• ~ Mark Twain

    ~ Mark Twain

    "Loyalty to country ALWAYS. Loyalty to government, when it deserves it."
  • janardhancong

    जनार्दन द्विवेदी की जाल में मोदी !

    आरक्षण की बहस और दलीलें सब पुरानी है और कई बार दी जा चुकी हैं । पक्ष और विपक्ष दोनों की तरफ़ से । एजेंसी पर जब जनार्दन द्विवेदी का बयान फ़्लैश कर रहा था तब मैं सोच रहा था पार्टी के तमाम बयानों को सही करने वाले जनार्दन द्विवेदी क्यों इस वक्त कहेंगे कि आरक्षण का जातिगत नहीं आर्थिक आधार होना चाहिए । वक्त आ गया है कि राहुल गांधी इस पर कड़ा फ़ैसला लें और आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू कर दें । 

     
    पुराना और पिटा सा लगने वाला यह बयान इतना भी भोला नहीं है । गूगल करते ही राजीव गांधी का सन नब्बे का एक भाषण निकलता है जिसमें वे मंडल आयोग लागू होने की बात पर हो रही हिंसा पर बोल रहे थे । लोक सभा में । राजीव गांधी अगस्त नब्बे में हुई कार्यसमिति के प्रस्ताव का हवाला दे रहे हैं जिसमें कहा गया था कि जाति के आधार पर आरक्षण नहीं होना चाहिए । जिनके माता पिता डाक्टर हैं, पेशेवर हैं,मंत्री विधायक हैं या करदाता हैं उनके बच्चों को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए । सन नब्बे में अगर कांग्रेस यह कह सकती है कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए तो उसके चौबीस साल बाद सोनिया गांधी एक लंबा सा बयान जारी करती हैं कि कांग्रेस ही आरक्षण लाई थी और कांग्रेस हमेशा इसके जारी रखने की वकालत करेगी । नब्बे में कांग्रेस किस मतदाता को सम्बोधित कर रही थी और आज किसे कर रही है ।
     
    खैर जो राजनीतिक प्रतिक्रिया आई वो भी पुरानी परिपाटी के अनुसार ही रही । आरक्षण का आधार जाति ही है । कई जानकारों ने कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात तर्कसम्मत और संविधान सम्मत नहीं है । एस आर दारापुरी ने बताया कि एक बार अदालत इसे ख़ारिज कर चुकी है । जेएनयू के समाजशास्त्री प्रो विवेक कुमार से जब मैंने पूछा कि जब दस प्रतिशत आरक्षण ग़रीब सवर्णों को देने की बात मायावती से लेकर कांग्रेस बीजेपी सब करती हैं तो दस से पचीस या पैंतीस क्यों नहीं हो सकता । यह कैसे होगा कि एक को वही आरक्षण जाति के आधार पर मिले और दूसरे को ग़रीबी के आधार पर । प्रो विवेक कुमार ने कहा कि आरक्षण ग़रीबी उन्नीसवीं कार्यक्रम नहीं है । इसके लिए लाखों करोड़ों की योजनाएँ पहले से चलती रही हैं । 
     
    तब क्यों सारे राजनीतिक दल इसकी बात करते हैं और कहते हैं ग़रीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देंगे ? विवेक कुमार ने कहा कि पार्टियाँ छल करती हैं । ग़रीबी रोज़ बदलने वाली अवस्था है । जाति नहीं । तो ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देने का वादा कर क्या तमाम दलों ने लोगों को नहीं ठगा । इन लोगों ने दशकों से इसका वादा कर रखा है लेकिन लागू करने के लिए क्या पहल की गई है । सरकार और विपक्ष दोनों तरफ़ से । यह मुद्दा क्यों नहीं है । 
     
    अब फिर आते हैं राजनीति पर । रविशंकर प्रसाद ने अजीब दलील दी कि कांग्रेस द्विवेदी के इस बयान के ज़रिये पिछड़ी जाति के नरेंद्र मोदी को रोकना चाहती है । एक नई बहस चलाना चाहती है ताकि उसकी अपनी कमज़ोरी छिपा सके । आरक्षण पर बहस नईँ है ? क्या उनकी पार्टी के नेताओं ने कभी नहीं कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए । बीजेपी के भी महासचिव वरुण गांधी का बयां है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए । नरेंद्र मोदी का एक व्यक्तिगत विचार सा इंटर्व्यू यू ट्यूब पर है कि नौकरी और शिक्षा की सुविधा बहुतायत होने से आरक्षण की मांग कौन करेगा । बहुतायत नौकरियाँ ? दुनिया की किस अर्थव्यवस्था में सबके लिए नौकरियाँ हैं ?  क्या मोदी जातिगत आरक्षण के विरोधी हैं ? 
     
