• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • mAHABHARAT

    जय का महाभारत..

    जय पिछले कई दिनों से वीकेंड का इंतज़ार कर रहा था |  वैसे तो किसी फरमाइश या ज़िद्द के लिए मेरा बेटा कभी किसी दिन का इंतज़ार नहीं करता लेकिन इस बार बात एक मूवी देखने की थी |  सो शनिवार शाम को हम ऑफीस से लौटे नहीं कि जनाब अपने डिमांड चार्टर के साथ गेट पर तैयार खड़े थे |  गाड़ी खड़ी करते ही आँखों में एक चमक के साथ जनाब ने प्रस्तावित भी कर दिया, ” महाभारत लग गयी थियेटर में, देखने चलो |”

    आप जय से मिले नहीं हैं वरना समझ जाते की जब वो अपनी बड़ी बड़ी आँखों को चमका कर कुछ मांगता है तो मना करने की हिम्मत कम से कम मुझमे तो बिलकुल नहीं होती |  खैर फिर भी कोशिश तो करनी ही थी |  आखिर कड़ाके की ढंड में कौन निकले घर के बाहर |  एक तो ऐनिमेशन मूवी, फिर महाभारत और वो भी २ घंटे ७ मिनट !  उसे पटाने की कोशिश में अगली सुबह फन-सिटी में गेम्स खिलाना भी जोड़ दिया मगर वो अपने डिमाण्ड चार्टर से नहीं डिगा, उसे तो  सिर्फ महाभारत देखना था और वो भी उसी दिन…..

    टिकट खरीद कर मल्टीप्लेक्स थिएटर में घुसते ही मेरी हंसी छूट गयी |  कुल 5 लोग थे 150 सीट के हॉल में !  दो जोड़े जो काफी पीछे गोल्ड केटेगरी में अंधेरा कोना ढूंढकर बैठे थे, एक बुजुर्ग अंकलजी जो शायद सर्दी से बचने के लिये मूवी देखने आये थे और हम – जय और मम्मी |  जय ने पूछा, “मम्मा सब लोग कहाँ हैं?”  मैने थोड़ा रीज़न आउट किया, ” वो लोग ना कल आयेंगे गुडमॉर्निंग में, अभी ढंड जो है।”  लेकिन अगले ही पल उसके मासूमियत भरे पलटवार सवाल से निरुत्तर हो गये – ” लेकिन मम्मा बाहर तो बहुत लोग थे |”  …असल में बाकी के सभी स्क्रीन्स पे धूम-३ हॉउस-फुल चल रही थी |  विडंबना की महाभारत देखने आये लोगों की गिनती पांडवों के बराबर ही थी और धूम-३ वालों की संख्या कौरवों से भी कहीं ज्यादा..!!

    ख़ैर फिल्म का समय हुआ |  जैसे ही जन-गण-मन शुरू हुआ जय ने बोला, “मम्मा अटेन्षन खड़े होना हैं…. सही।” मैंने भी अच्छी मम्मा की तरह जय की आज्ञा का पालन किया |

    फिल्म शुरू हुई और इंटर्वल कब हुआ पता ही नहीं लगा |  महाभारत की कहानी शुरू हुई कुन्ती और कर्ण के जन्म से, फिर ५ पांडव, १०० कौरव, गुरुद्रोणाचार्य के गुरुकुल की दीक्षा और फिर राजकुमारों के पराक्रम का दृश्य… भीम और दुर्योधन तक ठीक था, फिर आया कर्ण का अंगराजअभिषेक और अर्जुन से मुक़ाबला |  सब बस २० मिनट में !  बड़े ही साफगोई और धाराप्रवाह में कहानी बिना अधिक समय लिए आगे बढ़ती गयी |  जय के पूछे कई सवालों में एक ही का जवाब मुश्किल था – सूतपुत्र और क्षत्रिय में क्या अंतर है ?

    लाक्ष ग्रह में आग से भीम का हिडिंबा से विवाह,  तेल के कुण्ड में परछाई देख कर मछली की आंख का निशाना, सब कमाल !  बहुत सफाई से बनाया गया है |  हर सीन में फिल्मकार का अथक परिश्रम झलकता है |  बस द्रौपदी और कृष्ण के डील-डौल पर थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था |  द्रौपदी थोड़ी और सुन्दर और छरहरी दिख सक्ती थी,  कृष्णा थोड़े और आकर्षक |

    द्रौपदी का दंभ, युधिष्ठिर का अभिमान, दुर्योधन का आक्रोश, शकुनि के पासे, द्रौपदी का चीर-हरण और धृतराष्ट्र की चुप्पी…. युगों पुरानी ये कथा आज भी उतनी ही तर्कसंगत लगती है जितनी की तब, फ़र्क़ बस इतना है की तब द्रौपदी की प्रार्थना सुनकर लाज बचाने वाले श्रीकृष्णा थे और आज स्वयं द्रौपदी को ही दुर्गा रूप धारण करना पड़ता है। उस युग की पांचाली के चीर-हरण के सब मूक दर्शक थे और आज भी हालात बदले नहीं हैं… नारी की अस्मिता हर युग में दांव पर लगती रही है।.. .क्यों…. समझ नहीं आता…..

    भीम का सौ हाथियों का बल और अर्जुन का गांडीव आ जाये तो कुरुक्षेत्र कहाँ दूर होगा |  गीता के उपदेश में परमातमा और आत्मा का दर्शन किया लेकिन उस के बाद सिर्फ कुरुक्षेत्र था, जहां भीष्म पितामह अपने चहेते अर्जुन के बाणों की शैया पर लेटे थे, किशोर अभिमन्यु का धोखे से वध था, दानवीर कर्ण का महादान था, कुरुक्षेत्रा की रक्त पिपासा दुशासन और दुर्योधन के रक्त से ही शांत हुई |

    जय तो अभिमन्यु के वध के बाद ही इतना डर गया कि अपनी आँखें बंद कर कानों पर हथेलियाँ रख ली, इतनी ईर्ष्या, इतनी नफरत उसे समझ ही नहीं आ रही थी |  बस यही डर लगा कि १८ दिन के कुरुक्षेत्रा से मेरा ६ साल का जय इतना भयभीत है तो आज के युग कि हिंसा से उसका क्या होगा । …बस तभी उसके लिये एक आशीर्वाद चुन लिया…. निर्भयभव: !!!

    ये मूवी एक ज़बरदस्त कोशिश है हमारी एक पौराणिक धरोहर को सिनेमा पर उतारने का |  एनीमेशन में थोड़ी और सुधार की गुंज़ाइश है, लेकिन व्वॉइस-ओवर ज़बरदस्त दिया गया है |  अमिताभ बच्चन (भीष्म), अजय देवगन (अर्जुन), मनोज वाजपयी (युधिष्ठिर), सन्नी देओल (भीम), जैकी श्रॉफ्फ़ (दुर्योधन), अनुपम खेर (शकुनि), अनिल कपूर (कर्ण), विद्या बालन (द्रौपदी) ,सब किरदारों की आवाज़ ने फिल्म में जैसे प्राण फूक दिये |

    जाइये ज़रूर देखिये ये महाभारत |  किसी भी 100 करोड़ क्लब से कहीं बेहतर है…

    Monika Garg

    HR professional. Skill Development enthusiast. An out & out Chandigarian.
    • Akhil Singh

      सुंदर, ख़ूबसूरत और बेेहतरीन । सिनेमा नहीं आपका चित्रण ।