• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Mexico

    दुनिया के इस पार तक…

    (युवा कथाकार श्रीकांत नौकरी के सिलसिलों में मैक्सिको सिटी गए हुए हैं.  विदेशी-ज़मीन पर अपने अनुभवों और संस्मरण को श्रीकांत एक्सप्रेस-टुडे से निरंतर साझा करेंगे.

    पेश है इसी यात्रा-क्रम का प्रथम चरण जिसमें हमारे लेखक भारत से कूच कर मेक्सिको की भूमि पर कदम रखते हैं. अपनी यात्रा की बारीकियों को संजो कर लेखक ने हमारे समक्ष रख दिया है.

    उम्मीद है आप श्रीकांत के वृतांत का पूर्ण आनंद लेंगे…)

     

    बहुत लोगों के लिए यात्राएँ रोजमर्रा की आम बातों की तरह होती हैं. विमान के भीतर का मेरा पड़ोस ऐसे ही लोगों से भरा था. यह जानने के लिए उनसे पूछताछ करने की ज़रुरत नहीं थी, एअरपोर्ट की सुरक्षा जांच से लेकर विमान में अपनी जगह पर बैठने तक के प्रक्रम में उनका सहज रहना देखकर ही इस बात का एहसास हो जाता था. ऐसे लोग कम ही थे जिनकी नज़र खिड़की पर ही चिपकी रहे. उन्हीं कम लोगों में से एक मैं भी था.

    विमान ने जब हहराती रफ़्तार में भागते हुए उड़ान भरी, उस वक्त भारतीय समय के अनुसार भोर के साढ़े तीन बज रहे थे. दिल्ली शहर कुछ ही क्षणों में अन्धकार के समुद्र में तैर रही दीयों की थाल बन गया, और चंद मिनटों में ही कहीं पीछे छूट गया. आगे, हम हरियाणा और पंजाब की भूमि के ऊपर कहीं से गुजरते रहे, जहां से मैं यह उम्मीद लगाये बैठा था कि कहीं तो कुछ दिखेगा, रौशनी सरीखा. हरियाणा चूक गया तो पंजाब के हिस्से से सही, कोई शहर नहीं तो किसी कस्बे की सड़क के किनारे जलता कोई लैम्पपोस्ट या किसी उत्सवधर्मी गाँव से प्रकाश का एक छोटा सा गुच्छा ही सही. लेकिन हाथ लगी निराशा. इस पूरे दौर में मैं अपनी सीट से थोडा उचककर खिड़की के शीशे पर आँखें चिपकाए प्लेन के ठीक नीचे देखने की कोशिशों में तत्पर था. कुछ इस तरह, मानो बनारस, इलाहाबाद या लखनऊ शहर की किसी सघन बस्ती के मकान के चौथे माले पर रहने वाली लडकी खिड़की की ग्रिल पकड़कर ठीक नीचे खड़ी उस लड़के की साइकिल देख लेना चाह रही हो जो उसे पसंद करता है. बहरहाल, मेरी ऐसी तमाम कोशिशों से जो कुछ भी मुझे दीख रहा था वह महान अँधेरे को जरा सा धूमिल करती चाँदनी के बीच नीचे की ओर जाती अनंत गहराई की सुरंग थी. मुझे याद आया कि यह उन अनेक डरावने सपनों में से किसी एक का यथाचित्र है जिन्हें मैं बचपन में बहुतायत में देखा करता था. जिनमें रिक्तता के अनंत में अन्धकार के भीतर सनी अजीब सी आकृतियाँ हुआ करती थीं और जिनमें से किसी भी आकृति ने कभी भी जादू की छड़ी ली हुई जगमगाती परी का रूप नहीं लिया, जो मुझसे पूछे कि बोलो तुम्हें क्या चाहिए? यूं विमान के अन्दर होते हुए सपने के उस यथाचित्र से मुझे ऐसी कोई अपेक्षा नहीं थी, सिवाय इसके कि किसी शहर की कोई शिनाख्त मिल जाय.