    वे इक्कीसवीं सदी का भारत बनाने जा रहे हैं तो आरक्षण पर क्यों नहीं बोलेंगे । रविशंकर की आशंका मासूम लगती है । क्या मोदी को इस पर अपना स्टैंड साफ़ नहीं करना चाहिए सोनिया गांधी की तरह । रामदेव कहते हैं कि मोदी को साफ़ करना चाहिए वैसे वे चुनाव के बाद मोदी जी को मना लेंगे कि आरक्षण का आधार आर्थिक कर दें क्योंकि यही न्यायपूर्ण व्यवस्था है । जो बाद में करेंगे उस पर पहले बोलने में क्या दिक्क्त है । बीजेपी के दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान ने भी प्राइम टाइम में कहा कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए और आर्थिक आधार पर विचार किया जा सकता है । 
     
    आख़िर मोदी को अपनी पार्टी का स्टैंड दोहराने में दिक्क्त क्या है जैसे सोनिया ने किया । मैं प्राइम टाइम में बाबा रामदेव से कहता रहा कि मोदी साहस नहीं कर पायेंगे । रामदेव ने कहा कि वे और मोदी पिछड़ी जाति से आने के कारण हक़ीक़त समझते हैं और कह सकते हैं कि आर्थिक आधार आरक्षण होना चाहिए । बीजेपी अब उनकी पिछड़ी जाति के आधार को मुखर करने लगी है । वैसे ये सब करते हैं लेकिन अगर लगता है कि भारत इस बार जात पात से ऊपर उठ कर मोदी को वोट दे रहा है तो क्या यह सही वक्त नहीं है कि मोदी को द्विवेदी, रामदेव या संजय पासवान की लाइन आगे बढ़ानी चाहिए । 
     
    मैं मज़ाक़ कर रहा था । मोदी इस वक्त मज़ाक़ करेंगे को आँधी हवा सब पलट जायेगी । जैसे ही वे यह कहेंगे कि आरक्षण का आधार जाति नहीं आर्थिक हो वैसे ही पिछड़ी और दलित जातियाँ उनके ख़िलाफ़ आक्रामक हो जायेंगी और जैसे ही कहेंगे कि आर्थिक आधार बकवास है उनके साथ जाति पाँति से ऊपर उठने के भ्रम जाल में फ़ैन बना सवर्ण युवा अपना बस्ती लेकर कहीं और चल देगा । इसीलिए हार के कगार पर खड़ी कांग्रेस के द्विवेदी का यह बयान मास्टर स्ट्रोक है । दुधारी तलवार की तरह ।  किसी भी तरह से तलवार पकड़ने पर हाथ तो ज़ख़्मी होना ही है । जितना बीजेपी को ज़ख़्मी करने के इरादे से दिया गया उतना कांग्रेस को भी करने जा रहा था । इसलिए कांग्रेस ने सबसे पहले इस बहस को अपने यहाँ बंद किया । बीजेपी जानती थी राहुल गांधी को दिया गया बयान उसके घर तक भी आ सकता है इसलिए वो यह कहने लगी कि मोदी को रोकने के लिए नई बहस पैदा की जा रही है । 
     
    पिछड़े दलित और सवर्णों को अलग करने की ख़तरनाक क्षमता रखने वाली इस बहस को कांग्रेस ने तो बंद कर दिया है  लेकिन बीजेपी के सामने यह बयान कहीं खड़ा न हो जाए इसे पार्टी को देखना होगा । वैसे बात बात में बहस की बात करने वाली बीजेपी को आरक्षण पर बात करने से परहेज़ क्यों ? इसलिए कि लाइन क्लियर करनी होगी ! तभी कहा कि जनार्दन द्विवेदी के बयान का मतलब आरक्षण पर बहस से ज़्यादा बीजेपी की तरफ़ छोड़ा गया तीर है । चुनाव जो भी जीते मगर यह बकवास है कि हम इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए वोट करने जा रहे हैं । पिछली सदी में भ्रष्टाचार और महँगाई के सवाल पर केंद्र में कांग्रेस कई बार हारी है । यह चुनाव एक सीमित मुद्दों और मायनों वाला चुनाव है । वर्ना कोई आरक्षण के ख़िलाफ़ बोल कर देखे । नोट और वोट दोनों हवा में उड़ जायेंगे । 
    • S. R. Darapuri

      आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है . यह तो सदियों से वंचित वर्गों को प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने का माध्यम है जिस के बिना हमारा लोकतंत्र सब के प्रतिनिधित्व वाला नहीं बन सकता. इन वर्गों की सही पहचान जाति द्वारा ही की जा सकती है जो कि आरक्षण का संवैधानिक आधार मानी गयी है. आरक्षण का आर्थिक आधार तो बेईमानी के लिए दरवाज़े खोलने वाला होगा. अभी तक तो जाति प्रमाण पत्र का फर्जीवाड़ा इतने व्यापक स्तर पर होता रहा है. आर्थिक आधार पर फर्जीवाड़ा तो बहुत ही आसानी से किया जा सकता है. गरीबी की रेखा के नीचे के राशन कार्ड इस की सब से अच्छी मिसाल हैं.