• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Voter

    तुम्हारा जात क्या है वोटर !

    इक्कीसवीं सदी के चौदह साल बाद इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए हो रहे चुनाव नया लगते लगते पुराना लगने लगा है । यह चुनाव किसी नए भारत के लिए नहीं हो रहा है बल्कि इसमें वही जात-पात है वही खर-पतवार है । कांग्रेस बीजेपी ने जात-पात की राजनीति के ख़िलाफ़ एक ऐसा विकल्प पेश किया है जो कम विश्वसनीय लगता है । ये दोनों ही पार्टियाँ क्षेत्रीय दलों की आलोचना करती है मगर इन्हें उन्हीं जात पात वाले दलों से गठबंधन करने या विलय करने में कोई नैतिक संकट नहीं होता । ऐसे विलय महज़ चुनावी होते हैं । इनमें कोई स्पष्टता नहीं होती कि विलय कर रहे दलों ने जात पात की राजनीति का त्याग कर दिया है या क्यों राष्ट्रीय दलों ने इनके जात पात को अंगीकार किया है ।

     
    अब नरेंद्र मोदी की जीत किसी नए भारत की वजह से नहीं होने जा रही है । शायद मोदी और बीजेपी भी समझ गए हैं कि रैलियों और सेमिनारों के स्लोगन से चुनाव नहीं जीते जाते । जातिगत आधार ख़ज़ाना पड़ेगा । तभी तीन तीन चुनाव जीत चुके मोदी ने कभी अपने पिछड़ा होने की बात नहीं की और न चाय बेचने वाली अतीत का राजनीतिक इस्तमाल किया । पार्टी के कई नेता जातिगत आधार सर्च करने में जुट गए हैं । तभी यूपी जाकर बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कांशीराम को भारत रत्न देने का वादा कर बसपा के इस महान संस्थापक की विरासत पर अतिक्रमण करना चाहते हैं । इसे अंग्रेज़ी में ‘अप्रोप्रिएट’ करना कहते हैं यानी हड़पना । बसपा ने अनेक बार कांशीराम को भारत रत्न दिये जाने की बात की है । संजय पासवान दिल्ली बीजेपी मुख्यालय में बने अपने दफ़्तर में कांशीराम की तस्वीर भी लगाई हैं । उन्होंने जगजीवन राम पर भी किताब लिखी है जिसका नाम है राष्ट्रनिष्ठ बाबूजी ।इस किताब में दिलचस्प तरीके से जगजीवन क़ी राजनीति को हिन्दुत्व के फ़्रेम में फ़िट कर देते हैं । जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार कांग्रेस की सांसद हैं । मुझे नहीं मालूम की मीरा कुमार अपने पिता को हिंदुत्व के खांचे में देखती हैं या नहीं । वैसे उन्हें संजय पासवान की किताब का एक चैप्टर तो पढ़ना ही चाहिए जिसका शीर्षक है ‘ख़ून में बसा था हिन्दुत्व ‘ । आज की राजनीति में वैचारिक बहसें नहीं होतीं इसलिए ऐसी किताबें लोगों तक पहुँच कर भी चर्चित नहीं होती । कम से कम भरमाने की राजनीति का ख़ुलासा तो हो ।
     
    बहरहाल खबर आ रही है कि बीजेपी बिहार में कुशवाहा समाज के नेता उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन करने जा रही है ताकि ओबीसी मतदाता पार्टी की तरफ़ आ सकें । तो सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी की जीत बिना जातिवादी नेता उपेंद्र कुशवाहा के नहीं हो सकती क्या । उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति में ऐसा कौन सा राष्ट्रवादी तत्व है जिसके लिए बीजेपी चुनाव के समय ही हाथ मिलाना चाहती है । बीजेपी में कुशवाहा नेता नहीं है क्या ? उसी तरह पार्टी यूपी में भी अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल के सम्पर्क में हैं और ख़बरों के अनुसार अपना दल को बीजेपी में विलय की तैयारी चल रही है । क्या ये बीजेपी कांग्रेस का जातिवाद नहीं है । कांग्रेस ने भी यूपी विधानसभा चुनावों से पहले कुर्मी समुदाय में पकड़ रखने वाले नेता बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी से अपनी पार्टी में लाकर केंद्र में मंत्री बनवा दिया । ये और बात है कि कोई चुनावी लाभ नहीं हुआ ।
     