    इस बीच मेरे पडोसी सहयात्री ने सामने वाली सीट की खोल पर चिपकी एक डिजिटल स्क्रीन को चालू कर लिया, जिस पर कि पहले मेरा ध्यान नहीं गया था. इससे पहले मैंने विमान से कुछ अन्तःदेशीय यात्राएँ की थीं, लेकिन उनमें ऐसी तकनीक मुझे कतई नहीं मिली. मैंने जल्दी से उस स्क्रीन के फीचर्स की पड़ताल कर डाली और पाया कि उसमें अंग्रेजी और डच भाषा की फिल्मों और संगीत के अलावा विमान की वर्तमान अवस्थिति को बताने वाला रूट मैप भी है. मैं रूट मैप वाले स्क्रीन को चालू कर विमान की बढ़ती गति के सापेक्ष नीचे के भूगोल की कल्पनाएँ करने लगा. बीच बीच में उचककर खिड़की से परे भी देख ले रहा था. विमान की पचास प्रतिशत से अधिक की आबादी अपनी सीट्स पीछे की झुकाकर सो चुकी थी. जागने वालों में मेरे अतिरिक्त मेरे पडोसी सहयात्री भी थे. एक-आधी बार मेरी तरफ देख लेने के उनके अंदाज़ से जाहिर हो रहा था की मेरी हरकतें उनकी नजर में बचकानी हैं. ऐसा महसूस करने के बाद भी मुझे लगा कि इससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा. मैंने रूट मैप पर विमान के मार्ग से थोडा हटकर चिन्हित पेशावर शहर को देख जान लिया कि हम पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की उत्तरी सीमा के आस पास से गुजरते हुए अफगानिस्तान की हवा में प्रवेश करने वाले हैं. इस भूखंड से मुझे वैसी कोई उम्मीद न रही, जैसी पीछे छूट रहे भारत और फिर लाहौर के आस-पास के पाकिस्तान वाले हिस्से से थी. अन्धेरा बदस्तूर कायम रहा. अफगानी आसमान में बादल न होने के कारण अँधेरे की सुरंग मानो और भी गहरी हो गयी हो. विमान जब काबुल शहर के बगल से गुजर रहा था तो अनायास अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमलों की याद आयी. आसमान के उसी हिस्से से, या हो सकता है कि ठीक उसी बिंदु से रेगिस्तानों में खरगोश और बकरियों की तरह छुप रहे लोगों पर गोले बरसाए गए हों, क्या पता कि धमाकों को चीरती हुई कोई चीख उस ऊंचाई तक भी पहुँची हो जहाँ से हम गुजर रहे थे.

    अफगानिस्तान के बाद तुर्कमेनाबत नाम का शहर. वहाँ के भूगोल के बारे में कुछ न जानते हुए भी मैंने अनुमान कर लिया कि नीचे की जमीन तुर्कमेनिस्तान कहलाती होगी. एक जरा देर की दूरी के बाद उज्बेकिस्तान और फिर कजाकिस्तान. कजाकिस्तान का अंदाजा रूट मैप पर आक्ताऊ शहर के उल्लेख से लगा जिसके बारे में मैंने कहीं पढ़ रखा था कि वह कैस्पियन सागर के किनारे पर स्थित है. कैस्पियन सागर पार कर रूस की सीमा के ऊपर दाखिल होने तक हमने लगभग साढ़े तीन घंटे का सफ़र तय कर लिया था. मतलब भारतीय समय के अनुसार उस वक्त सुबह के सात बजे होंगे. मतलब भरपूर रौशनी वाली एक सुबह. लेकिन रूस का आसमान फिर भी काला, गहन काला. मतलब गोल पृथ्वी की परिधि का चक्कर काट रहे हमारे विमान के बहुत पीछे छूट रही सुबह, जो ताबड़तोड़ हमारी ओर बड़ी आ रही थी. इस तरह पृथ्वी के गोल होने की परिकल्पना को व्यवहार रूप में महसूस करना रोमांचक था. और यह सोचना भी कि सूरज हमारा पीछा कर हमें पकड़ पाने की कोशिशों में है और हम, फिर भी, उसकी पहुँच से घंटों दूर.

    रूस की यूक्रेन से लगती सीमा के करीब पहुंचने पर किसी पुच्छल तारे की पूँछ की मानिंद धुंधली रोशनी वाला एक भूखंड दिखा, स्क्रीन उस जगह को मिलरोवो नाम दे रहा था. जाहिर तौर पर यह रूस का यूरोप में पड़ने वाला हिस्सा था. मेरे द्वारा तय किये गए पूरे तथा अपने आप में लगभग एक चौथाई एशिया को अँधेरे में देखने के बाद यूरोप में दाखिल होते ही रोशनी के दिख जाने ने मुझे इस बात को अपने कहे जाने वाले महाद्वीप की नियति के बारे में सोचने पर विवश कर दिया. यहाँ मुझे एशिया के प्रति पश्चिमी महाद्वीपों के उपेक्षापूर्ण बर्ताव से अधिक भारत समेत अपने पड़ोसी देशों की रूधिग्रस्त जीवन शैली पर अफ़सोस हो रहा था, जहाँ रात के समय को सक्रिय जीवन का हिस्सा शायद इस पूरी सदी में भी न माना जा सके. मुझे पूरा यकीन था की रात के अँधेरे के बचे हिस्से में अब मुझे ऐसी रौशनियाँ अब दिखती रहेंगी. यूक्रेन के बाद बेलारूस आया, और हर पंद्रह-बीस मिनट के अंतराल पर उजाले का कोई न कोई टिमटिमाता टुकड़ा दीखता रहा. पोलैंड की राजधानी वर्सा हमारी यात्रा के रात वाले हिस्से का सबसे रौशन पड़ाव रहा. रूट मैप के अनुसार वहाँ से उत्तर की दिशा में चेक गणराज्य का प्राग शहर था. प्राग शहर को मैं सिर्फ निर्मल वर्मा की वजह से जानता था. ‘वे दिन’ उपन्यास के भीतर रचा बसा प्राग मेरी दृष्टि सीमा से बस थोड़ी सी दूरी पर लोगों की आँखों में भोर की मीठी नींद भर रहा होगा. काश, एक झलक मिल जाती उसकी.

