात को नौ बजे तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ । तुम नहीं आते हो तो अच्छा नहीं लगता है । वो अब फूट फूट कर रोने लगी थीं । कह रही थीं कि जहाँ पैदा हुए वहाँ का सब छूट गया । तुम मेरी पुरानी भाषा के शब्द दोहराते हो तो सब लौट आता है । नहीं आंटी ऐसा क्यों कहती हैं । आप प्लीज़ मत रोइये । मैं तुम्हारी आंटी नहीं हूँ । माँ हूँ । तो ठीक है आशीर्वाद दीजियेगा । मैं दूसरी तरफ़ चुप और वो उस तरफ़ रोये जा रही थीं । रोते रहीं किसी तरह फ़ोन रख दिया । पहले भी बात हुई थी । तब क्या झटाकेदार अंग्रेज़ी में अधिकार से फ़ोन किया था । नंबर सेव कर लिया था । ( मैं यह अपनी तारीफ़ और शो के प्रचार में नहीं लिख रहा ) मुझे उनका वो आलीशान घर खंडहर की तरह नज़र आने लगा ( जिसे देखा भी नहीं बताया था कि बड़ा घर है ) और उसमें इस शहर में भटकती रूह की चित्कार । हम किस किस के घर में किस किस रूप में उतरते हैं अंदाज़ा नहीं कर सकते । मगर उनका रोना काट रहा है । घर जाने का वादा तो कर दिया मगर उस घर में कैसे जायें जहाँ कोई सब कुछ पाकर एकांत के मातम से घिरा हुआ है । लेकिन जाऊँगा । कितना भयानक अलगाव है ये ।

     

    हम सिर्फ ख़बर या बहस लेकर आपके ड्राइंग रूम में नहीं आते हैं । हम आपकी गुदगुदी बेचैनियां और ग़ुस्से का भी हिस्सा हैं । आप दर्शकों की ज़िंदगी की किस तकलीफ़ में हम मरहम की तरह काम कर जाते हैं ये लिखना आसान तो हैं मगर समझना बहुत मुश्किल । पहले भी रिपोर्टर एंकर की इन अनाम और अनगिनत रिश्तेदारियों पर लिख चुका हूँ । हमारे ख़ून के रिश्ते तो ख़ून के प्यासे रहते हैं , नहीं निभता फिर भी निभाते रहते हैं । ये वो लोग हैं जो ख़ून के रिश्तेदार नहीं हैं । काम में ईमानदारी और बेहतर प्रस्तुति के अलावा कोई ज़रिया भी इन रिश्तों को निभाने के लिए । कई लोगों से मिल लेते हैं । घर भी गया हूँ । एक के बारात में चला गया था । बाज़ार में रोज़ अपने देखने वालों से मिलता हूँ । उनके साथ फोटो भी खिंचा लेता हूँ । मगर इस भीड़ में ख़ुद के अकेलेपन की प्रक्रिया भी चलती रहती है । खुद के लिए भी किसी को ढूँढता रहता हूँ । माता जी की व्यथा को समझ सकता हूँ । आगरा में एक किराने की दुकान चलाने वाले इक़बाल भाई को भी समझ सकता हूँ जिन्हें फ़ोन किया तो कहा कि दो मिनट होल्ड कीजिये । कार में बैठ लूँ । फिर इक़बाल भाई रोने लगे कि हमें क्यों नहीं अपना समझा जाता है । हम क्यों किसी हिन्दू मुस्लिम डिबेट में बाहरी की तरह दिखाये जाते हैं । रोते ही रहे । अकेलापन कितने स्तरों पर आदमी की पहचान का पीछा करता है । आज रात नौ बजे क्यों नहीं आए , जब भी ऐसा एस एम एस आता है, यह बात खटक जाती है कि आज कोई अकेला रह गया होगा ।