• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
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    दुनिया के इस पार तक…(२)

    विमान से उतरकर एअरपोर्ट में दाखिल होने पर फिर से एक सुरक्षा जांच. पर इसमें कोई ख़ास समय नहीं लगा, क्यूंकि सारे लोग सिर्फ दो-एक हैण्ड बैग्स के साथ ही थे. मुझे एम्सटर्डम में सात घंटों के लिए रुकना था, अगली उड़ान दिन में दो बजकर पैंतीस मिनट की थी. मैंने एअरपोर्ट की सीमा से बाहर निकल शहर को ताक आने की कोशिश की. सुरक्षा-कर्मियों ने यह कहे हुए मुझे बेरहमी से एअरपोर्ट में अन्दर की ओर वापस कर दिया कि मेरे पास शेनेगन वीसा नहीं है, जो कि यूरोपियन यूनियन के देशों में भ्रमण के लिए ज़रूरी था. मैं एअरपोर्ट के जिन-जिन कोनों में जा सकता था, वहाँ जाकर एम्सटर्डम की मिट्टी, वनस्पतियों, सड़कों और पहाड़ों को देखने की कोशिश करने लगा. ग्यारह बजे के आसपास मैंने महसूस किया कि मैंने पिछले तीस से अधिक घंटों से सोया नहीं हूँ और अब आँखें किसी भी तरह की विलक्षणता या सौन्दर्य को जज़्ब कर पाने में असमर्थ हो रही हैं. मैं विश्राम कक्ष की कुर्सी पर बैठे बैठे सो गया. दो बजे तो जेब में रखे मोबाइल का अलार्म गुनगुना उठा. लोग मैक्सिको सिटी की उड़ान के लिए जुटने लगे थे. थोड़ी देर बाद विमान की तरफ प्रस्थान करने की घोषणा हुई और मैं पंक्ति में पहला हुआ उधर जाने वाला.

    आगे की यात्रा के लिए विमान में बैठते हुए मैं अंतर्राष्ट्रीय नियमों के प्रति गहरा गुस्सा महसूस कर रहा था, जिनकी वजह से मैं शिफोल एअरपोर्ट में कैदी बनकर रह जाने के अलावा यूरोप की मिट्टी तक से भी दीदार नहीं कर पाया था. विमान के भीतर मेरे आस पास से लेकर दूर तक अपनी अपनी सीट्स ले रहे लोगों को देख, उनकी भाषा आदि सुनते हुए पहली बार मेरे जेहन में ‘विदेश’ जैसा ख्याल आया. सारी घोषणाएं पहले स्पैनिश, फिर डच और आखिर में अंग्रेजी में होनी शुरू हो गईं. दिल्ली से एम्सटर्डम के बीच भाषा के विकल्पों में हिन्दी भी थी. हालांकि मुझे ठीक ठाक अंग्रेजी के साथ काम चलाऊं स्पैनिश भी आती थी, लेकिन फिर भी इतने सारे दिन हिन्दी के बिना गुजारने की कल्पना ने मुझे असहज सा कर दिया था. हिंदी के बाद की अगली करीबी भाषा मेरे लिए अंग्रेजी ही थी. मैंने सोच लिया की जहां तक चलेगा, आगे अंग्रेजी ही बोलूँगा. मैं एयर होस्टेस से पानी मांगने से लेकर बाथरूम तक जाने के लिए पडोसी सहयात्री से थोड़ी सी जगह गुहार तक के लिए भी अंग्रेजी का इस्तेमाल करता रहा. उड़ान भरने के बाद जल्द ही हमने यूरोप के शेष भूखंड, यानी इंग्लैंड और आयरलैंड को पार कर लिया और उत्तरी अटलांटिक महासागर के मुख्य प्रवाह के ऊपर आ गए. अटलांटिक के बारे में मैंने सुन और पढ़ रखा था कि यह सबसे अधिक अशांत और उग्र महासागर है. कैटरीना, वेंडी और ऐसे अनेक नामों वाले सबसे उपद्रवी तूफ़ान इसी महासागर की कोख से उठते रहे हैं. अनेकों पनडुब्बियों तथा जहाज़ों को निगल लेने वाला ‘डेविल्स’ अथवा ‘बरमूडा ट्रायंगल’ इसी अटलांटिक का एक हिस्सा है. तथा कुछ ही वर्षों पहले ब्राजील से फ्रांस जाने वाले एयर फ्रांस के विमान को इसी अटलांटिक के आसमान और फिर पानी ने मिलकर लील लिया था. जाहिर तौर पर इन सभी तथ्यों के मष्तिष्क में प्रकाशित रख यात्रा करते हुए मैं अटलांटिक से डरा हुआ था, और चाहता था कि कुछ और लम्बी दूरी की शर्त पर ही सही लेकिन हमारा विमान और अधिक उत्तर की ओर जाते हुए ग्रीनलैंड के ऊपर के आसमान में उड़े. दिन की भरपूर रौशनी हमारे साथ थी और ऊपर से देखने पर बादलों की झीनी परत के हस्तक्षेप के बीच से सिर्फ नीले रंग की सतह दिख रही थी. बीच बीच में कुछ द्वीप भी आते रहे, जिनके बारे में विमान के रूट मैप में भी कोई ज़िक्र नहीं होता था, और समुद्र और उनके बीच में पड़े विशालकाय चट्टान और भूखंड धूप में नहाते हुए बेहद खूबसूरत दीखते रहे. सूर्य और हमारे बीच का खेल दिल्ली से एम्सटर्डम की यात्रा के दौरान चले खेल के विपरीत चलने लगा. मतलब इस बार आगे आगे सूर्य और पीछे पीछे हम. सूर्य की कोशिश की वह जल्दी से पश्चिम की ओर बढ़कर शाम और रात करे, और हम भी उसी की तर्ज पर पश्चिम की ओर बढ़ते जाते हुए. मेरे लिए दहशतनाक अटलांटिक को पार कर जब हम कनाडा के आसमान में दाखिल हुए, उस वक़्त का सूरज लगभग साढ़े चार बजे वाला रंग दिखा रहा था. हम न्यू ब्रून्स्वीक शहर, यानी कनाडा के सीमा में जरा सा घुसने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू हैम्पशायर और न्यूयार्क के ऊपर उड़ने लगे. वर्जीनिया, टेनेसी और अल्बामा प्रान्तों को बारी बारी से पीछे छोड़ते हुए हम एक बार फिर से बदनाम अटलांटिक के उस हिस्से के आसमान में दाखिल हुए जिसे मैक्सिको की खाड़ी के नाम से जाना जाता है. यहाँ तक पहुँचते पहुँचते सूरज फिर से हमसे जीतने लगा और आसमान कैरेबियाई शाम के लिए लाल रंग पहनने लगी. इससे आगे के भूगोल के बारे में मुझे कुछ ख़ास नहीं पता था. आखिर के तकरीबन एक घंटे का सफ़र ‘जल्दी से मैक्सिको सिटी’ आ जाने की मानसिक गुहार, ऊब और ढेर सारी थकान के बीच बीती. शाम के बाद रात का अँधेरा छाने लगा, और पता ही नहीं चला की समुद्र का हिस्सा कब बीत गया. मैक्सिको की धरती का जो हिस्सा सबसे पहले हमारे नीचे आया वह वेराक्रूस ना

    • Anuradha

      nicely written, most of the travel journals are written in English only, the language closest to our heart next to Hindi (as the writer would agree). the air travel was interesting almost real as if i was also traveling along looking at the stars and trying to look at earth below…..

      awaiting more……