• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • PataNahiKyun

    पता नहीं क्यों !

    कुछ अच्छा नहीं लग रहा है । फ़ोन रखते समय उसकी आवाज़ मद्धिम और मायूस हो गई थी । पहले रिंग में उठाया तो उसका उत्साह अचानक बढ़ गया होगा लेकिन दो तीन पंक्तियों की बातचीत ने मुझे मायूस कर दिया है ।

     
    सर मैं आई आई एम सी, (भारतीय जनसंचार संस्थान) से बोल रही हूँ । हमारा फ़ेस्ट है इक्कीस फ़रवरी को । हम सब चाहते हैं कि आप आयें । एक पैनल डिस्कशन है । नहीं मैं नहीं आ सकता । छुट्टी पर हूँ । सर हम बडिंग जर्नलिस्ट को अच्छा लगेगा । इक्कीस नहीं तो बाइस को आ जाइये । किसी पैनल में मत रखो न आफिशियल करो । मन किया तो ऐसे ही आ जायेंगे । शाम के वक्त प्राइम टाइम से जूझ रहा था ऐसे न जाने कितने फ़ोन रोज़ काट देता हूँ मगर पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लग रहा है ।
     
    रास्ते भर सोचता रहा कि हाँ ही कर देते । वो क्या सोच रही होगी । फिर दुआ भी करने लगा कि एक दिन वो बहुत अच्छा करेगी । फिर सवाल उठा कि ऐसा विश्वास क्यों हो रहा है मुझे । पता नहीं । कहीं मैं खुद की सांत्वना के लिए उसे दुआ तो नहीं दे रहा । मैं दिखावे के लिए नहीं बल्कि प्रायश्चित्त के लिए लिख रहा हूँ । बुरा तो लगा ही है । 
     
    लेकिन क्या करें । दस दिनों की छुट्टी ली है । लोगों ने हर तारीख़ पर बुलाया है । सब दोस्त और महत्वपूर्ण ही होते हैं । मैं पहले भी फ़ेसबुक पर लिख चुका हूँ कि मुझे मत बुलाइये । क्या ये संभव है कि मैं छुट्टी के दौरान हर दिन सेमिनार में जाता रहूँ । हैरानी होती है कि फ़ोन करने वाला ये क्यों नहीं कहता कि अरे फिर रहने दीजिये । विश्व पुस्तक मेले में जा तो रहा हूँ पर क्या ये ज़्यादती नहीं है । क्या मेरे लिए सम्भव है कि हर रोज़ कहीं भाषण देने जाऊँ । जहाँ जाता भी हूँ वहाँ से ख़ुश कभी नहीं लौटा । उससे पहले का दिन तैयारी में चला जाता है और वहाँ जाकर देखता हूँ तो लोग संस्मरणों का ठेला लिये जेब में हाथ डाले चले आ रहे हैं । मेरी पूरी छुट्टी इसी में जा रही है ।  
     
    मुझे लेकर छात्र कुछ ज़्यादा उदारता बरतते हैं । मुझसे मिलने कुरुक्षेत्र के पत्रकारिता के छात्र खुद से जीप भाड़ा या अपनी गाड़ी लेकर दफ्तर आ गए । हमलोग की रिकार्डिंग में शामिल होने के बहाने । जल्दी में निकल रहा था कि आवाज़ आई कि सर हम लोग चार बजे सुबह के निकले हैं । आपसे मिलने के लिए । इतनी शर्म आई कि बता नहीं सकता । फिर सबके साथ चाय पी लेकिन उनकी हैरान आँखों में खुद को नापता रहा । क्या सही में मैं ? ये बच्चे अपने टीचर से ख़त लिखवा कर आये थे कि कुरुक्षेत्र आइये । मैं मना करता रहा । कहाँ से वक्त निकालूँ । मैं ऐसा जीवन न जीना चाहता था न अब अच्छा लगता है । बस में होता तो हर जगह चला जाता । 
     
    हिन्दी पत्रकारिता अपने किसी भी काल में औसत ही रही है । दो चार अपवादों को छोड़ कर । कम से कम मैं उसी औसत का प्रतिनिधित्व करता हूँ । यह बात किसी विनम्रता में नहीं बल्कि जहाँ है जैसा है के आधार पर कह रहा हूँ । मैं घिस चुका हूँ । मेरे पास कहने के लिए कुछ नया नहीं है । इतनी आत्म स्वीकृति की अनुमति तो मिलनी ही चाहिए । आप अगर मेरे किसी कार्यक्रम को ज़रा दूर से देखेंगे तो समझ पायेंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ । छात्र को भी पता चल जाता है कि इम्तहान में चालीस नंबर की जगह पचहत्तर मिले हैं । 
     
    हिन्दी मीडिया और भाषा बोली एक फ़ालतू विषय है बात करने के लिए । कम से कम जिस तरह से इस पर बात होती है । मुझे लगता है तो इसलिए नहीं कि दूसरों पर कह रहा हूँ बल्कि खुद इस सतही निरंतरता का सहयात्री हूँ । मुझे डर लगता है कि कोई मुझे विशिष्ठ नज़र से देखता है । शुरू में ज़रूर अच्छा लगा मगर जल्दी ही समझ गया कि ये मेरे लिए घातक है । यही मुझे जहाँ हूँ वहीं बाँध देगा । साल भर हो गया कुछ नया पढ़ें सोचे । क्या बोलेंगे । मुझे सही में बुलाना बंद कर दीजिये । जो लोग जाते हैं मैं उनकी सराहना करता हूँ । जाना चाहिए लेकिन मुझे छोड़ दीजिये प्लीज़ । कहाँ से समय निकालें । होता तो चला भी जाता ।  उफ्फ ।
     
    पर आज सही में उस छात्रा के लिए अफ़सोस हो रहा है । लग रहा है कि कम से कम दो चार लाइन और बात कर लेता । नाम ही पूछ लेता । मिलेगी या नहीं पता नहीं लेकिन दिल से उससे माफ़ी माँगता हूँ । आय एम सारी मैम । आप जीवन में बहुत अच्छा करें । लीजिये एक मित्र का एस एम एस आ ग़या कि क्या मैं इक्कीस बाइस फ़रवरी को लखनऊ एक सेमिनार में जा सकता हूँ !! गुडनाइट ।
    • Abhinav Singh

      Celebrity ki zindgi ko bahut kam log hi samajh pate hai… waise Ravish ji to hai hi mitti se jude insan