    पोलैंड के सीमान्त तक पहुँचते पहुँचते क्षितिज के अँधेरे के बीच एक फांक भर लाली दिखने लगी. मतलब रात और दिन के बीच का वह समय जिसके लिए प्रसाद ने ‘अम्बर पनघट में डुबो रही तारा घाट उषा नागरी’ लिखा है. कुल मिलाकर अब हम सूरज की पकड़ से बस थोड़ी दूर थे. सामान्य परिस्थितियों में उसके बाद चीज़ों को उनके असली रंग का दिखलाने लायक सुबह होने में दस से पंद्रह मिनट का वक्त लगता. वैज्ञानिक गणना के अनुसार साढ़े आठ मिनट सूर्य की पहली किरण के पृथ्वी तक पहुँचने के लिए, बाकी के साढ़े सात मिनट बाकी किरणों के जगहों और चीज़ों के भीतर तक घुसकर अपनी जगह ले लेने के लिए. लेकिन आसमान में लाली अर्थात ऊषा के अवतरण के बाद, हमारे लिए सुबह होने में कम से कम एक घंटे का वक़्त लगा. अँधेरे और रौशनी की द्विविधा के बीच बर्लिन भी पीछे छूट गया. यूरोप की सतह पर उगी वनस्पतियाँ थोड़ी थोड़ी स्पष्ट होने लगीं. मैं कुर्सी की स्क्रीन से नज़र हटाकर वापस खिड़की पर चिपक गया. यूरोप नामक महाद्वीप ही खूबसूरत था या हर अजनबी आसमान से दिखने वाली पृथ्वी ऐसी ही खूबसूरत दिखती है, मुझे नहीं पता, पर मैं देखे जा रहा था. पायलट ने जिस वक्त एम्सटर्डम शहर के करीब आने का ऐलान किया तब तक यूरोप की सतह पर पक्की तौर पर सुबह उतर आई थी. विमान धीरे धीरे नीचे की ओर उतरने लगा. जिस ऊँचाई से पृथ्वी की सतह साफ़ दिखने लगी, मुझे दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था. यह विशाल जलराशि नीदरलैंड के मानचित्र में अन्दर तक घुसे हुए उत्तरी सागर यानी नार्थ सी की थी, जिसके किनारे पर एम्सटर्डम बसा हुआ है. उत्तरी सागर से लगकर बहती एम्स्टेल नदी का चौड़ा पाट समुद्र को शहर में घुसता हुआ दिखा रहा था. एम्स्टेल नदी से फूटती अनेक नहरें एम्सटर्डम शहर के अंग-अंग पर गहने की तरह लिपटी हुई थीं. मैं पृथ्वी के इस खूबसूरत टुकड़े के सौन्दर्य पान में कुछ इस कदर मशगूल था कि अपने पडोसी द्वारा बोले एक छोटे से वाक्य पर ध्यान नहीं दे पाया. उन्हें दूसरी बार मुझसे पूछना पड़ा, ‘पहली बार पहुँच रहे हैं एम्सटर्डम?’ मैंने हाँ में जवाब देते हुए उनसे उन तमाम नहरों के बारे में पूछ डाला, उन्होंने ही बताया की एम्स्टेल नदी से निकली नहरे हैं तथा इस शहर का नाम ‘एम्स्टेल’ और ‘डैम’ (बाँध) से मिलकर एम्सटर्डम बना है. विमान ने जब धरती को छुआ तब उन्होंने बताया कि एम्सटर्डम शहर समुद्र तल से दो मीटर नीचे बसा है. यह मेरे लिए एक और चौंकाने वाले तथ्य था.  

    एम्सटर्डम के शिफोल एअरपोर्ट पर उतरने के वक्त वहां सुबह के साढ़े सात बजे थे और दिल्ली से वहां तक की यात्रा में हमें साढ़े सात ही घंटे भी लगे. एयरक्राफ्ट से उतरकर मै सीधा यूरोप की मिट्टी पर कदम रखना चाहता था, लेकिन विमान के दरवाज़े पर ही एक सुरंगनुमा मार्ग लगा दिया गया था, जिसमें चलकर हम एअरपोर्ट के अन्दर पहुँच गए.