• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country "ALWAYS". Loyalty to government, when it deserves it."
  • Ravish_

    टिकट के लिए बात कर दीजिये न

    कुछ लोगों को कुछ भी हो जाये कुछ भी न बदलने का जो भरोसा होता है वो ग़ज़ब का होता है । चुनाव आते ही टिकट के लिए फ़ोन आना हैरानी की बात नहीं । लेकिन मीडिया की इतनी आलोचनाओं के बाद भी कुछ को भरोसा रहता है कि अपना काम तो निकल जाए । 

     
    अचानक से फ़ोन पर परिचित होगा अरे भाई साहब सब कह रहे हैं कि रवीश जी आपके मित्र हैं और आप हैं कि कोई मदद नहीं कर रहे हैं । सबको कैसे पता कि आप मेरे मित्र हैं और हम मित्र कैसे हुए । हम तो कभी मिले नहीं । तो क्या हुआ आपका नंबर है न मोबाइल में । वही दिखा के सबको बता देते हैं । हवा पानी टाइट रखना चाहिए न । पर ये तो ठीक नहीं है । अरे रवीश जी ठीक है पता है आप ये सब नहीं करते लेकिन समाज यार दोस्तों के लिए कुछ करिये दीजियेगा तो क्या हो जाएगा । मान लीजिये आप किसी को जानते हैं । मिलवाइये दिये । इसमें तो कोई हर्ज़ा नहीं है । हम लोग भी तो किसी टाइम आपका ख्याल करेंगे । बुरे वक्त का ख़ौफ़ दिखाने के बाद क्या कहें । कितना डाँटें चिल्लाये । सब चाहते हैं कि उनके बीच का कोई इस दुर्लभ संपर्क क्षमता का हो । मजबूरी में कह देता हूँ कि हाँ ठीक है लेकिन हमसे होता नहीं है । ऐसा कुछ होगा तो देखेंगे । मेरा फोन तो कोई नेता उठाता ही नहीं है ।  
     
    अरे रभीस जी आपको लोग नहीं जानता है ! एतना भी सुध्धा मत बनिये । मीडिया का ही तो पावर है । जिसे चाहे उसे बना दे । पर हम उस पावर का इस्तमाल नहीं करते । पता है नहीं करते लेकिन क्या बाकी नहीं करते । आप क्या कर लेते हैं । उ सब के साथ रहते हैं कि नहीं । हम थोड़े न कह रहे हैं कि ग़लत काम कीजिये । उसी में से अपने लोगों के लिए तो करना पड़ता है । समझ में नहीं आता है कि मदद मांग रहा है या बुरे वक्त के नाम पर धमका रहा है । कितना हाँ में हाँ किया जाए मन रखने के लिए । मन तो ख़राब हो ही जाता है । अक्सर मैंने देखा है इस टाइप के दलाल संक्रमित लोग दलील अच्छी देते हैं । 
     
    एक दिन इसी तेवर में फोन आ गया । भाई जी आशीर्वाद दीजिये । ले लीजिये । वैसे नहीं । त कइसे । एम एल सी का चुनाव लड़ रहे हैं । तो हम क्या मदद करें । अरे उसी में मदद तो कर ही सकते हैं । इसमें क्या होता है । अरे वार्ड काउंसलर, पंचायत परिषद का सदस्य और मुखिया वोट करता है । बहुत ख़र्चा है भाई । वो क्या ?
     
    हर पंचायत में पंद्रह सोलह वार्ड काउंसलर होता है । एक वार्ड मेंबर को पंद्रह सोलह सौ देना होता है । डेढ़ ही हज़ार में वोट दे देगा ? हाँ त यही चलबे करता है । मुखिया ज़रा ज़्यादा माँगता है । कितना ? पचीस हज़ार । अच्छा । लेकिन उतना नहीं देंगे । पाँच सात हज़ार देकर काम चल जायेगा । वो व्यक्ति कितनी आसानी से सब कहे जा रहा था । दो साल से फ़ोन पर बात कर रहा है । मुलाक़ात तक नहीं । पता नहीं किस किस को बताता है कि मैं उसका मित्र हूँ । आशीर्वाद दीजियेगा न भइया । हाँ हाँ । विधान परिषद की सदस्यता का आलम यह है तो इसे आज ही समाप्त कर देना चाहिए । 
     
