• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • "धुंधली सी तस्वीर का बच्चा" ..तेरी याद के सदके !

    परीक्षा में कम आये अंक, घर वालों की डांट और अपने गिरते स्वास्थ्य से परेशान होकर निकल पड़ा था चम्बल नदी के किनारे बैठने.  जब भी मैं टूट जाया करता मेरा वही ठिकाना हुआ करता था.. खुद से बातें करता, कुछ खुद से वादा करता, फिर पास खड़े शिवजी और माँ दुर्गा से कई शिकायतें करता और लौट आता.

    “भाई ज़रा पाँच रुपये के पोहे देना..” मैंने बस स्टॉप पर एक दुकानदार से बोला. पोहे का स्वाद लेते-लेते मैं फिर खुद को टटोलने में खो गया.  मेरी तन्द्रा तब टूटी जब एक छोटा बच्चा(जो लिबास से कोई भिखारी लग रहा था) मेरी पैंट खींच कर दुकान की तरफ इशारा करके मुझसे कुछ दिलवाने को कह रहा था.  एक गज़ब का आकर्षण था उसके चेहरे में.  मैंने सोचा छोटा बच्चा शायद जलेबी मांग रहा होगा..  मैंने दुकानदार से सौ ग्राम जलेबी देने को कहा..  लेकिन वो छोटा बच्चा पता नहीं क्यों रूठ कर चला गया और कुछ ही देर बाद अपनी माँ को बुला लाया..  उसकी माँ ने कहा कि उसे समोसे चाहिए..  ज्योंही उसे समोसे मिले वो यूं मुस्कुराया कि जैसे उसे ज़िन्दगी की सारी खुशियाँ मिल गयीं हों और ख़ुशी से पागल होकर वो दौड़ता हुआ दूर चला गया वो.

    उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा जादू था कि मेरे उदास पड़े होंठ भी मुस्कुरा उठे और मुझे एक अजब सी संतुष्टि मिली. अब इसे इत्तफाक कहूं या उसकी दुआ.. कुछ ही दिनों में लगभग सारी मुश्किलें दूर हो गयीं और फिर से मैं जीना सीख गया.

    यहाँ कॉलेज आया तो कुछ वही हुआ जो शायद हर जवां दिलों के साथ  होता है.. मैं भी किसी से मोहब्बत कर बैठा.. डूब कर चाहा और खो गया उस इश्क को हमेशा के लिए अपनी जिंदगी में लाने में…  पर जब दिल टूटा और हकीक़त का एहसास हुआ तो आंसुओं के सैलाब के साथ सपने भी धुल गए.

    जब भी दर्द बेहद हो जाता है तो पास के मंदिर में चला जाता हूँ.  खुद से बाते करता हूँ और भगवान् से यही मांगता हूँ कि फिरसे मुझे उस मासूम बच्चे से मिला दे जिसकी मासूम मुस्कुराहट की दुआ से मैं अपने सारे ग़मों को भुला कर शायद फिर से जीना सीख जाऊं.

    उस बच्चे ने मुझे ये यकीन तो जरूर दिला दिया कि जिंदगी में ख़ुशी उन्हें नहीं मिलती जो अपनी शर्तों पे इसे जीते हैं, बल्कि ख़ुशी उन्हें मिलती है जो दूसरों की ख़ुशी के लिए अपनी शर्तें बदल देते हैं.

    मैंने भी अपनी कई शर्तें बदलीं और खुद को दुआओं का तलबगार बना लिया क्योंकि मुझे ये यकीन हो गया कि जिंदगी में आगे बढ़ना है तो दुआ लेते रहो.

    कुछ तो बात जरूर थी उस बच्चे की मासूमियत में, जिसने मुझे जीना सिखा दिया.  हाँ, उसे आज भी ढूंढता हूँ कि शायद वो फ़रिश्ता जिंदगी के किसी मोड़ पर फिर से मुझे मिल जाए….!!

    उम्मीद है आप भी मेरे लिए ये दुआ जरूर करेंगे..!!