    क्या इन दलों पर अवसरवादी जातिवादी राजनीति का आरोप नहीं लगना चाहिए । ये पार्टियाँ राजनीत स्तर पर जात पात ख़त्म करने का जोखिम क्यों नहीं उठातीं । फिर इनके जात पात और दूसरे के जात पात में क्या अंतर है । अंग्रेज़ी अख़बार  इंडियन एक्सप्रेस से इंटरव्यू में बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि बिहार में पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग काफी बड़ा है । इस बहुसंख्यक समाज के बारे में बात करना ग़लत नहीं है । हम इनसे मोदी के पिछड़े होने और चाय बेचने की कहानी से राब्ता क़ायम करना चाहते हैं । सुशील मोदी कहते हैं एक सौ तीस जातियाँ हैं अति पिछड़ा समूह में । हम मतदाताओं की छतरी बनाना चाहते हैं जाति और धर्म से आगे । लेकिन उनके बयान से यह साफ़ नहीं होता है कि यह छतरी किस तरह से बिना जातिवाद के बन रही है । वे यह भी नहीं बताते कि मोदी की पहचान के अलावा कौन से वे मुद्दे हैं जिनसे वो पिछड़ावाद की राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । 
     
    बीजेपी और कांग्रेस को कहना चाहिए कि वे पिछड़ावाद ी राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । यह साफ़ हो ताकि पिछड़े और अति पिछड़े मतदाता भी फ़ैसला करें कि वे अपने राजनीतिक वर्चस्व की दावेदारी को छोड़ने के लिए तैयार है । बीजेपी में मोदी का उभार शायद एक और प्रक्रिया का उभार है जिसकी तरफ़ सुशील मोदी मतदाताओं की छतरी की बात से इशारा करते हैं । यही कि अब पिछड़ा नेतृत्व राष्ट्रवादी बीजेपी में भी उभर सकता है । बल्कि उभर चुका है । तभी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कहते हैं कि वे आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कहने वाले कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी की बात से सहमत हैं । जाति आधारित आरक्षित की समीक्षा होनी चाहिए । तो क्या आरक्षण का अधिकार गँवा कर देश का बहुसंख्य मतदाता पिछड़ा अति पिछड़ा और दलित बीजेपी के राष्ट्रवादी ढाँचे में विलीन होना चाहेगा । क्या बीजेपी सचमुच जात पात के ख़िलाफ़ लड़ रही है या कथित रूप से उसी जात पात के अंडे को अपने बाड़े में लाकर सेंकना चाहती हैं । आख़िर जब मोदी की लहर है तब अनुप्रिया पटेल या उपेंद्र कुशवाहा की ज़रूरत क्यों है । क्या बीजेपी को लगने लगा है कि स्वर्ण मतदाताओं की मुखरता लहर तो पैदा करती है मगर असर नहीं । इसीलिए मैं कहता हूँ कि  यह चुनाव हो तो रहा है जात पात पर ही । बाकी त जो है सो हइये है ।
    • Ankit Tiwary

      padhkar kafi khushi hui….ki ..koi to hai…..jo in sab bato ka virodh karta hai …..but ye opposition sirf election me hi kyu……??/…..education me kyu nai….jabki hum sab jante ha ki…”.education is the light of any country and children are the eyes of any country”……to fir shiksha me ye jat- pat kyu hai….kyu reservation diya jata hai…..election me jat-pat ka virodh karne wale log education me virodh kyu nai karte……….