• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • POST CARD

    प्रेम पत्र

    प्रिय सो एंड सो,

     
    बहुत दिनों बाद सोचा किसी महबूब को ख़त लिखूँ । महबूब कोई भी हो सकता है । जो भी है वो उससे नए सिरे से बात करने की कशिश मुझसे यह ख़त लिखवा रही है । मुझे चिढ़ है कि सारे महबूब एक से लगते हैं । किसी ने कम्प्यूटर के ज़रिये हमारे अहसासों और संकेत चिन्हों को गढ़ दिया है जिसे एक पैकेज की तरह लेकर हम किसी के सामने उपलब्ध हो जाते हैं । ग़ुलाम हैं हम आशिक़ी उम्र तलब तमन्ना बेताब जैसे बेकार फलसफों के । जो घिस कर हमारी रग़ों में दौड़ रहे हैं । ये हमें इश्क़ में बोर करते हैं । उसकी विविधता को ख़त्म करते हैं । इसलिए लगा कि लिखना ज़रूरी है । 
     
    दरअसल हमने मोहब्बत में अपने सपने देखे ही नहीं । वर्षों बाद अहसास हुआ कि सारे सपने कहीं और से बनकर डोम्नोज़ पित्ज़ा की तरह होम डिलिवरी किये गए हैं । कई बार हमारा प्यार भी बाज़ार लगता है । मौसम और गानों के हिसाब से मूड का बदलना, शहरों के बदलते ही यादों का बदल जाना यह सब बाज़ार से आता है । बने हुए गाने और छपी हुई नज़्मों कविताओं के ज़रिये हमने कब चाँद को सराहने की नक़ल मार ली और कब हम अपने एकांत को किसी सिनेमा के दृश्य की तरह जीने लगे, पता होते हुए भी पता नहीं चला । इसलिए मैं तुम्हारे साथ हूँ या तुम किसी का साथ छोड़ मेरे साथ हो इसमें ख़ास फ़र्क नहीं है । तुम्हारा रोना और मेरा मिस करना सब एक जैसा है । रविवार को छपने वाले ‘लव टिप्स’ जैसा ।
     
    ऐसा करते हुए हम प्यार के अहसास से नहीं बल्कि प्यार के शापिंग माॅल से गुज़र रहे होते हैं । हमारे सपने असंख्य लोगों के देखे गए सपनों की तरह है । वर्ना कैसे मेरा सपना उसके सपने जैसा हो सकता है । पहली बार जब आर्ची कार्ड को देखा तो यही लगा कि इसे कैसे मालूम कि अब हम सबका किसी को चाहना या खो देने की अभिव्यक्तियों का फ़र्क मिट चुका है । सब अख़बार मौक़ा है और हर एक मौक़े को लिए आर्ची का कार्ड है । दरअसल हमने अपना कोई एकांत बनाया ही नहीं जहाँ सिर्फ तुम हो और मैं हूँ । हमारी भाषा क्या है । हमारे प्रतीक क्या है । क्या हम साथ साथ कुछ करते हुए अपने लिए शब्द रचते हैं जहाँ सिर्फ हमारी और हमारी स्मृतियाँ बन रही हो । कितना भयावह है सबकुछ । शहर और नौकरियाँ जिस तरह मोहब्बत के ख़िलाफ़ हैं वे किसी भी तरह खाप पंचायत से कम नहीं । खाप जान लेते हैं और नौकरियाँ वक्त । जात और वक्त दोनों के नाम पर हमारी हत्या हो रही है। दफ़्तर किस क़दर हमारी अंतरात्मा में घुस चुका है यह देखना हो तो हमारी बातचीत के तमाम वाक्यों को देख लो । धर्म,मंदिर मस्जिद, पीर मज़ार ,तीज त्योहार सबने मिलकर मोहब्बत के तमाम पलों को सार्वजनिक और सामुदायिक बना दिया है । इकहरा कर दिया है । हमारी करवटें तक अमिताभ रेखा या रणबीर प्रियंका जैसी हैं । 
     
    मेरी महबूबाओं तुम सब एक जैसी हो । मैं भी सबके जैसा हूँ । इसीलिए तुम्हारी स्मृतियों में बिना इजाज़त के मैं अपनी यादों के सहारे घुस सकता हूँ । एक को चाहते हुए सबको चाह सकता हूँ । हम सब अलग अलग जोड़ों में एक ही तरह के आशिक हैं । समानता इतनी भयावह है कि हम कब किसके आँगन में चले जाते हैं पता ही नहीं चलता । दूसरे से मिलकर आने पर क्यों लगता है कि पहले से मिलकर आए हैं । तुममें से कौन मुझे इस समानता की दीवार को तोड़ने में मदद करेगा । चलो न एक बार के लिए किशोर कुमार और केदारनाथ सिंह और गुलज़ार से लेकर ग़ालिब तक को तिलांजलि दे आते हैं । हम फिर से जीते हैं । इन सब औज़ारों और सामानों के बिना जीते हैं । जीते हुए अपने शब्द बनाते हैं, उनसे अपनी कविता और गीत लिखते हैं ताकि किसी और की मोहब्बत के कोई भी निशाँ हमारे बीच न हो । हमारे बीच सर्फ़ हमारा और तुम्हारा गुज़ारा गया वक्त हो । वर्ना ये प्रेम मुझे प्रोडक्ट लगता रहेगा । हमारे बीच कई और चेहरे नज़र आयेंगे । कई और चेहरों में मैं नज़र आता रहूँगा । तुम नज़र आओगी ।
     
    मैं तुमको जीना चाहता हूँ । तुम्हारे साथ तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ । रोज़ तुम्हें एक ख़त लिखना चाहता हूँ । मोहब्बत सिर्फ पहली बार बोल देना नहीं है । पार्क और पेरिस घूम आना नहीं है । ‘टूगेदर’ होना नहीं है । एक वक्त है जिसे यूँ ही गुज़र जाने से रोक देना मोहब्बत है । वो कहाँ है । मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी आँखों में ख़ुद को देखो और मैं तुम्हारी निगाहों में ख़ुद को देखने के बाद बाहर जाऊँ । आइना क्यों है । हम कुछ तो साथ साथ रचते हुए मोहब्बत के उन पलों जी जायें जो किसी अपार्टमेंट बेचने वाले के ब्रोशर में न हो । कुछ तो मोहब्बत बचा होगा जो किसी काउंसलर के बताये फ़ार्मूले से बाहर होगा ।
     
    इस ख़त को तुम सब अपना ही समझना । बस एक ही तरह से मत पढ़ना । अलग अलग तरीके से लिखते हुए पढ़ना । मोहब्बत के दौर में हम मोहब्बत के सामान बन रहे हैं । उसके रचनाकार नहीं ।
     
    तुम्हारा, 
    रवीश कुमार