    फ़ोन रखने के बाद यही सोचने लगा कि हम क्या समझें जा रहे हैं और यह कैसा समाज है । कोई फ़ोन कर यह नहीं कहता कि ईमानदारी से पत्रकारिता करो । कुछ होगा तो हम लोग हैं न मदद करने के लिए । एक रिश्तेदार ने तो लोजपा के टिकट की पैरवी के लिए फ़ोन कर दिया । आम आदमी की सफलता के बाद इसके टिकट के लिए भी लोग फ़ोन कर देते हैं । सब परिचित ही होते हैं । मुश्किल हो जाता है कि कैसे बात करें । हाँ देखते हैं भइया । अरे देखो नहीं करो । टाइम नहीं है । एक सजज्न दफ़्तर आ गए विशालकाय गुलदस्ते के साथ । कहा बीजेपी से टिकट दिलवा दीजिये । सुना है मोदी जी आपको मानते हैं । उनसे कहा कि हम ये सब नहीं कर सकते । पता चलेगा तो दर्शक नाराज़ हो जायेंगे । बिल्कुल पहली बार इस व्यक्ति ने भी यही कहा कि अरे साहब मदद कर अपना आदमी बनाइयेगा तभी न हम लोग बुरे दिन में काम आयेंगे ।
     
    क्या कर सकते हैं । इस समाज को ख़ारिज कर कहाँ चल दिया जाए । सारे संबंधों की ऐसी व्याख्या करते हैं कि राहु केतु से प्राथर्ना करने लगता हूं कि बचा लेना । कोई मित्र नाराज़ हो जाता है तो कोई परिचित । कभी हाँ तो कभी हूँ बोलकर टाल तो देता हूँ मगर बहुत मामूली महसूस करने लगता हूँ । तब तो और जब क़रीब के मित्र भी समझने की जगह गाली देते हुए विवेचना करते हैं कि किसी काम का नहीं है । स्वार्थी है । अपने लोगों के लिए क्या किया इसने । 
     
    इन सब को बीच कुछ फ़ोन ऐसे भी आते हैं जो जीवन रक्षक और ज़रूरी होते हैं । पर फ़ोन करने वाला पहले से तय कर चुका होता है कि होना ही है । हमसे किसी की मदद हो जाए तो क्या बात, करने के लिए भी तत्पर रहता हूँ लेकिन मदद के नाम पर यही सब हो तो बात शर्मनाक है । करना पड़ता है और नहीं करेंगे के बीच कुछ तो बोलना पड़ता है जिसे बोलते हुए सौ मौंते मरता हूँ । ये समझा जाना कि हमारे पास पावर है और हम अरविंद मोदी राहुल से एक फ़ोन पर टिकट दिला देंगे कितना बेबस करता है । 
     
    पहले भले ही यह सब बातें सामान्य रही होंगी या हमारे पेशे के लोग ये सब आसानी से कर गुज़रते होंगे पर अब समय बदल गया है । किसी भी पत्रकार को इन सब मजबूरियों के बारे में सोचना चाहिए और बचने का तरीक़ा निकालना चाहिए । ऐसा नहीं है कि दुनिया मदद नहीं करेगी । एक परिचित के पास पैसे नहीं थे । अस्पताल वाले को फ़ोन किया कि ये हालत है आप उनसे पैसे मत माँगना । अपना अकाउंट नंबर दे दीजिये मैं उसमें जमा कर दूँगा । परिचित को पैसे की पेशकश इसलिए नहीं की क्योंकि उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहता था । उधर से आवाज़ आई आप रवीश टीवी वाले बोल रहे हैं । हाँ । अरे सर मज़ा आ जाता है आपको देखकर । आप चिंता मत कीजिये । मैं हैरान रह गया । उस आदमी ने मदद कर दी । समाज इतना भी गया गुज़रा नहीं है । ऐसा हो तो क्यों नहीं फ़ोन करूँगा ।  पर हम क्या से क्या होते जा रहे हैं और इतनी बहस के बाद भी अगर किसी को भ्रष्टाचार पर इतना भरोसा है तो फिर इसके ख़िलाफ़ बहस में शामिल कौन है ? वही जो भ्रष्ट है !
    • Rajesh Sharma

      Yes, it is all about making choices, and living with the consequences.